डियर जिंदगी : अतीत की गलियां और 'नए' की तलाश -2

जिंदगी पर मंडरा रहे तनाव और अवसाद के खतरे को नीरा और उसके परिवार ने बड़ी खूबसूरती से टाल दिया. न केवल टाल दिया बल्कि अपनी रचनात्‍मकता से 'डियर जिंदगी' में बदल दिया. 

डियर जिंदगी : अतीत की गलियां और 'नए' की तलाश -2

आपने 'अतीत की गलियां और 'नए' की तलाश -1' में पढ़ा कि जयपुर की नीरा शादी के बाद परिवार और बच्‍चों के लिए करियर को छोड़ देती हैं. कुछ बरस तक सब ठीक चलता है, लेकिन उसके बाद धीरे-धीरे वह महसूस करती है कि परिवार उनके 'त्‍याग' को पर्याप्‍त महत्‍व नहीं दे रहा है. पति और बच्‍चों के पास उनके लिए समय कम होता जा रहा है. कुल मिलाकर नीरा  पर उदासी की छाया गहराने लगती है. यह छाया इतनी बढ़ जाती है कि वह अवसाद की ओर बढ़ने लगती हैं. इसी दौरान नीरा अपने पुराने दोस्‍तों के साथ बरसों बाद मुलाकात के लिए जाती हैं. वहां उन्‍हें उनके दोस्‍त नए सिरे से प्रोत्‍साहित करने की कोशिश कर रहे हैं. 

अब आगे...
नीरा की पूरी बातें सुनने के बाद उनके दोस्‍तों ने ( जिसमें देश-विदेश में काम कर रहे प्रोफेसर, इंजीनियर और मैनेजर है) इस बात पर सहमति जताई कि नीरा को नए सिरे से अपना करियर प्‍लान करना चाहिए. जिसमें परिवार का भी पूरा ख्‍याल रहे और करियर की छूटी हुई ट्रेन फि‍र पकड़ी जा सके.

नीरा ने जयुपर लौटकर अपनी ओर से कोशिश शुरू की. लेकिन इतने बरस तक घर पर रहने के कारण उसके लिए प्रोफेशनल दुनिया में लौटना आसान नहीं था. उसे लगभग छह महीनों तक हर जगह और संपर्क से 'न' सुनने को ही मिला. इसी दौरान  वह एक इंटरव्‍यू के जयपुर के थोड़े दूर-दराज के एक बिजनेस काम्‍पलेक्‍स गईं. जहां उसे कुछ देर इंतजार के लिए कहा गया. इंतजार बढ़ता गया तो वह ऑफि‍स के नीचे कुछ देर टहलने और 'चाय' के लिए सड़क के किनारे एक दुकान की ओर बढ़ गईं.

डियर जिंदगी : 'अकेले हम, अकेले तुम' और कम होता प्रेम...

नीरा ने देखा यह आम चाय दुकान से अलग 'चाय' सेंटर है. एकदम युवा माहौल. मतलब और बेमतलब की बातें में चाय की चुस्‍की के साथ डूबे हुए लोग. यहां चाय के साथ बिस्‍कुट और 'वाई-फाई' एकदम फ्री हैं. उसने चाय के लिए कहा और टेबिल पर इंतजार करने लगी. तभी उसकी नजर राजस्‍थान के बड़े अखबार की खबर पर गई. जिसमें इस 'टी' कैफे पर विस्‍तार से बात की गई थी.

इस खबर में उन युवाओं पर बात की गई थी. जिन्‍होंने एमबीए करने के बाद 'टी' कैफे को चुना था. उसने ध्‍यान दिया तो उसे लगा यह तो उसके ही 'बैचमेट' का कैफे है. नीरा को अचानक याद आया कि किसी जमाने में उसके पति और ससुराल-मायके सब जगह बस नीरा की चाय के चर्चे होते थे.

नीरा की चाय का स्‍वाद अचानक बढ़ गया. कुछ देर बात वह चाय सेंटर के एमडी और अपने दोस्‍त रहे रोहित के साथ चाय की चुस्‍कियां साझा कर रहीं थीं. नीरा और रोहित कुछ ही देर में एक दूसरी की जिंदगी का सारा हाल जान चुके थे.

