डियर जिंदगी : मिट्टी के बंधन से मुक्‍ति पेड़ के लिए आजादी नहीं!

जरा सोचिए, हम कितने खतरनाक विचारों से घिरे लोगों के बीच रह रहे हैं. कहीं से खबर आ रही है कि बेटों की चाह में परिवार बेटियों को नदी, नालों से लेकर समंदर तक में फेंक रहे हैं तो कहीं बेटे अपनी बीमार मां की सेवा से तंग आकर उसका जीवन छीन रहे हैं.

डियर जिंदगी : मिट्टी के बंधन से मुक्‍ति पेड़ के लिए आजादी नहीं!

परिवर्तन ही दुनिया का एकमात्र स्‍थायी नियम है. इस नियम से तो हम सभी परिचित हैं कि लेकिन कौन-सी वह चीजें हैं, जो इस नियम से परे हैं! रिश्‍ते! रिश्‍ते भी कैसे! माता-पिता से बच्‍चों का संबंध. बच्‍चों का माता-पिता के प्रति स्‍नेह. पति-पत्‍नी का प्रेम. गुजरात के राजकोट में कुछ ऐसा घटा है, जिसने हमें अपने लिए मानवीय, रिश्‍तों की कद्र करने वाले देश के रूप में खुद के जिक्र पर गर्व की जगह शर्मिंदगी से भर दिया है.

राजकोट में असिस्टेंट प्रोफेसर ने अपनी मां की सेवा से तंग आकर उन्‍हें छत से फेंक दिया. जिसके बाद उनकी मौत हो गई. बेटे ने पहले इसे आत्‍महत्‍या बताया था. लेकिन बाद में उसने स्‍वीकार किया कि वह मां की दो महीने की सेवा से तंग आ गया था. दो महीने पहले मां को ब्रेन हेमरेज हो गया था.

क्‍या, हमने ऐसे खबर कहीं पढ़ी है कि बच्‍चे की बीमारी से परेशान माता-पिता ने बच्‍चे को इसी तरह फेंका हो. कम से कम उसकी सेवा और देखरेख न करनी पड़े, इस वजह से तो ऐसे कारण सामने नहीं आए हैं. जिस युवा की यहां बात हो रही है, वह एक ठीक सी नौकरी में हैं. उनकी मां जयश्रीबेन विनोदभाई नाथवानी स्‍वयं शिक्षिका थीं. न जाने कितनी बार जयश्रीबेन ने बीमारी में अपने इस बेटे की सेवा की होगी. उसकी बीमारी के लिए कितनी रातों की 'सुबह' की होगी, बताना मुश्किल है.

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कैसे कोई बेटा अपनी मां की केवल दो महीने की सेवा से तंग आकर उसे छत से नीचे फेंकने का फैसला कर लेता है. वह मां अकेली छत से नहीं फेंकी गई. उसके साथ ही फेंक दिए गए हैं, स्‍नेह, प्रेम और वात्‍सल्‍य के सहज मूल्‍य. यह वही बेटे हैं, जिनके लिए समाज बेटियों की हत्‍या, भेदभाव से जरा भी संकोच नहीं करता.

मैं अब तक इससे नहीं उबर पाया हूं कि जब जयश्रीबेन को एक झटके में नीचे फेंक दिया गया होगा. उस पल से लेकर प्राण त्‍यागने तक उनके मन में क्‍या विचार आए होंगे. उस मां ने उस वक्‍त भी शायद यही सोचा होगा कि अच्‍छा है, उसे मेरी सेवा और कष्‍ट से मुक्‍ति मिल जाएगी. हमारे देश में मां ठीक ऐसे ही तो सोचती है. सदियों से ऐसे ही तो सोचती आई है. उसकी परवरिश और संस्‍कार में तो कमी कभी नहीं थी. तो इस तरह की समस्‍या कहां से आ रही है.

हमारे बच्‍चे मां-बाप को छत से फेंकने का विचार लिए घूम रहे हैं. आखिर यह विचार बेटे के मन में एक बार में तो तय नहीं हुआ होगा. उसने कई बार सोचा होगा. यह विचार इतना भयानक है कि शायद ही उसने किसी से सलाह ली हो.

जरा सोचिए, हम कितने खतरनाक विचारों से घिरे लोगों के बीच रह रहे हैं. कहीं से खबर आ रही है कि बेटों की चाह में परिवार बेटियों को नदी, नालों से लेकर समंदर तक में फेंक रहे हैं तो कहीं बेटे अपनी बीमार मां की सेवा से तंग आकर उसका जीवन छीन रहे हैं.

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हम ऐसे समय में प्रवेश कर रहे हैं, जहां हमारी चेतना का हरण कर लिया गया है. हमारा विवेक, हमारी खुद निर्णय करने की क्षमता हर दिन खत्‍म होती जा रही है. हमारी जिंदगी में सबकुछ दूसरे कर देते हैं. दूसरों के सुख को देखकर हम सुखी हो जाते हैं.

इस बेटे ने अपनी उम्र के दूसरे बेटों को सुखी और मनचाहा जीवन जीते देखकर ही इसी लालसा में यह कदम उठाया होगा. अपने लिए जीने की बढ़ती लालसा खराब नहीं है. खतरनाक नहीं है. अगर कुछ खतरनाक है तो बस इतना कि मां का साथ तक इस अकेले में मंजूर नहीं.

ऐसे मनुष्‍य का जीवन समाज को क्‍या दे पाएगा. जो अपनी जड़ को काटने का काम जीने की चाह से अधिक प्रतिबद्धता से करने लगे. ऐसी संतान से उन सबको सावधान रहने की जरूरत है, जो उनके भविष्‍य से अपने सुखों की चाह पाले बैठे हैं.

 

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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