डियर जिंदगी : कोलकाता; मनुष्‍य पर सवार ‘इल्लियां’ और संवेदना के ‘ब्‍लैक होल’

राजाराम कहते हैं, 'यहां लोगों की जबान बहुत कड़वी हो गई है.' मैं सोच में पड़ गया कि मुझे तो नजर आती, दिखती भी नहीं. फिर अगले ही पल याद आता है कि असल अनुभव तो इनके पास है. जैसे लोहे का स्‍वाद, लुहार से अधिक घोड़े से पूंछना चाहिए, वैसे ही मनुष्‍यों के बारे में असल बात तो वही बता सकता है, जो उन्‍हें ढो रहा है.

डियर जिंदगी : कोलकाता; मनुष्‍य पर सवार ‘इल्लियां’ और संवेदना के ‘ब्‍लैक होल’

इन‍ दिनों मैं कोलकाता में हूं. शहर जिसने हाल ही में रसगुल्‍ले की मिठास का 'कॉपीराइट' हासिल किया है. हर तरफ लोग हैं. भीड़ है, लेकिन शहर में शोर नहीं दिखता. कुछ ऐसा है जो इसे दिल्‍ली जैसे थोड़े तीखे मिजाज के शहर से अलग दिखाता है. लोग आपकी बात सुनने के लिए रुक जाते हैं, भाषा एकदम से समझ में नहीं आने के बाद भी समझने के लिए रुक सकते हैं. मुझे लगता है कि कोलकाता इस मायने में बहुत हद तक लखनऊ, पटना, भोपाल और जयपुर जैसा है. थोड़ा सरल, सरस सा. कुछ ऐसा जो बिना जाने ठीक लगता है. हवा में उतनी धूल, कड़वाहट भी नहीं, जिससे दिल्‍ली के दिल, दिमाग में रेत भरी जा रही है.

कोलकाता के पार्क स्‍ट्रीट के पास न्‍यू मार्केट में शाम को यूं ही टहलते हुए देर शाम मैं उन 'हाथ-रिक्‍शावालों' से मिला, जो अब शायद कोलकाता में ही चलन में हैं. उनके साथ देर तक बतियाने और गपशप करने के बाद जब एक रिक्‍शेवाले ने कहा कि आपको होटल छोड़ दूं, तो उसके साथ देर तक गपशप करने के बाद भी उसे हां नहीं कह पाया, क्‍योंकि जिस रिक्‍शे को खुद इंसान को अपने हाथ से खींचकर ले जाना हो, उसे देखते ही मानो रसगुल्‍ले के बीच कंकर आ गए.

मुझे लगा यह कौन सा कोलकाता है! यह कौन सा राज है. जिसके लिए हर पांच बरस में जनता को अपने अधिकार दिखाने का कथित अवसर दिया जाता है. अगर इसी गति से देश, समाज को बदलना है, तो बदलने का अर्थ बदलना होगा.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : जापान के बुजुर्गों की दास्‍तां और हमारा रास्‍ता…

मुझे लगा यह एक-दूसरे पर सवार लोग नहीं, बल्कि इंसान पर सवार 'इल्लियां' हैं. एक मनुष्‍य की आत्‍मा पर 'इल्लियों' का इतना बोझ होगा, तो दूसरा कब तक इससे बचेगा, यह समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है, हां समझ हमें भले ही देर से आए.

hath rickshaw humanity, human sensitivity
रामस्‍नेही कोलकाता में लंबे समय से हाथ-रिक्शा चला रहे हैं.

सच पूछिए तो पहली बार कोलकाता में कुछ ऐसा महसूस किया कि जबान में कुछ कड़वाहट महसूस हुई. शायद इसलिए कि हममें से ज्‍यादातर यह मानकर चलते हैं कि हाथ से रिक्‍शे खींचने के दिन बलराज साहनी साहब के साथ विदा हो गए हैं.

'दो बीघा जमीन' के वह दृश्‍य अधिकांश लोगों के दिलो-दिमाग में आज भी हैं, जब साहनी साहब पसीने और थकान से लथपथ अपने हाथों से लोगों को ढो रहे हैं. सरकार और समाज कैसे इतने संवदेनाशून्‍य हो जाते हैं कि उनको अपने ही आसपास के लोग रोबोट से नजर आने लगते हैं.

