Delhi Smog : सीने में जलन और आंखों का तूफान जारी है...

बताया जाता है कि 'स्मॉग' इस शब्द को सबसे पहले डॉ. हेनरी अंतोइन दे वू ने 1905 में इस्तेमाल किया था.

Delhi Smog : सीने में जलन और आंखों का तूफान जारी है...

एक लड़की अपने भाई और मम्मी पापा के साथ सुबह का नाश्ता कर रही है. सबकी आंखों के नीचे काले घेरे हैं. घर के अंदर रखे हुए पौधे मुरझा गए हैं. लड़की अपने घर के शीशे से बाहर झांक रही है तो वहां चिमनियों से उठती हुई जहरीली हवा आसमान पर सफेद चादर बिछा रही है. मां अपनी बेटी से पूछती है कि क्या उसने टैब, लंच वॉटर बॉटल ले लिया है. फिर पूछती है कि क्या उसने O2 किट ले ली है तो जवाब मिलता है कि वह तो खत्म हो गई. मां गुस्से में कहती है कि अभी हफ्तेभर पहले ही तो लिया था. पता चलता है कि उसके भाई से किट खत्म हो गई है क्योंकि वह फुटबॉल खेलने चला गया है. इस पर मां कहती है कि वह एक-एक पैसा जोड़ती है, उसके पापा इतनी मेहनत करते हैं ताकि वो बाहर जा सकें, पढ़ाई कर सकें. फिर वह अपने मोबाइल से नई किट ऑर्डर करती है.

लड़की दर्शकों की तरफ देखती है और बोलती है, 'ये साल 2016 नहीं 2030 है, इंडिया फुटबॉल वर्ल्ड कप में खेल रहा है, मोबाइल 4G से 10G हो गया है. मगर बाहर इतना पोल्यूशन है कि हम बगैर ऑक्सीजन किट के बाहर नहीं निकल सकते हैं.' तभी दरवाजे की घंटी बजती है और ड्रोन से ऑक्सीजन किट की होम डिलेवरी हो जाती है. सभी लोग अपना ऑक्सीजन मास्क लगाते हैं और लड़की मास्क लगाते हुए बोलती है, 'अगर आपने तभी पोल्यूशन रोका होता तो आज मैं जब चाहूं घर से निकल सकती थी, और मेरे डैड फिफ्टी इयर्स के नहीं लगते, ट्रस्ट मी ही इज 38, ये मेरी लाइफ है और आपकी होने वाली.'

ऑक्सीजन किट के नाम से 2016 में बनी इस शॉर्ट फिल्म में 2030 की बात की गई है लेकिन जिस तरह से दिल्ली में बच्चों की छुट्टी कर दी गई है, जिस तरह से सुबह घूमने जाने को मना किया जा रहा है, जिस तरह से आप एक धुंआसे (स्मॉग) की चादर देख रहे हैं उससे लगता है कि हम बहुत जल्दी में है और 2030 तक भी इंतजार नहीं करना चाहते हैं. यह हमारे विकास की बानगी है. हमारे अंदर विकासशील से विकसित होने की इस कदर हड़बड़ी है कि हमें अक्सर ये जुमला सुनने को मिलता है कि हमारे शहर को पेरिस शहर जैसा बना दिया जाएगा. और आखिर हम पेरिस, बीजिंग जैसे शहरों की तरह लगभग बन ही गए हैं. बीजिंग के ये हाल हैं कि वहां बगैर मास्क के बाहर निकलना मुश्किल है. अगर दुनिया के अन्य प्रदूषित शहरों पर नजर डालें तो अमूमन सभी जगह का यही हाल है. मिस्र में प्रदूषित हवा की वजह से हर साल 10 से 25 हजार लोग मारे जाते हैं.

मंगोलिया की राजधानी उलान प्रदूषण के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर पहुंच गई है. ईरान के अहवाज शहर का तो यह आलम है कि वहां जीवन की गुंजाइश सबसे कम है. भारत के दिल्ली शहर की बात की जाए तो यहां पिछले 10 सालों में गाड़ियों की ही संख्या 1 लाख 80 हजार से बढ़कर पैंतीस लाख पहुंच गई है. इसके अलावा सर्दियों के मौसम में पंजाब, हरियाणा में पराली के जलाने से भी स्मॉग में बढ़ोतरी हो जाती है. स्मॉग का मतलब है धुएं और कोहरे का मिश्रण. कोहरे में पानी के कण होते हैं जिसके साथ कॉर्बन और दूसरे सूक्ष्म कण मिलकर एक धुंए की चादर सी बन जाती है जिसे स्मॉग कहा जाता है. सर्दियों में गाड़ियों से निकलने वाले धुएं में मौजूद सूक्ष्म कण हवा से मिलकर बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर देते हैं. बताया जाता है कि ये कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ फेफड़ों में घुस जाते हैं और बाद में दिल को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

बताया जाता है कि 'स्मॉग' इस शब्द को सबसे पहले डॉ. हेनरी अंतोइन दे वू ने 1905 में इस्तेमाल किया था. डॉ वू ने लोक स्वास्थ्य कांग्रेस की बैठक के दौरान धुआं और कुहासा यानि Fog and Smoke नाम का पत्र पढ़ते हुए इस शब्द का इस्तेमाल किया था. कहा तो यह भी जाता है कि स्मॉग कों हिंदी में धुआंसा शब्द सबसे पहले कथाकार संजीव ने दिया था. 2008 में आई एनिमेशन फिल्म वॉल-ई इस स्थिति को और अच्छे से दिखाती है. जब फिल्म की शुरुआत धुंए से ढंके हुए एक शहर से होती है. जहां चारों तरफ धुंए से घिरी हुई इमारतें हैं और कचरे का ढेर है जिनकी इमारतें बनती जा रही है. धरती पर अब कोई नहीं रहता है. सब दूसरे ग्रह पर शिफ्ट हो चुके हैं. और धरती सिर्फ एक डस्टबिन बन कर रह गई है. जहां रहने वाले रोबोट वॉल- ई का एक ही काम है, यहां वहां पड़े हुए कचरे को इकट्ठा करके उन्हें एक जगह जमाते जाना जिससे धरती पर और कचरा पटकने की जगह बनती रहे. वॉल-ई 2805 की बात करती है लेकिन लगता है हम उससे पहले ही ये नौबत ले आएंगे.

