डियर जिंदगी : आपको अपनी तमन्‍ना याद है !

कुछ दिन पहले किताब की दुकान पर एक बेहद शानदार शख्सियत से मिलना हुआ. वह रेलवे में बुकिंग क्‍लर्क हैं. गाजियाबाद से दिल्‍ली जाने-आने के लिए हर दिन भारी संघर्ष करते हैं. उसके बाद ही सप्‍ताह में दो दिन लगभग 140 गरीब बच्‍चों की शिक्षा के लिए देते हैं. उन बच्‍चों के लिए जो स्‍कूल नहीं जा पाते. मैंने पूछा, 'इतना समय और ऊर्जा कहां से लाते हैं.'

डियर जिंदगी :  आपको अपनी तमन्‍ना याद है !

आपको अपनी तमन्‍ना याद है ! अगर अब तक ऐसा है, तो यकीनन आप बेहद खुशकिस्‍मत हैं. हमारी हसरतें कुछ और होती हैं, जिंदगी की जरूरतें कुछ और. स्‍कूल, कॉलेज और उसके जीवन के संघर्ष से हम अपनी जरूरतों की गली में तो मुड़ जाते हैं, लेकिन हसरतों के मोहल्‍ला का पता हमसे गुम सा जाता है. फिर वही जिंदगी की भागमभाग, नौकरी पाने, बनाए रखने और आगे बढ़ने की शतरंज में हम इतने उलझ जाते हैं कि तमन्‍ना की ओर जाने का ख्‍याल अधूरा ही रह जाता है.

हमारे दिमाग की अनगिनत खूबियों में से एक है, एक बार सोची हुई बात को संभालकर किसी कोने में रख देना. जैसे हम कई बार किसी चीज को घर में बहुत ज्‍यादा संभालकर रख देते हैं, इतना कि भूल ही जाते हैं कि कहां रखा होगा. देर-सबेरे अगर उस चीज की जरूरत हुई तो थोड़ी मुश्किल ही सही, पर हम उस तक पहुंच ही जाते हैं.

ठीक, यही हमारी हसरतों के साथ होता है. इसे हम अपनी चाहत, तमन्‍ना, अरमान के नाम से जानते हैं. जिंदगी कितनी ही खुरदरी क्‍यों न हो, उसमें हसरतों के मुलायम ख्‍वाब होते ही होते हैं. संघर्ष की भट्ठी में तपी जिंदगी से कई बार तमन्‍ना छिटक जाती है. हमारी शख्सियत, हमारे होने में कड़वे अहसासों का स्‍वाद इतना ज्‍यादा हो जाता है कि सारी मुलायमत, नजाकत और जिंदगी के प्रति रोमांच कहीं खत्‍म सा होने लगता है. ऐसे वक्‍त में जरूरी है कि हम जिंदगी को एक आइने की तरह अपने सामने रखें. थोड़ा ठहरकर सोचें, कि हम कहां को चले थे और कहां आकर ठहर गए. हमारी चाहतों के अरमां अभी कितने कम निकले हैं. हमारी जिंदगी का वह अरमान कहां है, जिसकी हमने बचपन से आरजू की थी. वह चाहत कहां है, जिसके लिए मैं बेकरार था.

ये भी पढ़ें: डियर जिंदगी : तुम आए नहीं!

जिंदगी में बहुत संघर्ष है, हर कदम पर कुछ कसैना स्‍वाद आ जाता है. लेकिन इसके मायने यह नहीं कि जिंदगी को अपनेपन, मासूमियत और ख्‍वाब देखने की आदतों से दूर कर दिया जाए. जिसके दिल में जितनी कोमलता बची रहेगी, उसके मनुष्‍य बने रहने की संभावना भी उतनी ही होगी. इसलिए अपनी तमन्‍ना, हसरतों की पर्ची संभाल कर रखें. जिंदगी को बासी, रूखी होने से आपकी तमन्‍ना ही बचा सकती है.

ये भी पढ़ें: डियर जिंदगी : जिंदगी के दुश्‍मन हैं, सोचना और बस सोचते ही रहना!

कुछ दिन पहले किताब की दुकान पर एक बेहद शानदार शख्सियत से मिलना हुआ. वह रेलवे में बुकिंग क्‍लर्क हैं. गाजियाबाद से दिल्‍ली जाने-आने के लिए हर दिन भारी संघर्ष करते हैं. उसके बाद ही सप्‍ताह में दो दिन लगभग 140 गरीब बच्‍चों की शिक्षा के लिए देते हैं. उन बच्‍चों के लिए जो स्‍कूल नहीं जा पाते. मैंने पूछा, 'इतना समय और ऊर्जा कहां से लाते हैं.'

25 बरस के इस नौजवान ने शालीनता से स्‍पष्‍ट जवाब दिया. मैं आपको समझा नहीं सकता. इस बात का कोई उत्‍तर ही नहीं है, क्‍योंकि मैं यह सब किसी उददेश्‍य के लिए नहीं कर रहा हूं. मैं केवल इसलिए कर रहा हूं, क्‍योंकि यह मेरी तमन्‍ना थी कि जिंदगी में कुछ ऐसे बच्‍चों के लिए करूं, जो बदले में मुझे कुछ न दे सकें.

ये भी पढ़ें: डियर जिंदगी : बच्‍चे कैसे निकलेंगे 'उजाले' के सफर पर...

हम कहते हैं कि युवा संवेदशनशील नहीं हैं. उनमें समाज के लिए कुछ करने का जज्‍बा कम हो रहा है. असल में ऐसा कहते हुए हम उन्‍हें भूल जाते हैं, जो चुपचाप, बेहद शांति से वह काम कर रहे हैं, जिसके जिक्र भर से दूसरे घबरा जाएं.

इस युवा ने कहा, वह अपनी तमन्‍ना पूरी कर रहा है. वह अपनी हसरते पूरी कर रहा है. जिंदगी ने पहले उसकी जरूरतें पूरी कर दी हैं, अब वह बाकी समय अपनी हसरतों को दे रहा है. और आप! क्‍या आप भी ऐसा कुछ कर रहे हैं, तो कभी आपकी तमन्‍ना थी, सोचिएगा!

यह डियर जिंदगी का 150 अंक है. आपकी पठनीयता और प्रेम का एक बार फि‍र आभार. इस आभार के साथ इतना अनुरोध भी कि अपनी तमन्‍ना को अपने दिल-दिमाग से कभी दूर मत करिएगा.

सभी लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें : डियर जिंदगी

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

By continuing to use the site, you agree to the use of cookies. You can find out more by clicking this link

Close