मेरे देखते ही देखते एक परिवार आता है, हाथ-रिक्‍शेवाले से बहस करता है, केवल पचास रुपए के लिए. उसे पैसे कम करने के लिए तमाम तरह के तर्क देता है. रिक्‍शेवाले के पास तर्क तो हैं, लेकिन विकल्‍प नहीं. इसलिए वह चार लोगों को अपने 'शरीर' पर लाद ही लेता है.

रामस्‍नेही अपने दोस्‍तों के साथ रिक्‍शों के नजदीक बैठे हैं. इनमें अधिकतर बिहार, झारखंड और उप्र से हैं. वह चतरा, झारखंड से हैं, नंगे पांव ही सड़कों पर रिक्‍शे के साथ दौड़ने के सवाल पर कहते हैं कि हम दिनभर चप्‍पल पहनकर नहीं दौड़ सकते. क्‍योंकि दौड़ने में दिक्‍कत होती है. बहुत देर तक सड़क पर इसके साथ दौड़ना संभव नहीं. पांव को चलने की ताकत असल में शरीर से नहीं, उन जरूरतों से मिल रही है, जिसकी उम्मीदें बस पिता, पति, बेटे पर टिकी हैं.

यह भी पढ़ें- डियर जिंदगी : इस तनाव का 'घर' कहां है...

राजाराम कहते हैं, 'यहां लोगों की जबान बहुत कड़वी हो गई है.' मैं सोच में पड़ गया कि मुझे तो नजर आती, दिखती भी नहीं. फिर अगले ही पल याद आता है कि असल अनुभव तो इनके पास है. जैसे लोहे का स्‍वाद, लुहार से अधिक घोड़े से पूंछना चाहिए, वैसे ही मनुष्‍यों के बारे में असल बात तो वही बता सकता है, जो उन्‍हें ढो रहा है. जबकि हम रिसर्च और शोधकर्ताओं के पास मनुष्‍य के अध्‍ययन के लिए चक्‍कर काटते रहते हैं.

एक-दूसरे पर सवार होने में शर्म तो छोडि़ए, इनकी संवेदना की बेशर्मी देखिए कि तेज और तेज चलने के आदेश दिए जा रहे हैं.

hath rickshaw humanity, human sensitivity

हमारे खुद के शक्तिशाली होने के अहसास मात्र से हम संवदेना पर इतने बड़े पत्‍थर रख लेते हैं कि उनकी खरोंच से खुद हमारी आत्‍मा छलनी हो रही है, इसकी ओर भी हमारा ध्‍यान नहीं जाता है. आजादी के बाद हाथ से रिक्‍शे खींचनेवालों को पहले कांग्रेस फिर लगभग तीन दशक तक वामपंथी लाइसेंस देते रहे और अब 'मां, माटी और मानुष' की बातें करने वाली ममता बनर्जी इनसे बाकायदा फीस लेकर इसकी अनुमति दे रही हैं.

देश का ऐसा कोना जो उन सरकारों के लिए जाना जाता रहा है, जो मनुष्‍य के नाम पर बनीं, उन्‍हें यह क्‍यों नहीं दिखता, इसका उत्‍तर उनका उस मनुष्‍य से दूर चले जाना है, जिसके नाम पर वह उसके लिए दुनिया बनाने का छल\दावा कर रही हैं. और जनता इसी दावे पर मिटी जा रही है.

हमेशा याद रखिए कि जो दूसरों की संवदेना से दूर रहेगा, उसके आसपास की दुनिया कभी सुंदर, सुखद नहीं होगी. यही कारण है कि हमारी जिंदगी में हर दिन अवसाद और तनाव पहले की तुलना में अधिक घुलता जा रहा है.

सभी लेख पढ़ने के लिए क्लिक करें : डियर जिंदगी

(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

(https://twitter.com/dayashankarmi)

(अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें: https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

By continuing to use the site, you agree to the use of cookies. You can find out more by clicking this link

Close