देश की पांच बड़ी संस्थाओं के लिए कैसा रहा साल 2017

इस साल (2017) की कुछ घटनाओं के आधार पर देखने की कोशिश करते हैं कि इस साल पांच प्रमुख संस्थाओं की क्या छवि बनी.

देश की पांच बड़ी संस्थाओं के लिए कैसा रहा साल 2017

साल के आखिरी हफ़्ते में पूरे साल की समीक्षा का रिवाज़ है. अलग-अलग क्षेत्रों में सालभर की गतिविधियों को याद करते हुए 'ईयरएंडर' लिखे जाते हैं. पूरे साल क्या सही-गलत घटा, उसका लेखा-जोखा बनाया जाता है, लेकिन वैधानिक लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण संविधान, संवैधानिक संस्थाओं और उस जैसी हैसियत वाली दूसरी बड़ी संस्थाओं पर आमतौर पर एकमुश्त गौर नहीं हो पाती. हर एक देश के लिए संविधान और उसका निर्विवाद पालन बहुत ज़रूरी होता है और इसीलिए साल के अंत में देख लेना चाहिए की संवैधानिक और दूसरी मुख्य संस्थाओं की हालत इस साल क्या रही? इसका आकलन विषयगत होने के कारण ज़रा मुश्किल काम है. फिर भी इस साल की कुछ घटनाओं के आधार पर देखने की कोशिश करते हैं कि इस साल पांच प्रमुख संस्थाओं की क्या छवि बनी. 

न्यायिक संस्थाएं
यह वर्ष याद किया जाएगा अदालतों के कुछ ऐतिहासिक फैसलों के लिए. चाहे वो राम रहीम केस हो या 2जी मामला. निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने कई एतिहासिक फैसले सुनाए, लेकिन इसी साल अदालतों पर जिस तरह सवाल खड़े किए गए, वह पहले कभी नहीं देखे गए थे. न्यूजरूम डिबेट्स में अदालत के फैसलों पर ही डिबेट करा दी गई. जनता सीधे न्यायालय पर सवाल उठाने लगी. पटाखा बैन से लेकर चारा घोटाले के फैसले पर सीधे न्यायालय को ही सवाल के घेरे में लेते हुए देखा गया. 

सीबीआई
इस पर तोता टाइप टिप्पणियां तो होती ही रहती थीं. इस पर जब चाहे सरकार का एक निजी हथियार होने का आरोप भी लगता रहता था, लेकिन इस साल इस जांच संस्था पर मंदबुद्धि का भी आरोप लगा. 2जी मामले में जिस तरह से सीबीआई की छीछालेदर हुई उसे दसियों साल तक मिसाल के तौर पर याद किया जाएगा. और अगर वह अपने पर अकुशल होने के आरोप का बचाव करेगी तो उस पर झूठ बोलने का आरोप सिद्ध हो जाएगा. यानी सीबीआई इस साल बड़े लफड़े में फंस गई. कुछ भी हो, व्यावसायिक कौशल के मामले में इस साल सीबीआई सबसे निचले पायदान पर खड़ी नज़र आ रही है.

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रिज़र्व बैंक
यह वही साल था, जिसमें नोटबंदी का असर दिखना था. यह असर देखने और दिखाने का काम रिज़र्व बैंक का था, लेकिन न तो उस फैसले के लेने में उसे कोई तरजीह मिली थी और न इस साल उस फैसले से जुड़े मामलों में इसे कोई महत्व मिला. इस साल पुराने नोटों की गिनती के मामले में इस संस्था की छवि को जितना नुकसान पहुंचा, उसकी भरपाई के लिए कोई उपाय भी रिज़र्व बैंक के पास नज़र नहीं आता. ऊपर से देश के सरकारी बैंकों में बढ़ते एनपीए को लेकर भी रिज़र्व बैंक सवालों के ढेर से दबा रहा. नोटबंदी के दौर में समय पर नोट नहीं छाप पाने से उसकी फजीहत पिछले साल के आखिरी दिनों में पहले ही हो चुकी थी और इस मामले में इस साल भी वह कुछ नहीं कर पाया. इतना ही नहीं 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट गिनने में आठ महीने से ज्यादा का समय लगा देने का कोई वाजिब तर्क वह बना नहीं पाया. नोटबंदी से क्या नफा हुआ और कितना नुकसान हुआ इसका हिसाब उसे ही लगाकर बताना था, लेकिन इस मामले में उसने अपनी हैसियत इतनी बेचारी बना ली कि आज कोई उससे सवाल तक नहीं पूछता. उसने अपने सारे अधिकार जैसे सरकार को सौंप दिए लगते हैं. 

