डियर जिंदगी : हमें पुल बनाने हैं, दीवारें नहीं...

दोस्‍तों, परिवार और सहकर्मियों के बीच अक्‍सर जरा-जरा सी बात पर मनमुटाव से शुरू हुई बाधा 'दीवार' का रूप लेती जाती है. हम समझ नहीं पाते, टालते रहते हैं. टलते-टलते दीवारें अक्‍सर हमारे मन, मस्तिष्‍क से होते हुए हमारी कोमल और उदार भावना को चट कर जाती हैं.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Jan 9, 2018, 05:34 PM IST
डियर जिंदगी : हमें पुल बनाने हैं, दीवारें नहीं...

बारिश के दिनों में अक्‍सर इस तरह के समाचार आते हैं कि किसी गांव में लोगों ने किस तरह से जुगाड़ करके पुल बना लिए हैं. हर मौसम में इस तरह की तस्‍वीरें आती हैं, लेकिन कितने पुल कहां बनते हैं. इसका हिसाब मिलना ज़रा मुश्किल है. क्‍योंकि पुल बनाने में हमारी आस्‍था तनिक कमजोर है.

असल में हमारी आस्‍था दीवार बनाने में कहीं ज्‍यादा है. देखिए न हम चीन की दीवार का अक्‍सर जिक्र करते रहते हैं. क्‍योंकि यह हमारे लिए गौरव और महानता की कहानी है. यह तो देश की बात हुई. जिसने अपनी सुरक्षा के लिए एक व्‍यवस्‍था के तहत दीवार की तकनीक को अपनाया था. लेकिन जिंदगी ठीक इसके उलट है. यह बात कुछ और है कि जिंदगी में भी हमने दीवार बनाने को ही सबसे ज्‍यादा महत्‍व दिया है. जैसे ही जरा सी अनबन हुई और हम दीवारें बनाने में जुट गए. कंक्रीट की दीवारें तो बनाई, मिटाई जा सकती हैं, लेकिन मन की दीवारों को गिराना बेहद मुश्किल है.

बल्कि मुश्किल और असंभव के बीच का मामला है, मन की दीवारों को गिराना. मन की दीवारों को गिराना जरूरी होने के साथ बेहद कठिन भी है. यह दीवारें जैसे-जैसे पुरानी होती जाती हैं, इनका टूटना उतना ही मुश्किल होता जाता है. इन पर कटुता के जाले, अहंकार की परतें इतनी मजबूत होती जाती हैं कि कई बार ताउम्र यह दीवार नहीं टूटती.

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दोस्‍तों, परिवार और सहकर्मियों के बीच अक्‍सर जरा-जरा सी बात पर मनमुटाव से शुरू हुई बाधा 'दीवार' का रूप लेती जाती है. हम समझ नहीं पाते, टालते रहते हैं. टलते-टलते दीवारें अक्‍सर हमारे मन, मस्तिष्‍क से होते हुए हमारी कोमल और उदार भावना को चट कर जाती हैं.

इन दिनों हमारे आसपास जो अशांति, बेचैनी और अविश्‍वास का शोर है, उसके केंद्र में वह दीवारें हैं, जो हमने अपने आसपास बुन ली हैं. कई बार ऐसी दीवारों की पहचान खुद के दिल-दिमाग के लिए भी मुश्किल हो जाती है. यह दीवारें हमें हमेशा अहसास कराती हैं कि हम तो हमेशा वही थे. हम तो बदले ही नहीं. हम तो बड़े ही दिलवाले हैं. दूसरों को ही रिश्‍तों की कद्र नहीं थी. हमने तो कभी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी. उसके बाद भी अगर कोई 'दीवार' है तो वह हमारी ओर से नहीं हो सकती.

जबकि इस बात की कतई गारंटी नहीं दी जा सकती कि 'दीवार' का निर्माण एकतरफा रहा होगा. अक्‍सर दोनों ओर से दीवार के निर्माण में 'सहयोग' दिया जाता है.

अब बात पुल की. अपने आसपास उन लोगों पर एक नजर डालिए. जिन्‍हें आप सुकून, सफलता और शांति में पाते हैं. तो आप समझ जाएंगे कि वह असल में अपनी जिंदगी में अधिक से अधिक 'पुलों' का सृजन कर पाने में सक्षम रहे हैं.

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'पुल' के मायने हैं, समावेशी होना. रिश्‍तों को गलतफहमी, विवादों के जंजाल से निकालने और संभालने की कला का जानकार. जो जिंदगी में जितने अधिक पुल बनाएंगे, उनकी जिंदगी उतनी ही सरस होगी. लोगों से दूर छिटकते जाना, रिश्‍तों से किनारे करते जाने से केवल 'दीवार' बनती है. जो हर तरफ से जिंदगी को घेरकर उसे अकेलेपन, आशंका और दुविधा के दलदल में फेंक देती है.

इसलिए जहां तक संभव हो, जिंदगी में रिश्‍तों, संबंधों के नए पुल बनाइए. और हां जितने पुल बनाएं, उतना ही समय उन दीवारों को तोड़ने में भी लगाएं, जो किसी भी कारण से सही, मगर बन तो गई ही हैं.

नए 'पुल' बनाने और 'दीवार' तोड़ने की शुभकामना के साथ.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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