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क्लायमेट चेंज पर डॉक्यूमेंट्री की एक श्रंखला 'ईयर्स ऑफ लिविंग डेंजरसली' में बताया गया है कि किस तरह से विश्व के सबसे बड़े जंगल अमेजन को कुतर कुतर की साफ कर दिया गया है. वहां एक खोज से पता चला कि महज दस दिनों के भीतर ही वहां के 351 एकड़ जंगलों का सफाया हो गया. बीते कुछ सालों में ही यहां का एक बड़ा हिस्सा जंगल से मैदान में तब्दील हो चुका है. इस तरह से जंगल तेजी से काटे जाने की वजह भी बड़ी चौंकाने वाली है. दरअसल ब्राजील विश्व के सबसे बडे बीफ एक्सपोर्टर में से एक है. अमेरिका और चीन के साथ बाज़ार में प्रतियोगिता कर रहा ब्राजील बीफ के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए तेजी से जंगलों को साफ कर रहा है जिससे वहां जंगल का मैदान बनाया जा सके और मवेशी वहां चारा खा सकें. इससे न सिर्फ जंगलों को नुकसान पहुंच रहा है बल्कि वहां रहने वाली कई प्रजातियां भी इसकी चपेट में आकर खत्म होती जा रही हैं.

जिन्हें इस तरह पेड़ों का काटा जाना कोई बड़ी बात नहीं लगती, उन्हें यह समझाना जरूरी है कि अगर इसी तरह पेड़ों को खोते जाएंगे तो हम उस एयरकंडीशनिंग को खत्म कर देंगे जो इस पूरे पृथ्वी ग्रह को ठंडा रखता है . यह बात तो हमने बचपन में ही पढ़ ली थी कि पेड़ कार्बन को सोखते हैं. हमारी कार में गैसोलिन के जलने से, कोयले को जलाकर हम हवा में कार्बन डाय ऑक्साइड छोड़ते हैं और ये पेड़ उसे अपने अंदर ले लेते हैं यानि यह पेड़ कार्बन को स्टोर कर लेते हैं तो और अगर इन्हें काट दिया जाएगा तो क्या इसका सीधा सा मतलब है कि हवा में कार्बन की मात्रा बढ़ जाएगी. ऐसे में अगर हम Amazon जैसे जंगल को खो देंगे तो हम दुनिया के सबसे बड़े ट्रॉपिकल फॉरेस्ट से कहीं और ज्यादा बड़ी चीज को अपने हाथ से गंवा देंगे. अगर जंगल को खत्म कर दिया जाएगा तो क्लाइमेट चेंज होगा और जो जंगल बच जाएंगे उन पर भी बुरा असर पड़ेगा. फिर जंगल सूखते जाएंगे, सूखते जाएंगे और एक दिन उसमें आग लग जाएगी.

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कहते हैं कि मुंबई में जब उद्योग और फैक्ट्रियां नई नई स्थापित हो रही थीं, तब मजदूरों से कहा जाता था कि वह खाने में गुड़ जरूर खाएं. दरअसल गुड़ उन प्रदूषक (pollutants) के खिलाफ शरीर को लड़ने में मदद करता है जिनका सामना मजदूर फैक्ट्रियों में काम करते वक्त करते थे. आजकल भी डॉक्टर खाने में गुड़ लेने पर जोर दे रहे हैं यानि इससे पता चलता है कि मौजूदा प्रदूषण का स्तर किसी फैक्ट्री के माहौल से कम नहीं रह गया है.

एक तरफ हम प्रदूषण फैलाने वाले कारकों को बढ़ाते जा रहे हैं और दूसरी तरफ उतनी ही तेजी से उनसे निबटने वाले पेड़ों को घटाते जा रहे हैं. जब भोपाल में गैस त्रासदी हुई थी तो छोटे छोटे बच्चों ने महसूस किया था कि दम घुटना क्या होता है. वैसी ही घुटन अब दिल्ली में हमारे बच्चे महसूस कर रहे हैं. गैस त्रासदी के दूसरे दिन शहर छोड़कर भाग रहे लोगों को रास्ते में सिर्फ लाशे पड़ी हुई दिखाई दे रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे लोगों को डंप कर दिया गया है. उसी दिन किसी अखबार ने हेडलाइन छापी थी - सीने में जलन, आँखो में तूफान सा क्यों है. आज लगता है कि शहरयार की यह पूरी गज़ल मौजूं होती जा रही है.

सीने में जलन आंखों में तूफान से क्यों है, इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है.
दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढे, पत्थर की तरह बेहिस ओ बेजान सा क्यों है.
तन्हाई की ये कौन सी मंजिल है रफीकों, ता-हद-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यों है.
हमने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की, वो ज़ूद-परेशाम पशेमान सा क्यूं है.
क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में, आईना हमें देख के हैरान सा क्यूं है.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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