डियर जिंदगी : 'तुम' पहले जैसे नहीं रहे...

दुनिया तेजी से बदल रही है. जिम्‍मेदारी बदल रही है. काम का बोझ बढ़ रहा है. ऐसे में रिश्‍तों के बीच प्रेम का संतुलन गड़बड़ा गया है.

डियर जिंदगी : 'तुम' पहले जैसे नहीं रहे...

जब कभी, जहां भी, जो कोई भी अपने अंतर्मन से जिस रंग में होता है, तो उसे बस वही रंग दिखता है. हर तरफ उसे वैसा ही रंग नजर आता है. जब आप खुश होते हैं, तो दुनिया आपको खुश नजर आती है. अगर आप दर्द में हैं, दुखी हैं तो हर कोई वैसा ही नजर आता है. दुनिया होती अपने ही रूप में है लेकिन हम उसे उसके मूल स्‍वरूप में देखने की जगह उस भावना के चश्‍मे से देखते हैं, जो हम पर हावी/भारी होती है.

'डियर जिंदगी' के प्रिय पाठकों में ऐसे युवाओं की बड़ी संख्‍या है, जो इस समय जिंदगी में बड़े फैसले करने जा रहे हैं. कोई करियर शुरू कर रहा है. कोई प्रेम में है. कोई प्रेम की ओर बढ़ रहा है. कोई उस रिश्‍ते को जीवनसाथी में बदल रहा है. तो कोई एक 'खूबसूरत' मोड़ देकर दूसरी राह मुड़ रहा है.

इस बीच युवा प्रेम की कमी की सबसे ज्‍यादा शिकायत करते दिख रहे हैं. उनके प्रेम के 'रिश्‍ते' में बदलते ही कुछ बरस बाद उसमें वह महक नहीं रहती, जो उस वक्‍त थी, जब वह रिश्‍ते को 'नाम' दे रहे थे. रिश्तों में तनाव सुनामी की तरह दाखिल हो रहा है. अचानक से रिश्‍तों की 'एक्‍सपायरी डेट' घटने लगी है.

वह सभी जो युवा हैं. जो कभी युवा थे. जो युवा हो रहे हैं. जिंदगी के इस अनुभव के आसपास से गुजरे ही होंगे. आज युवा दंपति, जो प्रेम विवाह के रास्‍ते चलकर शादी के बंधन तक पहुंचे,रिश्‍तों में महक की कमी की मुखरता से शिकायत कर रहे हैं. आखिर क्‍या वजह है कि जिन दो लोगों में इतना गहरा प्रेम था कि 'जमाने' से लड़कर उन्‍होंने अपनी 'राह' चुनी थी, उन्‍हें अपने ही बीच प्रेम कम होता दीखने लगता है. 

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फिर ऐसा क्‍यों होता है कि कुछ बरस बीतते ही रिश्‍तों की 'एक्‍सपायरी डेट' कम होने लगती है. रिश्‍तों में एक किस्‍म की ऊब आने लगती है. इसलिए भारत जैसे देश में भी तेजी से तलाक, तनाव और आत्‍महत्‍या जिंदगी पर भारी पड़ रहे हैं.

ऐसे युवाओं के लिए जो अकेले रह रहे हैं. परिवार कहीं और वह कहीं और. जिंदगी रोजमर्रा के कामकाज में इतनी उलझी है कि उसे बाहर की दुनिया में झांकने की फुर्सत तक नहीं. रिश्‍तों में संघर्ष और एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बहुत तेजी से घट रहा है. ऐसा इसलिए नहीं कि एक-दूसरे के प्रति क‍टुता बढ़ी है, बल्कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्‍योंकि हमसे एक-दूसरे के लिए अहसास की कोमलता और एक-दूसरे से वह पहले वाली 'नजर' अपेक्षित है, जिसे गुजरे हुए जमाना बीत गया. दुनिया तेजी से बदल रही है. जिम्‍मेदारी बदल रही है. काम का बोझ बढ़ रहा है. ऐसे में रिश्‍तों के बीच प्रेम का संतुलन गड़बड़ा गया है.

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इसकी मूल वजह कोई बाहरी तत्‍व नहीं है. हम खुद हैं. हम बाहरी बदलाव तो करते गए लेकिन अंदरूनी 'मामलों' को अनदेखा करते रहे. हमने मन की 'फ्र‍िक्‍वेंसी' पर काम नहीं किया. हमने अपेक्षा के पहाड़ खड़े कर लिए, लेकिन एक-दूसरे के लिए स्‍नेह का टीला भी नहीं बना पाए.

इस स्‍नेह के टीले की कमी के कारण ही अक्‍सर हमें घर में यह सुनाई देता है कि 'तुम' पहले जैसे नहीं रहे. जाने कहां तुम चले गए, जिससे प्रेम था.' इस संवाद में हम भूल रहे हैं कि हम एक ऐसी यात्रा पर हैं, जिसमें हम हर पल परिवर्तित हो रहे हैं. हम बदल रहे हैं. जब हम खुद बदल रहे हैं तो सामने वाला कैसे 'वही' रह सकता है. इसलिए जाने तुम कहां चले गए की जगह लापता स्‍नेह की तलाश में जुटना होगा. शिकायत की जगह संवाद पर जोर देना होगा. तभी जीवन के आंगन में प्रेम की 'तुलसी' महकेगी.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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