किस्सा-ए-कंज्यूमर: कंज्यूमर की शिकायत, बिल्डर की शामत

बिल्डर के अत्याचार के शिकार एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं. खरीदारों की शिकायत होती थी कि रियल एस्टेट के ज्यादातर नियम कायदे बिल्डर के हक में बने हैं. 

किस्सा-ए-कंज्यूमर: कंज्यूमर की शिकायत, बिल्डर की शामत

बड़े खुशनसीब होते हैं वो लोग जिन्हें अपने बिल्डर से कोई शिकायत नहीं होती. वर्ना आए दिन सुनने को मिल जाता है-  बिल्डर ने वक्त पर फ्लैट नहीं दिया, दिया तो कई कमियां निकलीं या फिर बिल्डर ने किसी बहाने से ज्यादा पैसे वसूल लिए. लेकिन पुणे में एक कंज्यूमर की उम्मीदों पर पानी फेरना बिल्डर को महंगा पड़ गया. पजेशन में देरी के आरोपी बिल्डर को सचमुच लेने के देने पड़ गए.  

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
पुणे के खराड़ी इलाके में एक प्रोजेक्ट है - ले रेव. दो टावर का प्रोजेक्ट, दोनों टावर 22 मंजिल के,  डेलवपर का नाम- एएम इस्टेट एलएलपी. सितंबर 2013 की बात है.  भारत गोकल नाम के एक सज्जन और उनकी बेटी ने ले-रेव फेस वन में दो फ्लैट बुक किए- फ्लैट नंबर 201 और 202. बिल्डर ने वादा किया था कि साल 2017 में दोनों फ्लैट्स का पजेशन मिल जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पजेशन का वक्त आया तो बिल्डर ने सीधे 4 साल की और मोहलत मांगी. नई डेडलाइन दी 31 दिसंबर 2021. तब तक पहले फ्लैट की 74 परसेंट और दूसरे की 94 परसेंट कीमत दी जा चुकी थी. लिहाजा जब बिल्डर ने जब 2021 तक वक्त मांगा तो बाप-बेटी दोनों ने कहा- हमें नहीं लेना फ्लैट, हमारे पैसे वापस करो.

RERA के दरबार में पहुंचा झगड़ा
यहां से कहानी में रेरा की एंट्री हुई. रेरा यानी रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट. दरअसल बिल्डर के अत्याचार के शिकार एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं. खरीदारों की शिकायत होती थी कि रियल एस्टेट के ज्यादातर नियम कायदे बिल्डर के हक में बने हैं. इसी शिकायत को दूर करने के लिए 2016 में रेरा कानून लाया गया और 1 मई 2017 से इसे लागू कर दिया गया. रेरा देश में रियल एस्टेट इंडस्ट्री का पहला रेगुलेटर है जिसमें ग्राहक अपनी शिकायतें कर सकते हैं. तो कहना चाहिए कि कहानी में रेरा की नहीं, बल्कि रेरा में कहानी की एंट्री हुई. महाराष्ट्र रेरा ने जून 2018 में मामला सुनवाई के लिए पुणे बेंच के पास भेज दिया.

बिल्डर ने गिनाई मजबूरियां
रेरा की पुणे बेंच में सुनवाई के दौरान बिल्डर ने कहा कि देरी उसने जान बूझकर नहीं की. देर इसलिए हुई क्योंकि प्लानिंग अथॉरिटी की तरफ से कुछ बदलाव हुए, इसके अलावा क्लीयरेंस देने वाली लोकल अथॉरिटीज ने भी देर की. बिल्डर ने दलील दी कि वो तो 2017 में ही प्रोजेक्ट पूरा कर लेना चाहता था, उसने इसके लिए 11 करोड़ रुपए निवेश भी कर दिए थे, लेकिन सरकारी अड़चनों की वजह से देर हो गई

बेंच ने दरकिनार की हर दलील
पुणे बेंच इस नतीजे पर पहुंची कि बिल्डर कुछ भी कहे लेकिन सच ये है कि उसने एग्रीमेंट के मुताबिक फ्लैट डेलिवर नहीं किया, लिहाजा घर खरीदार को रिफंड पाने का पूरा हक है. बेंच ने अपने आदेश में कहा-' शिकायतकर्ताओं ने इस उम्मीद में फ्लैट बुक किए कि उन्हें समय से उनका आशियाना मिल जाएगा, बिल्डर ने जो भी वजहें गिनाई हों लेकिन ग्राहक को उनके सपनों के आशियाने से महरूम नहीं रखा जा सकता.'

कंज्यूमर को मिला इंसाफ 
जनवरी 2019 को इस केस में फैसला आया. बिल्डर को आदेश दिया गया कि वो दोनों ग्राहकों की मांग पूरी करे.  गोकल और उनकी बेटी ने फ्लैट 201 के लिए 39.44 लाख और फ्लैट नंबर 202 के लिए 65.45 लाख रुपए दिए थे. बिल्डर से कहा गया कि वो 30 दिन के भीतर पूरा पैसा 10.7 परसेंट ब्याज के साथ वापस करे. खरीदारों ने 5 लाख का मुआवजा भी मांगा था जिसे बेंच ने रिजेक्ट कर दिया. 

RERA यानि आपका सुरक्षा कवच
वादा करके भी कई-कई साल पजेशन नहीं देनेवाले बिल्डरों की अब खैर नहीं. कानून के मुताबिक हर बिल्डर को अपना प्रोजेक्ट रेरा (RERA) में रजिस्टर कराना जरूरी है. क्योंकि इसके बिना न बिक्री हो सकती है न विज्ञापन. प्राइवेट बिल्डर्स ही नहीं, सरकारी हाउसिंग और कमर्शियल प्रोजेक्ट से लेकर रियल एस्टेट एजेंट्स तक को रेरा से रजिस्ट्रेशन नंबर लेना होगा. इसलिए आप ये ध्यान रखें कि फ्लैट, प्लॉट या दुकान उसी प्रोजेक्ट में खरीदें जो कि रेरा में रजिस्टर्ड हो. ये जरा सी सावधानी आपको हर धोखे से लड़ने में काम आएगी. 

(लेखक गिरिजेश कुमार ज़ी बिज़नेस से जुड़े हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)