डियर जिंदगी : जिसे बाहर खोज रहे हैं, वह तो भीतर है...

हम सभी तो आज बड़े हैं, क्या यकीन के साथ कह सकते हैं कि जब हम स्‍कूल में थे, तो क्‍या वहां भी इतना ही तनाव था. क्‍या हमारे माता-पिता भी हमें लेकर इतने तनाव में रहते थे. मैं पूरे विश्‍वास के साथ कहना चाहता हूं कि नहीं.

Dayashankar Mishra दयाशंकर मिश्र | Updated: Nov 3, 2017, 03:13 PM IST
डियर जिंदगी :  जिसे बाहर खोज रहे हैं, वह तो भीतर है...

तनाव! इन दिनों सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला शब्‍द है. हमारे आसपास शायद कुछ ही लोग मिलेंगे, जो तनाव से अपरिचित हों. तनाव से जिनकी मित्रता न हो, उनका जीवन कितना सौम्‍य, शांत और सुखी होगा, इसकी बस कल्‍पना की जा सकती है. इसे समझना थोड़ा नहीं बहुत मुश्किल है. हम वर्तमान से अक्‍सर इतने खिन्‍न रहते हैं कि उसमें रहना ही नहीं चाहते. बच्‍चे बड़े होना चाहते हैं. बड़े बच्‍चे होना चाहते हैं. लेकिन दोनों जहां है, वहां नहीं रहना चाहते! इन दिनों तो दस से पंद्रह साल के बच्‍चों के मुंह से यह तनाव शब्‍द उतना ही सुनने को मिल रहा है, जितना बड़ों की दुनिया में यह गूंजता रहता है.

हम सभी तो आज बड़े हैं, क्या यकीन के साथ कह सकते हैं कि जब हम स्‍कूल में थे, तो क्‍या वहां भी इतना ही तनाव था. क्‍या हमारे माता-पिता भी हमें लेकर इतने तनाव में रहते थे. मैं पूरे विश्‍वास के साथ कहना चाहता हूं कि नहीं. हमारे स्‍कूल के दिन कहीं अधिक सुकून वाले दिन थे. हमारे माता-पिता के पास भी निश्‍चित रूप से साधन कम थे, लेकिन वह तनाव में नहीं थे. फिर तब और अब में ऐसा क्‍या हुआ कि तनाव जानलेवा स्‍तर तक पहुंच गया.

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ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमारा पूरा सामाजिक 'सिस्‍टम ' बदल गया. पहले हर किसी के पास आशा, प्रेम और स्‍नेह बहुत अधिक था.गहरे भरोसे के साथ सबसे कीमती चीज थी, एक-दूसरे के पूरक होने का अहसास. पूरक होने के अहसास का अर्थ है, अपने से अधिक दूसरे पर भरोसा और उसकी कामयाबी में अपने लिए 'जगह'. अब यह सारी सोच ही गायब हो गई है.

आज हम भविष्‍य के बारे में जरूरत से ज्‍यादा सोच रहे हैं. कोई लाख भरोसा दिला रहा है, लेकिन यकीन नहीं होता. क्‍योंकि हम अपने कहे की रक्षा खुद नहीं करते. यह अविश्‍वास सृष्टि में घूमते-फि‍रते हम तक लौट ही आता है. माता-पिता की शिक्षाएं 'ताजा' माता-पिता को बेईमानी लग रही हैं. हम बच्‍चों से वह उम्‍मीदें पाले जा रहे हैं, जिनकी पूर्ति वह खुद कभी नहीं कर सके. बच्‍चों पर नंबर, प्रदर्शन का जरूरत से ज्यादा दवाब हम हर दिन बढ़ा रहे हैं.

कक्षा में कमजोर, पढ़ाई में पीछे रहने वाले बच्‍चों के लिए क्‍या शिक्षक और उसके दोस्‍त वह माहौल दे रहे हैं, जो आज से बीस बरस पहले था. पहले उसके सामने अपने होने का इतना संकट नहीं था. जितना आज है.

डिप्रेशन और आत्‍महत्‍या का खतरा हर दिन बढ़ता जा रहा है. क्‍योंकि, हम समाज के रूप में एक-दूसरे के लिए अनिवार्य प्रेम से दूर भाग रहे हैं. पहले हम असफलता को कहीं अधिक सरलता से स्‍वीकार करते थे. मुझे अपने बच्‍चों की परवरिश को लेकर सबसे बड़ी चुनौती यही लगती है कि क्‍या मैं और मेरी पत्‍नी अपने बच्‍चों को उतना शांत माहौल दे पाएंगे, जितना मेरे और उनके माता-पिता से हमको मिला था. बच्‍चों से कोई अपेक्षा नहीं रखना, केवल उन्‍हें उनके संरक्षक के रूप में साधन उपलब्‍ध करवाने का विचार जितनी तेजी से गायब हो रहा है, तनाव उसी गति से जिंदगी में शामिल हो रहा है.

सफलता और असफलता से कहीं अधिक जरूरी दृष्टिकोण है. हममें से अधिकांश के पास दृष्टि तो है लेकिन दृष्टिकोण नहीं है. हमारी पहचान, कामयाबी दृष्टि से अधिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है. यह दृष्टिकोण पाना है तो हमें अपने भीतर की दुनिया से जुड़ना होगा. मन जब तक बाहर भटकेगा, वह उन चीजों में उलझा रहेगा जो बाहर से ग्‍लैमरस दिखती हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वह मेरे सफर का हिस्‍सा हों. उनकी ओर जाना अंत में तनाव के सिवा कुछ नहीं देगा. दूसरी ओर भीतर से चुनी गई राह, जिस पर अभी इस समय हम भले ही अकेले ही चल रहे हों, हमें वहां ले जाएगी, जहां हमें संभवत: जाना है. इसलिए, भीतर की आवाज सुनने के लिए अपने नजदीक शांति और समझ रखना खुद को बचाए रखने की दिशा में बेहद जरूरी कदम है.

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