पीरियड्स : विषय जो इतना अनछुआ रहा कि आज अक्षय कुमार को पैड पहनकर बताना पड़ा...

काश! हर पिता अनिल कपूर की तरह बेटी के भविष्य के प्रति सजग होता और हर पति अक्षय जैसा बावला. उम्मीद करते हैं पैडमैन गांव-गलियारों के चौबारों में पहुंचकर बड़े बदलाव का वाहक बने.

Meena Sharma डॉ. मीना शर्मा | Updated: Feb 9, 2018, 06:04 PM IST
पीरियड्स : विषय जो इतना अनछुआ रहा कि आज अक्षय कुमार को पैड पहनकर बताना पड़ा...

कभी दादी, कभी चाची, कहीं स्कूल टीचर की खीज तो कहीं सास की निगाहें, कभी इशारों की ज़ुबान तो कभी फटकार से सहमी लड़कियों की घुटन. उपेक्षा और तिरस्कार ने शरीर से निकले रक्त से ज़्यादा कष्ट दिया है. पैडमैन बने अक्षय कुमार को समाज की ये असल तस्वीर देखने का मौका शायद कभी नहीं मिला हो, लेकिन आज रिलीज़ हुई फिल्म ने बॉलीवुड की जवाबदेही तय करने में बड़ा योगदान दिया है. ढंके बदन के पीछे छिपे चीथड़ों को उधेड़कर रख दिया है. चौतरफा जोखिम के डर को पैड में निचोड़कर आईना दिखाया है हमको, सबको.
 
आर बाल्की के लेखन ने पुरज़ोर तरीके से स्थापित किया है कि शारीरिक पीड़ा के साथ मानसिक यातना का दर्द झेल रही हिंदुस्तान की बेटियां सिर्फ पैड की उपलब्धता से वंचित नहीं हैं. वह उस बंजर सोच में पल बढ़ रही हैं जहां मासिक धर्म एक शाप है. कहीं बोझ ये कि तीन दिन खाना कौन बनाएगा, कहीं डर ये कि स्कूल में कोई अनपेक्षित हादसा तो नहीं हो जाएगा. ऐसे में क्या हमारा देश पैडमैन के संदेश को आत्मसात कर पाएगा?    
 
बतौर प्रोड्यूसर, ट्विंकल खन्ना इस बात से उत्साहित हैं कि लोग इस विषय पर खुलकर बात करने का साहस जुटा रहे हैं. वे कहती हैं, 'ये सहभागिता ही सबसे बड़ी उपलब्धि है’. पैडमैन की टीम ने देश में माहौल बनाने का जबर्दस्त काम किया है. बड़े बड़े सितारों ने सोशल मीडिया पर अभियान बना दिया. हालांकि शूटिंग के शुरुआती दिनों में कई बार अक्षय कुमार को झिझक हुई. लेकिन कॉमेडी को मुख्यधारा की फिल्म में अव्वल जगह दिलाने वाले बिंदास नायक ने कहा, ‘तीन घंटे की फिल्म की शूटिंग करना इतना कष्टप्रद है तो हर महीने तीन से सात दिन के इस दर्द को कम करना कितना ज़रूरी है.’ मुद्दे की गंभीरता के मद्देनज़र जितनी संजीदगी दिखाई वह उन्हें मर्दों की भीड़ में अलग खड़ा करती है.
 
टॉयलेट: एक प्रेमकथा को एक वर्ग ने चापलूसी की पराकाष्ठा कहा था. आलोचक पैडमैन को अब क्या कहेंगे? इस फिल्म की कहानी ने किसी सेना का स्वाभिमान नहीं डिगाया, न ही आंदोलनों की आंधी आई. किसी ने शर्म से झुककर अपनी शूरवीरता को लानत भी नहीं दी. भारतीय समाज का यही दोहरा चरित्र मोदी सरकार के अहम मंत्रियों को वादाखिलाफी के लिए निर्भीक बनाता है.
 
