Opinion: विखंडित सोवियत संघ के पास कई सबक हैं आज के भारत के लिए

सोवियत गणराज्य जिस तरह से रूसी गणराज्य से ऐतिहासिक रूप से विलग थे, भारतीय राज्य भी भारतीय गणराज्य से उसी तरह विलग हैं. यहां सिर्फ इस बात को रेखांकित करने की कोशिश की जा रही है कि रूसी क्रांति के बाद जो सोवियत संघ था और आजादी के बाद जो भारत बना, उनकी समस्याओं का स्वरूप बहुत कुछ मिलता-जुलता है.

Opinion: विखंडित सोवियत संघ के पास कई सबक हैं आज के भारत के लिए

सोवियत संघ का विखंडन हुए 28 साल होने वाले हैं. आज भी भारत में बीसवीं सदी की इस सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना को लेकर जानकारी का अभाव है, समझ की कमी है. सोवियत संघ 15 गणराज्यों को मिलाकर बना था, जिसमें सबसे बड़ा गणराज्य रूस था. 1990 में सोवियत संघ से साम्यवादी शासन खत्म हुआ. 15 गणराज्य अलग-अलग देश बने. अब यह सब इतिहास है.

सोवियत संघ के इस विखंडन की सही समझ भारत के लिए बहुत काम की हो सकती है. प्रायः इस विखंडन को साम्यवादी शासन के खात्मे के रूप में जाना जाता है. इससे इतर रूस और इन गणराज्यों की समस्याओं के कितने स्तर थे और वह कैसा समाज था, इस बारे में सूचनाएं भी कम हैं और उनका विश्लेषण तो है ही नहीं.

सोवियत संघ से कम्युनिस्ट शासन खत्म हुआ, यह एक बात है, पर यह बात तो सिर्फ एक तरह की शासन-प्रणाली के एक देश-विशेष की परिस्थिति विशेष में विफल हो जाने को सूचित करती है. पर वास्तव में वह देश, वह युग और वे चुनौतियां कैसी थीं, यह प्रश्न फिर भी बचा रहता है.

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यदि हम सोवियत गणराज्यों के संघ के बारे में गहराई से जानें-समझें तो उनमें से भारत के लिए बहुत सी प्रासंगिक बातें मिल सकती हैं. सोवियत गणराज्यों का यह समूह लगभग उसी तरह की समस्याओं से घिरा हुआ था, जिनसे हमारा आज का भारत. ये समस्याएं थीं- राष्ट्रीयता,सांप्रदायिकता, भाषा, गरीबी, बेरोजगारी, कृषि, उद्योग, शिक्षा, सामाजिक पिछड़ापन, सामाजिक विभेद, आदि.

70 सालों का लंबा कम्युनिस्ट शासन इन्हीं समस्याओं को एक विचारधारा के आधार पर हल करने के लिए संघर्ष करता रहा और अंततः टूटकर गिर गया. बहुत आसानी से यह मान लिया जाता है कि सोवियत संघ का पतन साम्राज्यवादी षड़यंत्रों के कारण हुआ या फिर पूंजीवादी व्यवस्था से साम्यवादी व्यवस्था होड़ में पराजित हुई.

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यह भी मान लिया जाता है कि मार्क्सवादी विचारधारा पर टिकी राज्य-व्यवस्था को एक दिन ढहना ही था, क्योंकि मार्क्सवाद कोई जीवन का समग्र निदर्शन नहीं है या फिर यह कि मार्क्सवाद को विकृत किया गया, रूस में नया वर्ग उभर आया. ऐसे ढेर कारण और ढेर व्याख्याएं हैं. ये सभी आंशिक रूप से सच भी हैं. किसी एक कारण पर अतिरिक्त जोर देना अन्य कारणों को नकारना हो जाता है.

