डियर जिंदगी : कमजोर, आक्रामक बच्‍चे और हम!

हिंसक होते बच्‍चों के बीच थोड़ा ठहरकर यह तो सोचना बनता ही है कि इतनी हिंसा हम उनके बीच कैसे जाने दे रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे प्रेम में कमी आ गई है!

डियर जिंदगी : कमजोर, आक्रामक बच्‍चे और हम!

बच्‍चों के स्‍वभाव में हिंसा चुपचाप, इतनी गहरी शांति से घुलती है कि उन्‍हें तो दूर हमें भी इसका पता नहीं चल पाता. जैसे हमारी सांसों में प्रदूषण थोड़ा थोड़ा करके शामिल होता है. दिखता नहीं. सुनाई नहीं देता. लेकिन नुकसान भीतर-भीतर होता रहता है. कई बार कुछ साल बाद नजर आता है तो कई बार इतना कि सारे खतरनाक स्‍तर पार करने के बाद.

इन दिनों किशोर बच्‍चों का नाम लगभग हर तरह के अपराध से जुड़ने लगा है. अपने साथ पढ़ने वाले छोटे बच्‍चों की हत्‍या, वह भी स्‍कूल में, इससे खतरनाक और क्‍या हो सकता है. यौन अपराधों में भी वह निरंतर फंसते जा रहे हैं.

हिंसक होते बच्‍चों के बीच थोड़ा ठहरकर यह तो सोचना बनता ही है कि इतनी हिंसा हम उनके बीच कैसे जाने दे रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे प्रेम में कमी आ गई है! हमारे पास उनके लिए समय कम होता जा रहा है, या इसका उल्‍टा तो नहीं कि प्रेम की पूर्ति हम उनकी मांग से करने में जुट गए हैं. इसलिए बच्‍चे यह कहते भी सुने जा रहे हैं कि उनके पिता सर्वश्रेष्‍ठ हैं, क्‍योंकि वह हर मांग पूरी कर देते हैं.

यकीन मानिए, जब मैंने यह वाक्‍य सुना, स्‍तब्‍ध रह गया, समझ नहीं पाया कि क्‍या प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करूं. उस बच्‍चे से क्‍या कहूं. क्‍योंकि हम जिस संवाद का हिस्‍सा थे, उसमें बड़ी संख्‍या में बच्‍चे भी शामिल थे. अच्‍छा हुआ कि एक बच्‍चे ने खुद मोर्चा संभाला, उसने कहा, उसके पिता भी कम नहीं हैं, भले ही वह हर मांग पूरी नहीं करते, लेकिन वह उसे हमेशा सुनते हैं.

लेकिन ऐसे बच्‍चे संख्‍या में कम होते जा रहे हैं. तो जाहिर है, यह बच्‍चों से अधिक माता-पिता से जुड़ा प्रश्‍न है. बच्‍चों से प्‍यार करने का अर्थ क्‍या है! बच्‍चों की हर मांग मान लेने का मतलब क्‍या है! क्‍या इसका अर्थ यह निकाला जाना चाहिए कि ऐसा करने वाले अपने बच्‍चों से सबसे अधिक प्रेम करते हैं. एकदम नहीं, क्‍योंकि खर्च का संबंध किसी भी रूप में प्रेम से नहीं है. हम बस जब छोटे थे, उस समय हमारे ऊपर किए जा रहे खर्च की तुलना अगर आज बच्‍चों के ऊपर किए जा रहे खर्च से की जाए तो हम सहज ही पाएंगे कि इसमें जमीन-आसमान का अंतर आ गया है.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : 'जरूरत और जिद' और बच्‍चे को 'ना' कहना

इसकी एक वजह एक तो यह है कि पहले साधन कम थे, औसत वेतन कम था. ऐसे में इन जैसे दूसरे खर्च कम थे, वैसे भी बच्‍चों पर होने वाले खर्च बहुत सोच-विचार के बाद किए जाते थे. इस तरह भी समझा जा सकता है कि ‘विवेक और जरूरत’ का फॉर्मूला जितना बाकी चीजों पर लागू होता था, उतना ही बच्‍चों पर भी लागू होता था. तब शायद हमारी जरूरतें कम थीं, ले‍किन परवरिश में दम था. लेकिन अब उल्‍टा हो गया है, अब हमारी जरूरतें अधिक हो गई हैं, लेकिन हमारी परवरिश में समस्‍या दिख रही है.

