डियर जिंदगी: बच्‍चे हमारे उपदेश से नहीं, हमसे सीखते हैं...

परिवार होता ही इसलिए है कि एक-दूसरे को संभाला जाए. एक-दूसरे का साथ तब भी दिया जाए जब ऐसा करना बेहद मुश्किल हो. परिवार में विशेषकर बच्‍चों के मामले में क्षमा, स्‍नेह और गुस्‍से का खास ख्‍याल रखने की जरूरत है.

डियर जिंदगी: बच्‍चे हमारे उपदेश से नहीं, हमसे सीखते हैं...

बच्‍चा झूठ बोलना कहां से शुरू करता है! वहां से जहां से हम सिखाना शुरू करते हैं या वहां से जहां से हम उस पर अविश्‍वास शुरू कर देते हैं. उदयपुर से मीता चतुर्वेदी लिखती हैं कि उनका छह साल का बेटा अचानक से झूठ बोलने लगा है. उसकी आदत कुछ ऐसी हो गई है कि वह बिना बात के झूठ बोल देता है. वह सूचना देते समय/बात करते समय इस बात की परवाह नहीं करता कि इसका असर क्‍या होगा. वह बस बोले जा रहा है. जबकि उनका परिवार कभी झूठ नहीं बोलता.

मैंने उनसे पूछा कि क्‍या हाल ही में उनके जीवन में कुछ बदलाव आए हैं. उन्‍होंने जो कुछ कहा, वह इस प्रकार है, 'हम हाल ही में जयपुर से उदयपुर आए हैं. यहां हमारे अनेक रिश्‍तेदार हैं. मेरे पति अंतर्मुखी स्‍वभाव के हैं. प्रोफेसर हैं, अपने काम में व्‍यस्‍त रहते हैं. इसलिए लोगों से बहुत मिलते-जुलते नहीं. वह अपनी उपलब्‍धता के बारे में कई बार जो जानकारी देने के लिए कहते हैं, वह सही नहीं होती. कई बार बेटे के फोने उठा लेने पर भी उससे ऐसी ही अपेक्षा की जाती है. हम बेटे से अक्‍सर कहते यही हैं कि बेटा झूठ नहीं बोलना. लेकिन हो नहीं पाता.'

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मीता ने जो कुछ बताया, उनके बेटे के बदले व्‍यवहार का उत्‍तर उसी में है. बच्‍चा हमारे उपदेश से नहीं हमसे ही सीखता है. हम बच्‍चों को व्‍यवहार, आदतों के बारे में सिखाते समय अपने आचरण को भूल जाते हैं. हम खुद को बच्‍चे से बाहर करके देखते हैं. इसका असर यह होता है कि उसे समझने में हमसे अक्‍सर भूल हो जाती है.

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इसका एक और बेहद सरल उदाहरण दूसरे पाठक ने साझा किया है. लखनऊ से सुरेश तिवारी लिखते हैं कि बचपन में वह एक बड़े संयुक्‍त परिवार का हिस्‍सा थे. जहां घर-आंगन बेहद बड़े थे. एक-दूसरे को बुलाने के लिए जोर से चिल्‍लाना पड़ता था. चिल्‍लाने से अधिक उसे 'आवाज' देने से समझना चाहिए. इसका असर यह हुआ कि उनकी आवाज हमेशा के लिए तेज़ हो गई. उस वजह से उनको अपने कारोबार में भी कुछ दिक्‍कतें आईं, लेकिन वहां वह बॉस थे. इसलिए बात जम गई. लेकिन घर पर मामला उल्‍टा पड़ गया. उनके दोनों बच्‍चों ने पापा की देखादेखी तेज आवाज में जवाब देना शुरू कर दिया. बच्‍चे आपस में सरल, सहज संवाद करते-करते अचानक चीखते से नजर आने लगे. उनकी पत्‍नी खासी परेशान हैं.

चारों ने बहुत सोच विचार के बाद पाया कि इस समस्‍या का निदान तो उनके घर में, उनके बीच ही है. इसलिए सबसे पहले यह जरूरी है कि हम अपने भीतर सुधार करें. तो उन्‍होंने परिवार के साथ बैठक में यह फैसला किया कि अब कितना ही जरूरी क्‍यों न हो कोई चीखेगा नहीं. चिल्‍लाएगा नहीं. सब मिलकर बात करेंगे लेकिन किसी भी हाल में चीखेगा नहीं, तेज आवाज में बात नहीं. अगर कोई दूसरा ऐसा करने लगे तो बाकी मिलकर संभालेंगे. एक-दूसरे को ताकत देंगे. तीन महीने से अब 'आवाज' पर काबू पा लिया गया है. क्‍योंकि सबने एक-दूसरे को जिम्‍मेदार ठहराने की जगह, दोषी साबित करने की जगह, सहयोग से परिवार को संभाल लिया.

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परिवार है ही इसलिए कि एक-दूसरे को संभाला जाए. एक-दूसरे का साथ तब भी दिया जाए जब ऐसा करना बेहद मुश्किल हो. परिवार में विशेषकर बच्‍चों के मामले में क्षमा, स्‍नेह और गुस्‍से का खास ख्‍याल रखने की जरूरत है. इसके साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि हम उनके सामने उपदेश की जगह अपना आचरण लेकर जाएं. तभी वह उन सारी चीजों को अपनाएंगे, जो हम उनसे चाहते हैं. वह हमारे शब्‍दों की तुलना में कहीं अधिक हमारे व्‍यवहार को महत्‍व देते हैं.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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