डियर जिंदगी: कह देना ठीक ही है!

मन में भावना का संग्रह किसी के लिए शुभ नहीं. न जिसके मन में है, उसके लिए और न जिसके प्रति है, उसके लिए. इसलिए अपनी बात कहिए. संपूर्ण प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता से कहिए. कहना हमेशा न कहे से भला होता है.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Feb 13, 2018, 02:53 PM IST
डियर जिंदगी: कह देना ठीक ही है!

आमतैार पर जब वह बात शुरू करते हैं, तो दूसरों के लिए मौका कम होता जाता है. उनके जानने वालों को उनका स्‍वभाव बहुत भाता नहीं. दूसरों को कुछ कहने का मौका देना उनके मूड पर ही तय होता है. उनकी पहचान मित्रों, परिवार और समाज में एक सफल, लेकिन आत्‍मकेंद्रित व्‍यक्‍ति के रूप में रही है. कोई ऐसा जो वही करता है, जो उसका दिल करता है. उसे दूसरों के नजरिए की बहुत परवाह नहीं.

ऐसा कोई अचानक कुछ ऐसा शुरू कर दे. तो आश्‍चर्य तो होता ही है. होना भी चाहिए. मनुष्‍य का मन कोई मौसम तो नहीं. हां उस पर मौसम का असर होता है, यह दूसरी बात है. मेरे एक मित्र जिनका अभी-अभी परिचय हुआ है, उनके स्‍वभाव में यह परिवर्तन आया, तो जरूरी था कि उनकी बात को थोड़ा ठहरकर सुना जाए. समझा जाए.

उनसे बात हुई. थोड़ी देर की न नुकुर के बाद उन्होंने जो कहा वह दिल को छू लेने वाला रहा. उन्‍होंने कहा, 'मैं एक ऐसे परिवार से हूं. जहां पिता-पुत्र में संवाद नहीं होता. जहां बड़ों के साथ संवाद को मर्यादा के अनुकूल नहीं माना जाता. जो बड़ा कहे, वही सही. ऐसे में होता यह है कि बच्‍चा पहले तो बोलता ही नहीं, लेकिन जब बोलता है तो रुकता नहीं. जैसा मैं हो गया हूं.' संवाद की कुछ और कड़ियां जुड़ने के बाद उन्होंने कहा, 'कुछ समय पहले पिता को खो दिया. उनसे बात करने का जिंदगी ने अवसर ही नहीं दिया. हम न तो उनसे प्‍यार जता पाए, न उनको यह मौका मिल पाया. परस्‍पर संकोच, मर्यादा और ग्राम्‍य जीवन की परवरिश में बच्‍चे ऐसे ही तो पलते हैं.'

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उन्होंने अपनी बात जारी रखी. 'जैसे पिता, वैसा बेटा! अब सोचता हूं कि काश! अपने पिता से वह कह पाता, जो कहना चाहता था. अब न कहे का दर्द अक्‍सर परेशान करता है. इसने मुझे अपना नजरिया बदलने को मजूबर किया. पहले मैं जिनसे बात नहीं करता था, जिनको सुनता नहीं था. अब कोशिश है कि उन रिश्‍तों के तार जो टूट गए हैं, किसी तरह जोड़ लूं. जिंदगी को हम जितना बड़ा समझते हैं, अक्‍सर वह उतनी बड़ी होती नहीं.'

यह तो हुई एक रिश्‍ते की बात. जिंदगी रिश्‍तों का गुलदस्‍ता है. हर रिश्‍ते का स्‍वाद, खुशबू और खासियत एक-दूसरे से अलग  है. वक्‍त की धूल से कई बार रिश्‍तों का स्‍वाद कसैला हो जाता है. इसमें किरदार से अधिक जिम्‍मेदार वक्‍त की धूल होती है. इसलिए इस धूल से जिंदगी जितनी दूर रहे, उतनी ही गुलजार रहेगी.

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कितने ही रिश्‍ते हम रोजमर्रा की जिंदगी में देखते हैं. जिनमें जरा-जरा से मनमुटाव ने रिश्‍तों की गाड़ी को पटरी से हमेशा के लिए उतार दिया. यह अनबन कभी पिता-पुत्र, सास-बहू, भाई-बहन और दोस्‍त किसी के बीच भी हो सकती है. अनबन, गलतफहमी से शुरू हुई दीवार कब मनमुटाव में बदल जाती है, पता ही नहीं चलता.

बाद में अगर कुछ रह जाता है तो ऐसा ही अफसोस, जैसा शुरू में उन मित्र ने जाहिर किया. अपने पिता से संवाद की कमी के प्रति. इसलिए हम चाहे जैसे परिवेश, संस्‍कृति से आते हों, समय के साथ खुद को बदलाव को तैयार कीजिए और अपनों के लिए मन में जो भी है, वह कह दीजिए.

मन में भावना का संग्रह किसी के लिए शुभ नहीं. न जिसके मन में है, उसके लिए और न जिसके प्रति है, उसके लिए. इसलिए अपनी बात कहिए. संपूर्ण प्रेम, स्‍नेह और आत्‍मीयता से कहिए. कहना हमेशा न कहे से भला होता है.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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