16 सिंतबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री कर्नल राज्यवर्धन सिंह ने अपने लोकसभा क्षेत्र की स्कूली छात्राओं से बातचीत करते हुए स्कूल में पैड उपलब्ध कराने का भरोसा दिया. मंत्रीजी की बात सुनकर प्रिंसिपल से लेकर छात्राएं उत्साहित हुईं, लेकिन फोटो सेशन के बाद मंत्री ने मुड़कर सुध नहीं ली. वादों से हक़ीकत की ये दूरी इतनी लंबी है इसीलिये केन्द्र सरकार 2019 की बजाय नतीजों के लिए 2024 को तरज़ीह देना शुरू कर चुकी है. मौजूदा सरकार ही क्यों इससे पहले की स्वास्थय योजनाओं में भी मैन्स्ट्रुअल हाइजीन अछूता विषय रहा है. यही वजह है कि ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में महिला स्वास्थ्य के लिहाज से भारत की रैंकिंग 142 वीं है, जो नीचे से तीसरी है.
 
यही वजह है कि केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी उन विकल्पों को तलाश रही हैं जहां पर्यावरण की स्वच्छता के साथ महिलाओं के स्वास्थ्य को सर्वोच्च जगह मिले. किफायती दामों पर उपलब्धता के साथ सुरक्षित डिसपोजल को पुख्ता करने के लिए वे संबंधित मंत्रियों को लामबंद करने में जुटी हैं. हालांकि महिला एंव बाल विकास मंत्रालय खुद दोयम दर्जे के विभाग के रुप में देखा जाता रहा है. अब तक के मंत्रियों का रवैया भी इस सोच से अछूता नहीं रहा, लेकिन मेनका गांधी की सक्रियता और केन्द्र सरकार के सहयोग से  फिल्म की टीम गांवों में प्रोजेक्टर लगाकर फिल्म दिखाने की योजना बना रही है.

मेनका गांधी कहती हैं, ‘जिस विषय पर प्राथमिकता से विशेष ध्यान देने की ज़रूरत थी वो इतना अनदेखा/ अनछुआ रहा कि आज अक्षय कुमार को पैड पहनकर दिखाना, बताना पड़ रहा है.’
 
ये बात हमारी उन सांसदों-विधायकों पर भी उतनी ही ईमानदारी से लागू होती है जो राज्यों की मुख्यमंत्री से लेकर देश के सूचना एवं प्रसारण, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के पदों पर पहुंचीं, लेकिन अपने विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की बेटियों और महिलाओं की इस छोटी सी ज़रूरत को नहीं समझ पाईं. देश में एक भी उदाहरण नहीं है जहां किसी जनप्रतिनिधि ने अपने इलाके को मैन्स्ट्रुअल हाइजीन फ्री बनाकर नज़ीर बनाने की ठानी हो. चाहे वो महिला हो या पुरुष. यथास्थितिवादी मात्र बनकर हमारी सरकारें ही देश को नहीं चलाती रहीं, प्रगतिवादी महिलाएं भी अपने हितों/दायरों से बाहर नहीं निकल पाईं. पिछली सदियों में स्त्रीजाति ने स्वयं को दोयम दर्जे की वस्तु होना स्वीकारा. स्वतंत्रता व जिम्मेदरी के बजाय रक्षित, भोग्या, संरक्षित, प्रायः शोषित व यदाकदा पूजित रहना नारी ने स्वयं चुना. और इस सदी में भी ताकतवर पदों पर पहुंचकर ज़िम्मेदारी और जवाबदेही से बचती रहीं.
 
