डियर जिंदगी: महसूस किए बिना जीते रहना!

जब हम बच्‍चों को दिन-रात अपने पर फोकस करने का पाठ घोलकर पढ़ा रहे हैं, तो उनसे कैसे यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वह सोशल होंगे.

डियर जिंदगी:  महसूस किए बिना जीते रहना!

अगले कुछ अंकों के साथ डियर जिंदगी के सफर को एक बरस पूरा होने वाला है. इस एक बरस में संवाद का जो अवसर मिला, उससे मुझे भी चीजों के बारे में सोचने-समझने और निर्णय लेने का नया नजरिया मिला. रविवार को पटना से एक पाठक रमेश कुमार ने लिखा, 'हम चीजों को बिना महसूस किए जी रहे हैं. हम चीजों को जुटाए जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ जी नहीं रहे. जीने का वक्‍त ही नहीं, हमारे पास. इन चीजों में पहले भौतिक जरूरत की बातें हुई, लेकिन उसके बाद हालत यह हो गई है कि रिश्‍तों को भी हमने इसी श्रेणी में डाल दिया.'

रमेश कुमार ने हम सबकी दुखती रग पर हाथ रखा है. किस्‍से को कुछ ऐसे समझिए कि एक शिक्षक हैं, जो स्‍कूल में बच्‍चों को समझाते हैं कि परिवार के साथ रहना जरूरी है. माता-पिता का बच्‍चों के साथ और बच्‍चों का माता पिता के साथ समय बिताना बेहद जरूरी है. लेकिन वह जैसे ही अपने घर पहुंचते हैं, सबसे पहले मोबाइल फोन पर व्‍यस्‍त हो जाते हैं. वह स्‍मार्टफोन पर स्‍कूल का काम नहीं करते, दुनिया से जुड़ते हैं. दोस्‍तों से गपशप करते हैं. बच्‍चे और खुद उनके माता-पिता उनके पीछे दौड़ते रहते हैं कि कब उन्‍हें परिवार के लिए समय मिल जाए.

डियर जिंदगी: मेरी अनुमति के बिना आप मुझे दुखी नहीं कर सकते!

परिवार के लिए समय नहीं. दोस्‍तों के लिए समय नहीं. रिश्‍तेदारों के लिए समय नहीं, तो यह समय जाता कहां है. कौन है, जो इसे सोख रहा है. यह अकेले स्‍मार्टफोन का किया धरा नहीं है. इसके लिए सारी जिम्‍मेदारी उस पर नहीं थोपी जा सकती. उससे कहीं अधिक जिम्‍मेदारी हमारी परवरिश की है. हमें कैसे पाला पोसा गया और अब हम कैसे अपने बच्‍चों को पाल-पोसकर बड़ा कर रहे हैं, सबकुछ इससे ही तय हो रहा है.

जब हम बच्‍चों को दिन-रात अपने पर फोकस करने का पाठ घोलकर पढ़ा रहे हैं, तो उनसे कैसे यह अपेक्षा कर रहे हैं कि वह सोशल होंगे. हम बच्‍चों को खुद ही रोबोट बनाने के मिशन में लगे हुए हैं. इससे एकाकी, दुखी और नीरस समाज ही तैयार होगा. बिना दूसरों से घुले-मिले बच्‍चे, अपने-अपने कमरे में कैद बच्‍चे नीरस ही होंगे. कंप्‍यूटर, मोबाइल से घिरे और कार्टून के किरदारों से रिश्‍तेदारी निभाते बच्‍चे मनुष्‍य और मनुष्‍यता से दूर ही जाएंगे. उनके पास अपने पड़ोसी तो दूर, परिवार तक के लिए भावनाएं कम होती जा रही हैं. क्‍योंकि वह दूसरे के अहसास को महसूस नहीं कर पा रहे हैं. हम खुद के बारे में सोचना शुरू करते हैं और हमारी सोच इसी खुद पर आकर खत्‍म हो जाती है.

डियर जिंदगी : 'चीजों' की जगह अनुभव चुनिए...

चार्ली चैपलिन ने लिखा है, 'हम सोचते बहुत हैं, लेकिन महसूस बहुत कम करते हैं.'  हम महसूस इसलिए कम करते हैं, क्‍योंकि हम प्रकृति और मनुष्‍य दोनों से दूर भागते जा रहे हैं. हम असल में खुद से भागते जा रहे हैं. और निरंतर भागते रहने वाले के पास किसी के लिए समय नहीं होता. अपने लिए भी नहीं. इसलिए वह महसूस किए बिना जीने का अभ्यस्त होता जाता है. क्‍योंकि उसका ध्‍यान कहीं और है. कहां है, उसे भी नहीं पता. क्‍योंकि उसने कभी इसे महसूस करने पर ध्‍यान ही नहीं लगाया.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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