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रोहित ने कहा, असल में तुम्‍हारी परेशानी का सबब यह नहीं कि परिवार तुम्‍हारे बारे में अब सोच नहीं रहा. बल्कि यह भी है कि तुम अपनी ही बनाई दुनिया और कंफर्ट जोन से निकलने के लिए कितनी कोशिश कर रही हो. तुम्‍हारे पास आर्थिक रूप से सुरक्षा की एक दीवार है. इसलिए अभी तुम्‍हारी योग्‍यता के सामने हर हाल में खुद को साबित करने की चुनौती नहीं है. और यह भी कि एमबीए करने का अर्थ यह नहीं कि हम किसी कंपनी में ही काम करें.

रोहित ने धीमे लेकिन सधे स्‍वर में अपनी बात जारी रखी, 'तुमने परिवार के लिए बहुत कुछ किया. तो इसके कारण ही आज परिवार व्‍यवस्थित है. पति के कड़े परिश्रम के कारण आज तुम्‍हारे पास साधन हैं. बच्‍चों की शिक्षा और उनकी समझ ठीक दिशा में आगे बढ़ रही है. तुम अपने नौकरी छोड़ने के निर्णय के परिणाम को सीधे किसी एक चीज़ से मत जोड़ो. जो तुमने उस समय किया वह समय की मांग थी. आज समय है कि तुम अपने दिशा तय करो, तुम दे‍खोगी कि कुछ ही दिन में परिवार तुम्‍हारे साथ खड़ा होगा.'

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'परिवार में कई बार ए‍क दूसरे के प्रति स्‍नेह और प्रेम अभिव्‍यक्त नहीं हो पाता. इसके मायने यह नहीं कि  परिवार में प्रेम नहीं,असल में उन्‍हें जताने का 'संस्‍कार' नहीं मिला है. हम भारतीय अपनी भावनाएं व्‍यक्‍त करने में थोड़े संकोची हैं.

रोहित ने अपनी बात खत्‍म की- 'इसलिए अपनी दिशा को तलाशो, उसे एमबीए नहीं, जीवन के अनुभव और चाह से जोड़ो.' आखिरी शब्‍द नीरा के दिमाग में कई दिनों तक गूंजते रहे. उसने महसूस किया कि अचानक कुछ दूसरे ऐसे मित्रों की सलाह और संगत का उस पर कुछ ज्‍यादा असर हो गया था, जो कहीं न कहीं अपने रिश्‍तों में असंतुष्‍ट थे. उन्‍होंने परिवार और बच्‍चों को एक तरह से उसके विरूध लाकर खड़ा कर दिया. सलाह को अपने अंतर्मन तक पहुंचने से पहले उस पर विवेक और तर्क का 'फिल्‍टर' जरूर लगाना चाहिए.

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एक सप्‍ताह के भीतर नीरा की जिंदगी में घुमड़ आए बादल हवा हो गए. उसने जिंदगी को आशा और अनुभव की पूंजी से देखने का निर्णय लिया. अब उसके पास बिजनेस  'आइडियाज' की कमी नहीं थी. उसके पास परिवार का अर्थिक संबल था, बच्‍चों को जब उसने बताया कि वह कुछ नया करना चाहती है तो उन्‍हें उसे गले लगाकर उसका स्‍वागत किया. थोड़ी अनाकानी के बाद पति भी तैयार हो गए.

कुछ दिनों बाद नीरा ने घर से पहला ऑनलाइन टी स्‍टॉल लांच कर दिया. इसमें कुछ निवेश पति कुछ नीरा की बचत और कुछ उनके भाई ने किया. धीरे-धीरे नीरा की चाय बस दो मिनट में उनके मोहल्‍ले और पास ही में स्थित एक छोटे बिजनेस सेंटर तक पहुंच गई.

जिंदगी पर मंडरा रहे तनाव और अवसाद के खतरे को नीरा और उसके परिवार ने बड़ी खूबसूरती से टाल दिया. न केवल टाल दिया बल्कि अपनी रचनात्‍मकता से 'डियर जिंदगी' में बदल दिया. क्‍या हम अपने आसपास ऐसे लोगों की मदद कर सकते हैं. उन्‍हें नए जीवन सूत्र और विचार देने में मदद कर सकते हैं. यकीन रखिए अगर एक जीवन को संवारने में भी हम सफल हुए तो उसकी रोशनी से कितने जीवन दमक सकते हैं, हमें उसका अंदाजा भी नहीं है.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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