डियर जिंदगी : आपके लिए ‘दूसरा’ जिम्‍मेदार नहीं

वह काम जो हमारे लिए सबसे अधिक प्रिय है, उसके लिए हमारे भीतर एक किस्‍म का अनिर्णय बोध है. हम प्राथमिकता तय करने, उसे टालते रहने के मामले में उस्‍ताद हैं.

डियर जिंदगी : आपके लिए ‘दूसरा’ जिम्‍मेदार नहीं

हम भारतीय अपनी किसी भी बात के लिए दूसरे को दोषी ठहराने में लगभग बेमिसाल हैं. अपनी हार का ठीकरा दूसरे पर फोड़ने में हमसे बेहतर लोग कम ही नजर आते हैं. उत्‍तर भारत में यह आदत और अधिक दिखती है. मूल प्रश्‍न के इधर-उधर भटकते रहना हमारा प्रिय शगल है.

वह काम जो हमारे लिए सबसे अधिक प्रिय है, उसके लिए हमारे भीतर एक किस्‍म का अनिर्णय बोध है. हम प्राथमिकता तय करने, उसे टालते रहने के मामले में उस्‍ताद हैं. एक सरल उदाहरण से समझिए. लोग अक्‍सर फोन करते हैं कि मिलना है, आप एक बार उन्‍हें एक खास समय पर मिलने के लिए कह दीजिए. उसी समय उनकी यह मांग समाप्‍त हो जाएगी. क्‍योंकि वह कभी समय पर नहीं आ पाएंगे, हां कुछ समय बाद फिर वही मांग करेंगे और आपके बारे में प्रतिकूल टिप्‍पणियों से सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगेंगे. ऐसे बेरोजगार मिल जाएंगे, जिनके पास आई-फोन का नया वर्जन मौजूद होगा. लेकिन वह थोड़े से भी ऐसे काम से घबरा जाएंगे, जिसमें उनकी योग्‍यता को चुनौती दी जा रही हो.

ऐसे युवा अगर अपने लिए अवसर नहीं तलाश कर पाते, तो उनके लिए कौन जिम्‍मेदार कहलाएगा. ‘डियर जिंदगी’ को लखनऊ से एक ई-मेल मिला. वहां के एक कॉलेज में पढ़ रही छात्रा सरला शर्मा ने जो लिखा है, वह उन सभी के काम का है, जो अपने बारे में दो टूक फैसला नहीं ले पाते.

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सरला ने लिखा है, ‘मैं अभी शादी नहीं करना चाहती. लेकिन घरवालों ने जो रिश्‍ता तय किया है, उससे इंकार भी नहीं कर सकती. क्‍योंकि हमारी आर्थिक स्थिति अच्‍छी नहीं है. और ऐसे में यह रिश्‍ता सर्वोत्‍त्‍म नजर आता है. अब मैं क्‍या करूं, भारी असमंजस में हूं.’ इनसे जो बात हुई उससे दो बातें स्‍पष्‍ट हैं, नंबर एक जिससे शादी होने जा रही है, उसने इनके करियर के लिए एक रोडमैप तैयार किया था, उसके बाद शादी पर सहमति बनी, लेकिन कुछ कारणों से अब लग रहा है कि पता नहीं क्‍या होगा.

मैंने कहा, 'एक बार तय करने के बाद आपको निर्णय पर भरोसा करना होगा. हम हर दो कदम के बाद फैसले नहीं बदल सकते. वैसे बीस बरस की उम्र उन सपनों के लिए सही नहीं, जो और पढ़ने का ख्‍वाब आंखों में लिए हैं. उनके लिए भी नहीं जो जिंदगी में अपने लिए स्‍वतंत्र रास्‍ते तलाश करना चाहते हैं.

और गहराई से संवाद में पता चला कि सरला की आर्थिक स्थिति समस्‍या नहीं हैं. समस्‍या यह है कि उनके माता-पिता ऐसे परिवारों से आते हैं जहां शादी के लिए 20 से 22 बरस पर्याप्‍त उम्र मानी जाती है. इसलिए सरला ने उनका ‘मन रखने’ के लिए हां कर दी थी.

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हमारे देश में युवाओं, विशेषकर ग्रामीण, कस्‍बाई लड़कियों के लिए ऐसी स्‍थि‍तियों से लोहा ले पाना अभी भी बहुत बड़ी चुनौती है. यह चुनौती से अधिक ‘स्‍ट‍ीरियो टाइप’ सोच-समझ का नतीजा है. हमारे आसपास वातावरण ही ऐसा है कि लड़कियां जैसे ही अपने निर्णय लेने की बात कहती हैं, परिवार, समाज अहसज हो जाते हैं.

लेकिन निर्णय तो करना ही होगा. जिस किसी को भी भले ही वह लड़का हो या लड़की अगर अपने सपनों को पंख देने हैं, तो उन्‍हें विरोध की नाव पर सवारी करनी ही होगी.

दूसरों के लिहाज\ संकोच में, परिवार का ‘मन’ रखने के लिए किए गए निर्णय से कभी किसी का भला नहीं होता. सपनों का मोती सरलता के गर्भ में नहीं पलता. विरोध और अपने निर्णय पर टिके रहने का हुनर ही मंजिल तक पहुंचने का मूल गुण है.

इसके बिना आप वह तो हो सकते हैं, जो आपको दूसरे बनाना चाहते हैं. सब बनाना चाहते हैं, लेकिन वह कभी नहीं हो सकते, जो आप चाहते हैं. इसलिए अपने सपनों की पहचान, उनके लिए अंतिम सांस तक लड़ने का गुण जितना जल्‍दी अपना लेगें, जीवन उतना आसान हो जाएगा.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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