'दिव्यांगों को प्रेम और समय दें'

जिंदगी अपनी रफ्तार से दौड़ती रहती है गुजरते हर पल में सब अपने आप में इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी को किसी के लिये समय ही नहीं है. हमारे आसपास कितने निरीह विकलांग दुखी लोग हैं, क्या हम इनके लिए कभी कुछ कर पाते हैं?   

'दिव्यांगों को प्रेम और समय दें'

कई वर्षों से ठहरी, थकी; उबाऊ जिंदगी देखकर मन तीव्र वेदना के अहसास तले दबता चला गया. करीब 22 वर्ष पहले मैने एक विद्यालय में अध्यापिका के पद पर अपना काम संभाला था. एक परिवार में अभिशप्त जीवन देखकर कदम ठहर से गए दोनों हाथों और पैरों से विकलांग जिंदगी सड़क के किनारे पड़ी कराह रही थी, उसकी पीड़ा अन्तस के तारों को हिला गई. कदम आगे बढ़ ही नहीं रहे थे. पूछने पर पता चला कि जन्म से ही अपाहिज पैदा हुई है. घर छोटा है इसलिये सड़क पर लिटा देतें हैं. शाम को अंदर ले जाते हैं. दयनीय जीवन जीते-जीते, कभी-कभी मजबूर होकर जब वो चीखने लगती तो उसकी आवाजें दिल को चीर जातीं. लगता जैसे जंगल में किसी का शिकार हो रहा है. काम करते- करते ध्यान उसी की तरफ चला जाता कि कितना दर्द भरा जीवन जी रही है. नियति के कठोर आघातों को सहना मनुष्य की कितनी मजबूरी है. चाहकर भी मौत को नही चुन सकते. 

गरीब परिवार की मजबूर अपाहिज लड़की शायद ही किसी की गोद में खेली होगी, शायद ही किसी की बाहों के झूले में झूली होगी. रूप भी कुरूप, काला रंग उस पर विकलांगता, किस जन्म के कर्मों का फल भोग रही है. किसी विद्या मंदिर का दरवाजा तक उसने नही देखा. जिंदगी कितनी खूबसूरत है, इसका अहसास तक उसे नहीं, आकाश तले पृथ्वी से ही चिपकी रहती है. आंखें हर आते-जाते को निहारती अंबर से टिक जाती हैं. लेटे-लेटे मक्खियां उस पर भिनभिनाने लगतीं. विधाता के निर्मम अत्याचारों को सहने वाली उस विकलांग जिंदगी को देखकर उस ईश्वर से शिकायत होती कि क्यों उसे मौत से भी बदतर जिंदगी से मुक्त नहीं कर देते? विकलांग संतान का दुख झेलते- झेलते उसके मां-बाप भी ईश्वर को प्यारे हो गए. एक बूढ़ी औरत उसकी खाट बाहर सरकाकर शाम को अंदर ले जाती. उस लड़की का क्या नाम है? कौन है? 

कभी जानने की इच्छा ही नहीं हुई, बेनाम जिंदगी जीते हुए कब खत्म हो जाएगी, पता ही नहीं चलेगा. विधाता की इस सृष्टि में ऐसा जीवन जीते देखकर महसूस होता है कि सब अपने- अपने कर्मो को ही भोग रहे हैं. कहते हैं कि मानव जीवन बढ़ी मुश्किल से मिलता है, क्या यही मानव जीवन है जिसे कोई आत्मा इतना सिसक- सिसक कर जीने को मजबूर हो गई? शैशव से बालपन फिर युवावस्था और फिर प्रौढ़ावस्था, सिसकती जिंदगी धरती पर लेटकर ही व्यतीत हो गई. उसे देखकर हर कोई उसके लिए मौत की कामना करता. रोज दुर्घटनाओं के समय में भी उसके साथ कोई हादसा नहीं होता. माता-पिता का साथ छूटा और दादी भी भगवान को प्यारी हो गई. 

खिड़की से झांकती तो सड़क की वो जगह खाली नजर आती, चीखें भी सुनाई नहीं देतीं. कोई हाथ नजर नहीं आता जो उसकी खाट धूप में ले आता शायद वहीं कहीं अपने कमरे में चुपचाप अपनी पीड़ा सह रही होगी उसे भी लगने लगा होगा कि कोई नहीं आएगा जो अब उसे सहारा देगा. कई दिन बाद देखा उसके दरवाजे पर भीड़ लगी है. पूछने पर पता चला कि वो लड़की भगवान को प्यारी हो गयी, सुनकर जहां मन को दुखी होना चाहिए था, वहां एक आत्मिक शान्ति हुई. छूट गई दुखों से, वेदनाओं से, इस निर्मम संसार से; सारी जिंदगी भूख, गरीबी,पीड़ा सहन करती रही कोई हाथ मदद को आगे नहीं आए. आज जब संसार छोड़ा तो उसी चैखट पर कितनी भीड़ दिखाई दे रही है. चली गई इस संसार को छोड़कर, काश! मैं उसकी कोई मदद कर पाती. उसका सहारा बन पाती.

जिंदगी अपनी रफ्तार से दौड़ती रहती है गुजरते हर पल में सब अपने आप में इतने व्यस्त रहते हैं कि किसी को किसी के लिये समय ही नहीं है. हमारे आसपास कितने निरीह विकलांग दुखी लोग हैं, क्या हम इनके लिए कभी कुछ कर पाते हैं? क्या ये हमारी सहानुभूति, हमारे मीठे बोलों के पात्र नहीं? हमें इनका सहारा बनना होगा. इनकी विकलांगता अभिशाप न बन जाये, इसलिए इनकी खुशहाल जिंदगी के लिए अपने कीमती वक्त में कुछ पल इनके साथ भी गुजारने होगें उनकी जिंदगी में और भी लोग शामिल हैं इसका अहसास इन्हें कराना होगा तभी इनकी जिंदगी सरल होगी और यही हम सबका एक सराहनीय कदम होगा.

(रेखा गर्ग सामाजिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

 

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