एक तरफ पीरियड्स के वक्त घरों में महिलाओं को अछूत रखा गया उतना ही सरकारी योजनाओं में उपेक्षित तो दूसरी तरफ गंदगी, संक्रमण से बचाव के बजाय नैपकिन अभिजात्यता का प्रतीक बनकर रह गया. बाजार, पूंजीवाद, विज्ञापन सभी इसे मात्र फ़ैशन की तरह पेश करते रहे. सरकारों ने भी मूकदर्शक बनकर इसे समृद्ध परिवारों तक सीमित रहने दिया. यही वजह है भारत में नैपकिन इस्तेमाल नहीं करने वाली लड़कियों और महिलाओं का प्रतिशत आज 80 फीसदी से ज्यादा है. हालांकि इसका कोई अधिकृत आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. लेकिन पैडमैन के शोर के बीच नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 4, में बताया है कि बिहार में 80 प्रतिशत और यूपी में 81 प्रतिशत लड़कियां कपड़े का इस्तेमाल करती हैं.
 
ग्रामीण महिलाओं को तो रेत, लकड़ी के बुरादे और गोबर के उपलों के बोझ तले ये मुश्किल वक्त निकालना पड़ता है. शरीर के संवेदनशील हिस्से की एक बेहद प्राकृतिक प्रक्रिया आर्थिक और सामाजिक प्रताड़ना के विकृत रूपों में बीमारियों का भी कारण बनती है. इंटरनेशनल रिसर्च जनरल ऑफ सोशल साइंसेस के मुताबिक भारत में 88 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन यानी आरटीई का शिकार हो जाती हैं. सिर्फ इसलिए कि पीरियड्स में असुरक्षित तरीके अपनाने को मजबूर हैं. ऐसे में 125 करोड़ के राष्ट्र की आधी आबादी आज भी नैपकिन के सवाल से दो चार है तो प्रारंभिक ताज्जुब के बाद कोई ज्यादा आश्चर्य क्यों हो?

पैडमैन के असली हीरो, तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनाथम ने अपनी बहन और पत्नी की तकलीफ को कम करने की ठानी तो 1998 में कम लागत वाले सैनिटरी पैड बनाने की मशीन का आविष्कार किया. ये दुनिया की सबसे सस्ती 90 हज़ार की मशीन भारत में बनी. एक स्कूल ड्रॉपआउट ने जयश्री इंडस्ट्रीज नाम का नैपकिन बिजनेस खड़ा किया. इसकी 2003 यूनिट्स पूरे भारत में खड़ी कीं. 21000 से ज्यादा महिलाएं यहां काम करती हैं. लेकिन मुरुगनाथम के काम का आंकलन राष्ट्रहित में न उस वक्त की वाजपेयी सरकार ने किया न ही उसके बाद बनी यूपीए की दोनों सरकारों ने. जबकि यूपीए की चेयरपर्सन स्वयं महिला थीं. सरकारों की अनदेखी से ऐसे कई लघु उपक्रम देश के छोटे छोटे हिस्सों में दूसरी कई कुरीतियों को मिटाने के लिये भी बने और मिट गए. लिंग जांच करने वाली सोनोग्राफी मशीन पर लगने वाले ट्रैकर सहित कई उदाहरण इसमें शामिल हैं.  
 
क्या सरकारों का दायित्व नहीं था 20 करोड़ बेटियों के मरने से पहले डॉक्टर के कमरे में ट्रैकर वक्त पर लगाया जाता? नैपकिन को बुनियादी ज़रूरत बनाकर उपलब्धता को अनिवार्य कराया जाता? लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों के घोटालों की काली स्मृति डराती है, वहीं मौजूदा पीएम की अतिसक्रियता के बाद भी धीमी गति निराश करती है. ऐसे में सवाल उठता है कि पैडमैन इस निराशा को कम करने में कारगर साबित होगी? महेश भट्ट से लेकर अनिल कपूर तक के हाथ में दिखा पैड ज़रूरतमंद बेटियों और महिलाओं के धब्बों को धो पाएगा?