सोवियत विघटन के इस पूरे संदर्भ में जो सबसे अहम बात विचार करने की है, वह पीछे छूट जाती है. पश्चिम की दुनिया उस पर विचार न करे, तो चलेगा, परंतु भारत के लिए सोवियत संघ का संपूर्ण समाज एक आईने की तरह काम कर सकता है. लगभग समान समस्याओं से रूस का शासन किस तरह निपटने की कोशिश करता रहा, कहां और किन कारणों से उसे सफलता मिली और कहां वह विफल रहा?

भारत और पूर्व सोवियत संघ के इतिहास में बहुत फर्क है. राजसत्ता का स्वरूप भी वह नहीं है. परंतु दोनों देशों की समस्याओं का स्वरूप बहुत कुछ मिलता-जुलता है. साम्यवादी शासन की विफलता राजनीति के फलक पर तो दिखाई दी, परंतु इसकी वास्तविक विफलता वहां के समाज की समस्याओं की गहराई तक न पहुंच पाना और उनकी जटिलताओं को ठीक ढंग से न समझ पाना था. ठीक यही चीज भारत में हो रही है.

भारतीय समाज की समस्याओं को उनकी गहराई और जटिलता में न समझ कर उनके फौरी उपाय किए जा रहे हैं या उनका राजनीतिक दोहन किया जा रहा है. इस स्थिति में क्या भारत के विखंडन की पूर्व-पीठिका बन रही है?

चूंकि सोवियत संघ से तुलना की गई है, तो यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सोवियत संघ के 15 गणराज्य स्पष्ट रूप से अलग-अलग राष्ट्रीयताएं थे. वे मिलकर एक राष्ट्र नहीं बनाते थे, और न ही एक राष्ट्र बनाने की कोई संभावना ही प्रस्तुत करते थे.

रूसी राष्ट्र के इर्द-गिर्द के इन छोटे-छोटे गणराज्यों को रूसी जारों ने मध्ययुग के अलग-अलग समय में अपने साम्राज्य-विस्तार के अभियानों में जीता था. बाद में कुछ गणराज्य कूटनीति से, कुछ बलपूर्वक और कुछ स्वेच्छा से सोवियत संघ के हिस्से बने. पर विशाल रूसी गणराज्य और शेष 14 गणराज्यों के आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक अंतर्विरोध स्पष्ट उजागर थे. यद्यपि यह कहना अनैतिहासिक होगा कि सोवियत संघ में शामिल होने से इन गणराज्यों को नुकसान ही हुआ. बहुत से क्षेत्रों में इन गणराज्यों ने विकास किया और अपने भाग्य को नए ढंग से निर्मित किया. परंतु अंतर्विरोध भी एक यथार्थ थे.

भारत के प्रांतों की स्थिति भिन्न थी. यह सतही ढंग से कह दिया जाता है कि अंग्रेजों ने जीतकर उपमहाद्वीप के बहुत से इलाकों को खासकर सीमावर्ती क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिलाया या फिर मुगल या उससे पहले के मौर्य शासकों ने भी साम्राज्य-विजय कर उन्हें एक राजकीय सूत्र में गूंथा था. भारतीय राष्ट्रीयता का सवाल सोवियत गणराज्यों या यूरोपीय देशों की राष्ट्रीयता के सवालों से अधिक गहरा और जटिल है.

यहां इसकी बारीकियों पर चर्चा का अवसर नहीं है, परंतु यह जरूर कहा जाना चाहिए कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अत्यंत प्राचीनकाल से एकता और अंतर्क्रिया के सूत्र गहनता से सक्रिय रहे हैं.

सो, यहां यह तुलना बिल्कुल नहीं की जा रही है कि सोवियत गणराज्य जिस तरह से रूसी गणराज्य से ऐतिहासिक रूप से विलग थे, भारतीय राज्य भी भारतीय गणराज्य से उसी तरह विलग हैं. यहां सिर्फ इस बात को रेखांकित करने की कोशिश की जा रही है कि रूसी क्रांति के बाद जो सोवियत संघ था और आजादी के बाद जो भारत बना, उनकी समस्याओं का स्वरूप बहुत कुछ मिलता-जुलता है.

