डियर जिंदगी : जापान के बुजुर्गों की दास्‍तां और हमारा रास्‍ता…

युवा अपने में खोए हुए हैं. वह अपने सपनों, ख्‍यालों की दुनिया में इतने खोए हैं कि उन्‍हें बुजुर्गों की परवाह ही नहीं है. यह लापरवाही बहुत हद तक अपने बड़ों को देखते हुए पनपती है.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Apr 3, 2018, 01:22 PM IST
डियर जिंदगी : जापान के बुजुर्गों की दास्‍तां और हमारा रास्‍ता…

जापान के बारे में बारे अधिकतर भारतीयों के पास सुखद कहानियां हैं. जापान में जिंदगी बेहद आसान है, वहां सबकुछ सुलभ है. वहां के अनुशासन और तकनीक की अनंत कहानियां भारतीय जनमानस में हैं. लेकिन वहां का समाज संपन्‍न होने के साथ अपने बुजुर्गों के प्रति कितना संवेदनशील है, इस बारे में कम ही विमर्श हुआ है. जबकि दूसरी ओर हम अमेरिका और यूरोप में बुजुर्गों को मिल रही सुविधाओं, उनके लिए चल रही योजना के बारे में अक्‍सर बात करते रहते हैं. अमेरिका में डोनाल्‍ड ट्रंप के आने के बाद से जिस तरह से वहां के नागरिकों के लिए परोपकारी ‘ओबामा केयर’ का बजट शून्‍य सरीखा कर दिया गया है, उसके बाद भी वहां सामुदायिक सेवा से जुड़ी अनेक योजनाएं चल रही हैं.

दूसरी ओर जापान से एक चौंकाने वाली खबर आ रही है. वहां बुजुर्ग अपराधियों की संख्‍या बेहद तेजी से बढ़ रही है.वहां 2016 में जेल में बंद अपराधियों में 20 प्रतिशत 65 साल से ज्‍यादा के हैं. यह भी ध्‍यान देने की जरूररत है कि यह 29 साल के अपराधियों की तुलना में दोगुनी है. 2016 में जेल में बंद बुजुर्ग अपराधियों में से 70 फीसदी पहले सलाखों के पीछे वक्‍त गुजार चुके थे.

दूसरी ओर अमेरिका में कुल गिरफ्तारियों में से 65 प्रतिशत से अधिक की उम्र के केवल एक प्रतिशत लोग हैं. यह इस बात को स्‍थापित करने के लिए पर्याप्‍त है कि अमेरिका अपने वरिष्‍ठ नागरिकों का प्रबंधन कहीं बेहतर तरीके से कर पा रहा है. वहां के समाजशास्‍त्री इस आंकड़े को अकेलेपन और उदासी से जोड़ते हैं.

युवा अपने में खोए हुए हैं. वह अपने सपनों, ख्‍यालों की दुनिया में इतने खोए हैं कि उन्‍हें बुजुर्गों की परवाह ही नहीं है. यह लापरवाही बहुत हद तक अपने बड़ों को देखते हुए पनपती है. यह आज जिस भी दशा में हैं, वहां तक पहुंचने में इन्होंने दशकों का सफर तय किया है. आज वहां जो पीढ़ी उम्र के वरिष्‍ठतम पड़ाव पर है, वहां से ही अपने से बड़ों की अवहेलना की शुरुआत हुई होगी. एक अध्‍ययन में इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि आर्थि‍क तंगी और सरकार के पास योजनाओं की कमी के चलते भी वहां बुजुर्ग अकेलेपन और गहरी उदासी की ओर बढ़ते हुए अपराध की ओर बढ़ रहे हैं.

बड़ों के प्रति आदर, प्रेम एक दिन में खत्‍म नहीं होता. अनादर, तिरस्‍कार का भाव तो धीरे-धीरे दीमक की तरह काम करता है और एक दिन हम पाते है कि यह आंख से आदर का आंसू चट कर जाता है. जापान में भी यही हो रहा है. जो भी समाज अपने जीवन के प्रति एकाकी राग अपना लेता है, उसके यहां यह संकट विकराल रूप ले लेता है. जापान में बहुसंख्‍यक जनता के ‘डीएनए’ में ‘कम के साथ जीने, लेकिन सबके साथ बांटने’ की शैली रही है. शायद, यही बड़ा कारण है कि हमारे देश में बुजुर्ग बहुत हद तक परिवार का हिस्‍सा हैं.

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लेकिन अब भारत में भी बढ़ते शहरीकरण, जनसंख्‍या के दवाब और रोजगार के साधनों की कमी के कारण परिवार का तानाबाना बिखर रहा है. मध्‍यप्रदेश, उप्र जैसे पारंपरिक रूप से मध्‍यमवर्गीय मूल्‍यों वाले प्रदेशों के गांव के गांव अब खाली होते जा रहे हैं. यहां अधिकांश घरों से युवा नदारद हैं. यहां घरों में बुजुर्ग अकेले हैं. इन अकेले बुजुर्गों के पास बेहद सीमित चिकित्‍सा और आय के साधन हैं. खेती किसानी हांफने लगी है, जिससे बच्‍चे शहरों की ओर निकल गए हैं. शहरों में भले ही वह बंधुआ मजदूर की जिंदगी जी रहे हों, लेकिन कुछ बनने की लालसा और अवसर की कमी के कारण गांव की ओर नहीं देखना चाहते.

देश में सरकारों का ध्‍यान गरीबों के लिए पेंशन और चिकित्‍सा सुविधाओं की ओर से हर दिन घटता जा रहा है. इससे देश में बुजुर्गों की स्‍थिति निरंतर दयनीय होती जा रही है. इस तरह भारतीय समाज बुजुर्गों की दशा के मामले में अपनी परंपरागत, संस्‍थागत स्थिति से नीचे की ओर जा रहे हैं. जापान और यूरोप के समाज मूल्‍यों की ओर हमारी ओर देखते रहे हैं, अब भी देख रहे हैं, लेकिन अगर हम अपनी ही राह से भटक गए तो हमारे समाज की सिथति उनके समाज से कहीं अधिक भयावह होगी.

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