मैं सालों साल इस बात से विचलित रही कि नवरात्रि में बेटियों की पूजा करने वाले लोगों में कन्या भ्रूण हत्या का साहस कहां से आता है? इसीलिये नतीजों की परवाह किए बिना देश और दुनिया का सबसे बड़ा स्टिंग ऑपरेशन किया. 12 साल पहले गर्भवती महिलाओं की जान जोखिम में डालकर किए गए इस ऑपरेशन के वक्त भी और आज भी मेरा सैद्धांतिक मत है कि किसी भी महिला को कोई दूसरा व्यक्ति लिंग जांच और उसकी बच्ची के कत्ल के लिये मजबूर नहीं कर सकता. लेकिन झंझटों से बचने के लिये बेटे के जन्म को चुनने वाली मां भी सामाजिक दबाव का पर्दा ओढ़कर बचना चाहती है. सैनेटरी नैपकिन की मांग भी झंझट न बन जाए इसलिये बहुत बार जानते हुए भी वो अपनी बेटी को चुपचाप गंदगी के गड्डे में ढकेल देती है.    
 
मुद्दा कोख में पल रही बेटियों को बचाने का हो या बात जीवित बेटियों के संरक्षण की, ज़रूरत इस बात की है कि हम झंझटों से पार पाएं न कि उन्हें अनदेखा कर यथास्थितिवादी बने रहें. पीसीपीएनडीटी एक्ट की सख्ती जितनी ज़रूरी है सरकारी स्कूलों से लेकर कॉर्पोरेट दफ्तरों में वुमन फ्रेंडली एनवायरनमेंट भी उतना ही अनिवार्य है. ऐसे अनगिनत दफ्तर मैंने करीब से देखे हैं जहां महिला टायलेट में गीले हाथ सुखाने के नैपकिन की व्यवस्था कराने के लिये महिलाकर्मियों को काफी मशक्कत करनी पड़ती है.
 
राधिका आप्टे ने भारतीय लड़कियों/महिलाओं की मनोदशा को समझने की ईमानदार कोशिश की है. शायद हमारी दादी, चाची, सास, टीचर अब ये आत्मनीरिक्षण करें कि आख़िर कब वे शोषित स्त्री से शोषक-तंत्र की पहरेदार, लंबरदार, शोषक बन गईं. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो स्वयं वर्जनाओं में पली बढ़ी, आजादी के लिए तड़फी अधेड़/वरिष्ठा/वृद्धा अपने से अगली पीढ़ी को नियंत्रित करने की वृत्ति में उलझकर रह गई. नतीजा ये हुआ कि अपनी पीड़ा को कम करने से वंचित रहीं ये महिलाएं अगली पीढ़ी को घावों से बचा नहीं पाईं.
 
दरअसल भारतीय समाज की सफाई बनाये रखने की कीमत को न चुकाने व जद्दोजहद से बचने की नीयत कब गंदगी से विकृत घृणा में बदल गई यह कहना बड़ा मुश्किल है. कहने को असल पैडमैन ने क्रांति लाने का काम दो दशक पहले किया था लेकिन वास्तविक योगदान पर मोहर लगाने के लिए अमिताभ बच्चन को उनकी तुलना सुपरमैन, बैटमैन से करनी पड़ी. अक्षय खुले मन से स्वीकार करते हैं कि इस ढके और दबे हुए विषय पर बहस के लिए सिनेमाई छोंक ज़रूरी था.

ट्विंकल को भी अपनी कहानी से ज़्यादा भरोसा अक्षय के अभिनय पर था. ठीक वैसे ही जैसे भारतीय महिला को पति के सानिध्य में पर. काश! हर पिता अनिल कपूर की तरह बेटी के भविष्य के प्रति सजग होता और हर पति अक्षय जैसा बावला. उम्मीद करते हैं पैडमैन गांव-गलियारों के चौबारों में पहुंचकर बड़े बदलाव का वाहक बने. और तथाकथित रिश्तों की सांठगांठ के बहाने ही सही, भारत सरकार इसे एक मिशन बनाए.

(डॉ. मीना शर्मा Zee News में एंकर हैं.)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)