अतः सोवियत संघ ने उन समस्याओं से जिस ढंग से निपटने की कोशिश की उसकी विफलता से भारत अब भी यदि लेना चाहे तो कुछ शिक्षा ले सकता है, और उन भूलों को दोहराने से बच सकता है.

यहां उदाहरण के लिए कुछ समस्याओं का जिक्र किया जा रहा है-

भाषा: रूस के सभी गणराज्यों की अपनी भाषा थी. पर रूसी भाषा को उन गणराज्यों पर थोपा गया. यानी रूसी भाषा की पढ़ाई अनिवार्य की गई. इसका परिणाम यह हुआ कि गणराज्यों में भाषाई असंतोष पनपा. पर इसके कई सकारात्मक पहलू भी थे. पर कुल मिलाकर भाषा-समस्या के समाधान के इस तरीके ने भाषाई असंतोष को ही जन्म दिया.

भारत में हिंदी नहीं थोपी गई, पर अंग्रेजी सुनियोजित ढंग से थोपी गई. भारत में अंग्रेजी के जरिए उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं ने समाज के प्रभुवर्ग की संतानों के लिए एक अघोषित आरक्षण की स्थिति पैदा कर दी. वहीं बाजार ने हिंदी को विस्तारित किया. परंतु इसी प्रक्रिया में भाषा के रूप में हिंदी का अवमूल्यन भी हो गया.

यहां भाषा के संबंध में रूस और भारत के अनुभव अलग किस्म के हैं, पर यह बात सामान्य है कि सोवियत-राज्य भाषा और जन के संबंध को गलत ढंग से वहां भी डील कर रहा था और यहां भारतीय-राज्य भी यही कर रहा है. भारत की भाषा-नीति जन से तभी जुड़ेगी जब न तो अंग्रेजी के जरिए वर्ग-विशेष का शिक्षा और रोजगार में एक अघोषित परंतु संपूर्ण आरक्षण रहेगा और न ही हिंदीतर किसी भी क्षेत्र में अनावश्यक रूप से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का दुराग्रह किया जाएगा.

धर्म और सांप्रदायिकता: रूस में साम्यवाद के प्रचार-प्रसार को धार्मिक समस्या का आसान निदान मान लिया गया था. ठीक वैसे ही जैसे भारत में धर्मनिरपेक्षता के प्रचार-प्रसार को, जिसकी प्रतिक्रिया में सांप्रदायिक राजनीति मजबूत होती गई. रूस में यह भी मान लिया गया था कि शिक्षा और रोजगार धार्मिक विभेदों को समाप्त करने की बात है. बेशक शिक्षा और रोजगार धार्मिक विभेदों को समाप्त करने की पहली अनिवार्य सीढ़ी हो सकते हैं, पर वे संपूर्ण उपाय नहीं हैं. एक सकारात्मक सांस्कृतिक उन्नयन ही बलशाली होकर इस समस्या को समाप्त कर सकता है.

कृषि, रोजगार, अर्थव्यवस्था: भारत के लिए यह सीखने का सबसे बड़ा क्षेत्र है. रूस ने मजबूत अर्थव्यवस्था का निर्माण किया था. पर क्या वह सचमुच मजबूत थी? कुछ दिशाओं में वह सचमुच मजबूत थी, मगर कुछ क्षेत्रों में कमजोर. समाज का समग्र विकास नहीं हो सका था. अनेक विशेषज्ञों ने सोवियत कृषि, रोजगार, अर्थव्यवस्था से जुड़े अनेक सवालों का गहन अध्ययन किया है. इनसे यह स्पष्ट होता है कि सोवियत समाज का मूल संकट यहीं छिपा था. यह साम्यवाद के राजनीतिक-आर्थिक-दार्शनिक सिद्धांतों की पराजय से ज्यादा एक पिछड़े अधिकांशतः एशियाई इलाके के तेज आधुनिक रूपांतरण का प्रश्न था, जिसे सोवियत संघ में मशीनी ढंग से करने की कोशिश की गई और वहां बेशक वैश्विक परिस्थितियां भी प्रतिकूल थीं.

