डियर जिंदगी : जिंदगी 'धूप' में ही संवरती है...

समय अपनी गति से ही बढ़ रहा है. हां, हुआ इतना है कि पहले सबसे बड़ी रुकावट आर्थिक थी. अब वह अलग-अलग रूपों में हमारे सामने है. अब से पहले शायद ही कभी युवा में डिप्रेशन के इतने लक्षण दिखते थे.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Jan 12, 2018, 02:03 PM IST
डियर जिंदगी :  जिंदगी 'धूप' में ही संवरती है...

युवा होना असल में एक 'मनोदशा' है. इसका उम्र से बहुत गहरा संबंध नहीं है. हम युवा होने के नारे को अक्‍सर गर्व के साथ हवा में उछलते हुए दि‍खते हैं, बस. युवा होने का दम भरते हैं. उसके बाद क्‍या! जैसे केवल 'विश्‍वगुरु' कहने भर से हम विश्‍वगुरु नहीं हो जाएंगे. उसके लिए शिक्षा संस्‍थानों को नए सिरे से संवारना जरूरी है. शिक्षा व्‍यवस्‍था में नए रंग भरने होंगे. वैसे ही युवा होने के महत्‍व को सबसे पहले युवा को ही समझना जरूरी है.

इसे परवरिश में आए बदलाव का असर कहिए, वातावरण में संघर्ष के प्रति दुलार की कमी कहिए. चाहे जो नाम दीजिए, लेकिन बुनियादी सवाल तो बस इतना है कि हमारे युवाओं में सबसे अधिक कमी अपने समय के संघर्ष को संभालने की है. हमारे युवा जिन बातों से अब आए दिन घबराए से दिख रहे हैं, उनसे कहीं मुश्किल हाल में उनके 'सीनियर्स' ने जिंदगी की राह निकाली थी. ऐसा नहीं था कि जिंदगी का सफर पहले आसान था, अब मुश्किल हो गया या पहले मुश्किल था, अब असंभव हो गया!

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समय अपनी गति से ही बढ़ रहा है. हां, हुआ इतना है कि पहले सबसे बड़ी रुकावट आर्थिक थी. अब वह अलग-अलग रूपों में हमारे सामने है. अब से पहले शायद ही कभी युवा में डिप्रेशन के इतने लक्षण दिखते थे. अब आत्‍महत्‍या की बढ़ती संख्‍या जिस तरह हमें डरा रही है. वैसा पहले कभी नहीं था. नेशनल इं‍स्‍टीट़यूट ऑफ मेंटल हेल्‍थ एंड न्‍यूरो साइंस के नेशनल मेंटल हेल्‍थ सर्वे में यह बात प्रमुखता से सामने आई है. इसके अनुसार देश के 18 से 29 बरस के युवाओं में से लगभग 8 प्रतिशत मानसिक रोग से परेशान हैं. इतना ही नहीं 22 से 25 साल की उम्र के 65 प्रतिशत और 26 से 30 की उम्र के 60 प्रतिशत युवाओं में डिप्रेशन के लक्षण हैं. इस सर्वे के अनुसार देश के युवा डिप्रेशन की चपेट में कहे जा सकते हैं.

तो जिस 'युवा' के भरोसे हम देश, समाज में परिवर्तन की आस लगाए बैठे हैं. जिसके दम पर हम युवा-युवा कर रहे हैं, भला वह कैसे अपनी पूरी क्षमता, ऊर्जा शोध, अनुसंधान और उन नए रास्‍तों को तलाशने में लगाएगा, जिनसे किसी देश को नई दिशा मिल सके. इसे इस तरह से भी समझा जाना चाहिए कि जब किसी काम का सृजक ही स्‍वस्‍थ नहीं होगा तो सृजन कितना सटीक होगा.

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जिंदगी 'धूप' में ही संवरती है. घर, परिवार और समाज को सबसे अधिक समय, स्‍नेह और समझ बच्‍चों में लगाने की जरूरत है. साथ ही बच्‍चों को इस तरह से तैयार करना है कि वह संघर्ष के लिए अधिक सक्षम बनें... अभी तो हालत यह है कि हालात उनके जरा से खिलाफ होते ही वह डिप्रेशन और तनाव से घिरने लगते हैं. उनमें संघर्ष करने की क्षमता हर दिन कम होती दिख रही है.

इस समस्‍या के बीज बहुत हद तक हमारी परवरिश में भी हैं. हम बच्‍चों को कभी न नहीं कहते, कभी उनकी बात को टालते नहीं दिखते. उनके लिए हर चीज हर कीमत पर उपलब्‍ध कराने को तत्‍पर रहते हैं. क्‍योंकि हम अभिभावक के रूप में खुद को परफेक्‍ट दिखाना चाहते हैं. बच्‍चे की नजर में एक किस्‍म का खरीदा हुआ आदर चाहते हैं कि माता-पिता उसके लिए सबकुछ करने को तैयार हैं.

यही हमारा बोया हुआ बीज आगे चलकर बच्‍चों को संघर्ष की धूप में टिके रहने में कमजोर बनाता है. वरना क्‍या कारण है कि छोटे शहरों के बच्‍चों में संघर्ष और कुछ हासिल करने की चाहत महानगर के बच्‍चों की तुलना में कहीं अधिक होती है. वह 'मिट्टी' के अधिक होने के साथ उसके रंग से अधिक परिचित होते हैं. इसलिए भी उनमें रास्‍ता तलाश लेने और टिके रहने का गुण कहीं अधिक होता है. जीवन का यह गुण दूसरी किसी भी योग्‍यता के मुकाबले मायने रखता है. इसलिए बच्‍चों को संघर्ष के लिए बचपन से तैयार कीजिए. उनमें जिंदगी की धूप सहने का हुनर एक दिन में नहीं आएगा. यह हुनर उस जीवनशैली का हिस्‍सा होना चाहिए, जिसकी छांव में उनकी परवरिश हो रही है.

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