शहरों में बच्‍चों के अभिवावक धीरे-धीरे सौ फीसदी कामकाजी हो रहे हैं. पहले एक से जरूरतें पूरी हो जाती थीं लेकिन जब दोनों के काम करने के बाद भी पूरी तरह से जरूरतों की पूर्ति नहीं हो पा रही है. इसकी एक वजह महंगाई है, लेकिन ध्‍यान से देखें तो हम पाएंगे कि बाजार का हमारे ऊपर हावी होना इसकी बड़ी वजह है, न कि महंगाई. पहले हमारे भीतर जीवन के बहुरंग के लिए कहीं अधिक ‘स्‍पेस’ था. अब जबकि हमारे पास संसाधन हो गए हैं, हमारी चेतना, हमारी वैचारिक ऊर्जा का विकास होने की जगह क्षरण हो रहा है.

हमारे भीतर का अकेलापन जैसे-जैसे विस्‍तार पाता जाता है, हम बाहरी व्‍यस्‍तता की ओर बढ़ते जाते हैं. यह खतरनाक है, लेकिन यह बढ़ रहा है. पहले संयुक्‍त परिवार थे, जहां जरूरतों की पूर्ति और खर्चों पर चर्चा की गुंजाइश थी. अब संयुक्‍त परिवार बीते दिनों की बात हो गए हैं, एक ही शहर में रह रहे परिवार अब एक साथ नहीं रहना चाहते. तो जब परिवार छोटे हुए तो बच्‍चों के हिस्‍से आना वाला स्‍नेह, प्रेम भी समय के साथ खत्‍म तो नहीं लेकिन काफी हद तक कम होता गया.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी :‍ बच्‍चे इतनी हिंसा कैसे बर्दाश्‍त करेंगे...

इससे एकल परिवार में माता-पिता के पास सबसे आसान रास्‍ता यह है कि वह बच्‍चों की जरूरतों को पूरा करते जाएं. एक के बाद एक. धीरे-धीरे माता-पिता और बच्‍चों के बीच यह एक किस्‍म का ‘समझौता’ हो गया है. अभिभावक अपने कम होते समय की पूर्ति हर मांग को पूरा करने से  करने की तरफ बढ़ गए हैं. इसका असर यह हो रहा है कि बच्‍चों को हर वह चीज सुलभ हो जा रही है, जो भले ही उनके काम की न हो, लेकिन उन्‍हें उनके दोस्‍तों के बीच ‘स्‍टेटस’ दिलाती है.

कुल मिलाकर बच्‍चे एक ऐसे वातावरण की ओर बढ़ रहे हैं, जहां उनकी जरूरतों में कमी का अर्थ हीनता से लिया जाने लगा है. ऐसे बच्‍चे संघर्ष को नकारात्‍मक दृष्टि से देखते हैं. मना करने को अपना अपमान समझने लगते हैं. और थोड़ा सी कमी से आक्रामक हो उठते हैं. यह आक्रामकता हिंसा, व्‍यवहार में रूखापन, खुद में सिमटते रहना, हर बात में नाराजगी जैसी किसी भी रूप में सामने आ सकती है, आ रही है.

मुश्किल है कि हम कुछ होने के बाद चर्चा करते हैं और चर्चा करने के बाद भूल जाते हैं. क्‍योंकि हम यह मानकर चलते ही नहीं कि यह बाढ़ के पानी की तरह किसी भी दिन हमारे घर में बिना किसी पूर्व सूचना के तबाही ला सकता है. और कई बार सूचना मिलने के बाद भी हमारे पास इससे बचने का वक्‍त नहीं होता.

इसलिए बच्‍चों की जरूरतें भले कम पूरी करें, लेकिन उनके हिस्‍से आने वाले प्रेम, स्‍नेह और समय में कभी कमी न करें. यह प्रेम आत्‍मा का अमृत है, इसके बिना बच्‍चों का जीवन हर दिन नीरस, हिंसक और एकाकी हो जा रहा है.

सभी लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें : डियर जिंदगी

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

By continuing to use the site, you agree to the use of cookies. You can find out more by clicking this link

Close