डियर जिंदगी : कौन जाएगा 'नए' के तट पर...

यह सब बातें करने वाले हमारे भारत देश में नए साल का जश्‍न अब सबसे बड़े उत्‍सव के रूप में उभर रहा है. नया है, कहां मित्र! नए को अपना और आगे बढ़कर उत्‍साह से उसे गले लगाने के लिए जो खुला मन और चेतना चाहिए हम हर दिन उससे दूर जा रहे हैं. हम धीरे-धीरे 'नारेबाज' समाज और देश के रूप में खुद को स्‍थापित करते जा रहे हैं.

डियर जिंदगी : कौन जाएगा 'नए' के तट पर...
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हमें अतीत बहुत प्रिय है. अतीत की गलियों में भटकते हुए हम अक्‍सर पुराने से चिपके रहते है. हमारे जीवन में जैसे ही नए की आहट होती है, हम चौकन्‍ने हो जाते हैं. अरे! यह क्‍या हो रहा है. अब इस पर भी बात होगी! क्‍यों भाई, इस पर बात क्‍यों नहीं हो सकती. क्‍योंकि पहले नहीं की गई. क्‍योंकि पहले इस पर सोचा, लिखा और समझा नहीं गया. पहले नहीं किया गया तो अब क्‍यों नहीं.

क्‍योंकि, पहले नहीं किया गया तो अब नहीं, यह हमारी जड़ता की चरमसीमा है. जिसे हम हर दिन नई ऊंचाई पर ले जा रहे हैं. हमें वही चाहिए जो हमारी बुद्धि में आसानी से समा जाए. सरल भाषा में जिसे हम आसानी से पचा पाएं. इसलिए हमें हमारे देश में गहरे विमर्श वाले सेमिनार में गिनती के लोग रहते हैं. विज्ञान, कला और संगीत की कायदे की बात कहने वाले जितने कम हो रहे हैं, उससे कम तो सुनने वाले हो रहे हैं. जैसे ही कोई नई फि‍ल्‍म, किताब, रचना आती है, जिसमें ऐसा कुछ है जो हमारी 'धारणा' के विपरीत है तो हम असहज को जाते हैं. क्‍योंकि हमने तो ऐसे सोचा ही नहीं, जैसे वह 'रच' रहा है.

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यह सब बातें करने वाले हमारे भारत देश में नए साल का जश्‍न अब सबसे बड़े उत्‍सव के रूप में उभर रहा है. नया है, कहां मित्र! नए को अपना और आगे बढ़कर उत्‍साह से उसे गले लगाने के लिए जो खुला मन और चेतना चाहिए हम हर दिन उससे दूर जा रहे हैं. हम धीरे-धीरे 'नारेबाज' समाज और देश के रूप में खुद को स्‍थापित करते जा रहे हैं. एक ऐसा समाज, जिसमें विचार से अधिक महत्‍व 'शोर' का हो गया है. जहां हल्‍ला करना संवाद करने से कहीं अधिक जरूरी हो गया है.

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हमें जो करना चाहिए हम उसके उलट कर रहे हैं. नए बरस की चिंता में 'वजन' कम करने की जगह हमें जीवन में कुछ नया कैसे हो, इस पर ध्‍यान देना चाहिए. जब तक हम पुराने से चिपके, उसकी तलाश में भटकते रहेंगे, नए के नजदीक नहीं पहुंच सकेंगे! जब तक नए की तलाश में नहीं निकलेंगे, वह आएगा कहां से!

नए की कमी नहीं है. कमी हमारी नजर में है. हम नए की ओर जाते नहीं. तो वह आएगा कहां से. बचपन से हमें दूसरों की कहानियां रटाई जाती हैं. दूसरों के किस्‍से दिमागों में ठूसे जाते हैं. इतिहास को अपनी पसंद के अनुसार तोड़कर हम बच्‍चों के दिमाग में भरते हैं. ताकि वह उसके रास्‍ते पर चल सकें.

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हम भूल जाते हैं कि इतिहास का काम रास्‍तों का निर्माण करना नहीं, बस सबक लेना है. कि अमुक रास्‍तों पर चलते हुए इससे पहले के पथिकों को क्या परेशानियां आईं. हमें इतिहास इसलिए नहीं पढ़ना कि वही करना है, जो अब तक होता आया है.

अतीत से चिपके रहने के कारण ही हमारे देश में आज भी अनेक राज्‍यों में सती को पूजा जाता है. बाल-विवाह के कारण अब भी लाखों बच्‍चों का दिमाग और मन उन विषयों में उलझा रहता है, जिसकी उन पर छाया भी नहीं पड़नी चाहिए. जीवन इसलिए नहीं मिला है कि वह तय रास्‍तों पर चला जाए. जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता यही है कि उसमें हर किसी को अपना रास्‍ता चुनने का अवसर मिले.

नया रास्‍ता चुनने का अवसर मिलने के लिए स्‍वतंत्रता पहली शर्त है. इस स्‍वतंत्रता तक पहुंचने की पहली कड़ी नवीनता है. हमें स्‍वतंत्रता कौन देता है. जिसके दिमाग के जाले साफ हैं. जिसके मन में उलझन नहीं है. जिसके इरादे स्‍पष्‍ट हैं. वही नए की ओर जा पाएगा.

हमने अपने मन को अतीत के मोह से जकड़ रहा है. जैसा होता आया है, वैसा ही होता रहे. जैसा चल रहा है, वैसा ही चलता रहे. यही मोटे तौर पर हमारी जीवनशैली बन गई है. यही कारण है कि जब भी कोई नया विचार हमारे बीच आता है, हम उस पर संवाद की जगह संघर्ष करने लगते हैं. जो समाज संवाद को छोड़ देगा, उसके लिए विचार, चिंतनशील बने रहना निरंतर मुश्किल होता जाएगा.
इसलिए, नए की ओर चलिए. नए में प्रवेश करिए. नए बरस में मत उलझिए. इससे हर बरस आप एक ही जगह रहेंगे, कहीं पहुंचेगे, नहीं!

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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