भारत में आज जिन उपायों को काम में लिया जा रहा है, वे उपाय भारतीय अर्थव्यवस्था को और अधिक अंतर्विरोधी बना रहे हैं. हम जिस विकास को एक मंत्र की तरह जप रहे हैं, उसके अर्थ जनता के लिए अमूर्त हैं, तो पूंजीपति वर्ग के लिए बहुत स्पष्ट और यह स्थिति कहां ले जा रही है, यह भी स्पष्ट दिख रहा है.

सोवियत संघ ने सैन्य-महाशक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर लिया था. परंतु अब विशेषज्ञ बताते हैं कि यह पूरा उपक्रम अपने आप में ढेर असंगति भी लिए हुए था. विश्व के सामरिक समीकरणों को देखते हुए यह तो बहुत जरूरी है कि मजबूत सैन्य-ढांचा हो. पर इस बात का मूल्यांकन और समझ और भी जरूरी है कि विराट सैन्य-ढांचे को किस तरह अनावश्यक खर्चों और भ्रष्टाचार से सुरक्षित रखा जाए, क्योंकि यह अंततः शिक्षा, कृषि, आवास, आदि नागरिक जरूरतों की कीमत पर ही हो रहा होता है.

सोवियत संघ का यह उदाहरण भारत के लिए बहुत बड़ी शिक्षा है. सोवियत संघ की सेना का सोवियत अर्थव्यवस्था पर बहुत भार था- एक ऐसे युद्ध के लिए जो कभी नहीं होना था, जो शक्ति संतुलन और वैश्विक राजनीति का एक दांव भर था. एक ऐसे युद्ध का भय जिसे थोड़े से विश्वास और सही वैश्विक दृष्टिकोण से दूर किया जा सकता था. निश्चित रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद शीतयुद्ध की दुनिया का एक यथार्थ था, पर सोवियत शासकों ने इसे युद्ध की भयग्रस्त कल्पनाओं तक अपनी सत्ताओं की सुरक्षा के लिए भी इस्तेमाल किया.

ये मात्र संकेत थे, उस विराट, गहन और बहुस्तरीय स्थिति के जिससे सोवियत संघ गुजरा और एक विघटन के जरिए जिनसे वह मुक्त भी हो गया. अब सिर्फ रूसी गणराज्य है, अपनी वास्तविक समस्याओं के साथ, न कि अपने साथ नत्थी की गई 14 गणराज्यों की अबूझ समस्याओं के ढेर के साथ. परंतु भारत के लिए राह उतनी आसान नहीं है. भारत गणराज्यों का समूह नहीं है सदियों से एक राष्ट्र बनने का यत्न करता हुआ एक विशाल भूखंड है.

हम भारत के लोग परस्पर बहुत अलग हैं, पर दुनिया के किसी भी हिस्से के मनुष्य उतने एकरूप, उतने एकात्म भी नहीं हैं, जितने हम हैं, इसलिए भारत राष्ट्र का निर्माण इतिहास की एक सच्ची सकारात्मक दिशा है. भारत की जनता ने उसे राष्ट्र बनाया है और बना रही है, किसी साम्राज्यवाद और शासकों के समूह ने नहीं. क्या इस राष्ट्र को विखंडन की ओर ले जाते शासकों, उनके विचारों और उनके दलगत लक्ष्यों को भारत-जन सफल होने देंगे? क्या यह भारत राष्ट्र का तकाजा नहीं है कि एक बिल्कुल नई चेतना, एक बिल्कुल नई राजनीति वर्तमान के अंधेरे कोनों से उठे और एक नया उजाला बन जाए?

(आलोक श्रीवास्तव सुपरिचित कवि और लेखक हैं)

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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