चुनाव आयोग
चुनाव आयोग पर खुल्लम-खुल्ला ऐसे आरोप शायद ही कभी लगे हों. गुजरात और हिमाचल में चुनाव की तारीखों के ऐलान से लेकर ईवीएम के ज़रिए गड़बडि़यों के अंदेशों पर जितने भी सवाल उठे उन्हें तत्परता से निपटाने में चुनाव आयोग सफल नहीं दिखा. ऐसे मामलों में चुनाव आयोग के अलावा दूसरों ने जो जवाब दिए वे सब फिज़ूल गए. जो कुछ भी किया जाना था या आगे किया जाना है वह इसी संस्था की तरफ से किया जाना है. अपनी साख बचाने की जिम्मेदारी उसकी खुद की है. निकट भविष्य में उसके सामने अच्छी बात यह है कि चुनाव सुधारों का काम करने के लिए उसके पास लंबा चौड़ा मैदान खाली पड़ा है.

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नीति आयोग
योजना आयोग को मिटाकर बनाए गए इस आयोगनुमा संस्थान ने बड़ी उम्मीदें बंधाई थीं. पुराने भारत को बदलकर नया भारत बनाने का खाका इसी आयोग को बनाकर देना था. देश में बेरोज़गारी, खेती-किसानी, नए उद्यम-उद्योगों का रूप इसे ही सुझाना था, लेकिन उसकी तरफ से कोई ऐसी योजना या नक्शा पेश नहीं किया जा सका, जिसकी देश में चर्चा हो पाती. भले ही इसका काम योजनाओं के क्रियान्वयन का नहीं है, लेकिन ये संस्था आखिरकार एक थिंक टैंक कही जाती है. नए भारत का नक्शा इसे ही सोचना था. इस साल देश में हलचल भरा जो कुछ हुआ भी है वह सारा का सारा केंद्र सरकार के दिमाग से हुआ नज़र आया. उसमें नीति आयोग की उल्लेखनीय भागीदारी नहीं दिखाई दी. यह आयोग मौजूदा सरकार की ही उपज है और इस सरकार का अपना कार्यकाल सिर्फ डेढ़ साल का ही बचा है. सो इस संस्था के सामने करने को यह काम है कि दो-चार महीने में ही ऐसा कुछ सोचकर बताए, जिसे यह सरकार एक साल में करके दिखा सके. देश की जनता का मूड भी ऐसा बन गया है कि उसे अब लंबी बातें या लंबे वक्त की योजनाएं सुनना अच्छा नहीं लग रहा है. नए साल में सरकार को बेसब्री से उम्मीद होगी कि उसकी यह संस्था सरकार को कोई गेम चेंजर योजना सुझा दे. 

और आखिर में खुद संविधान के लिए यह साल
बात-बात में कानून बदलने और संविधान के प्रावधानों पर सवाल उठाए जाने के लिए इस साल को खलनायक की तरह याद किए जाने का अंदेशा है. संविधान के प्रावधानों की नई-नई व्याख्याएं इसी साल सबसे ज्यादा सुनाई दीं. मसलन, साल के जाते-जाते संसद के बाहर से संविधान के मूल तत्व धर्मनिरपेक्षता को नई तरह से परिभाषित करने का उपक्रम इसी साल देखने को मिला. वैसे, संविधान ने अपनी रक्षा के प्रबंध पहले से कर रखे हैं, लेकिन वह खुद उठकर अपनी रक्षा नहीं कर सकता. यह काम लोकतंत्र के उन पहरुओं का है जो सरकार में और विपक्ष में होते हैं या वे भी जो विद्वान हैं. संविधान के लिए इस विपत्ति काल में उसके रक्षकों की तरफ से तत्परता दिखाई नहीं दे रही है. ऐसी तत्परता नहीं दिखने के विशेष वर्ष के रूप में भी यह साल शामिल न हो जाए, यह भी एक अंदेशा है.

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

 

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