जिंदगी को सिर्फ काटिए नहीं, इसे यूं सहज और सुंदर बनाइए!

'जिंदगी कैसी चल रही है?'

जिंदगी को सिर्फ काटिए नहीं, इसे यूं सहज और सुंदर बनाइए!

'जिंदगी कैसी चल रही है?'

'बस कट रही है।'

ये ऐसे वाक्य हैं जो अक्सर हमारी ज़ुबान पर होते हैं. बेतकल्लुफी से हम इन्हें बस ऐसे ही ठेल देते हैं. हम जीवन को जीते नहीं 'काटते' हैं, जैसे वो खेत की घास हो. 'काटने' से ही लगता है कि हम जीवन के प्रति कितने निराश और हताश हो चुके हैं, ऊब चुके हैं. क्या कभी इस सवाल का जवाब हम इस तरहे देंगे- 'बहुत बढ़िया चल रही है. आनंद आ रहा है. मौज हो रही है.' जिस दिन हम ऐसा बोलने लगेंगे 'जीवन सरल' होता चला जाएगा. ये जो काटना शब्द है, अक्सर हमारा वास्ता इससे जवानी या बुढ़ापे में पड़ता है. बचपन में हम जीवन को काटते नहीं बल्कि जीते हैं, सागर की लहरों की तरह मौजूं होकर और जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं, हमारे पास खुद के लिए वक्त कम पड़ता जाता है. हम जीवन को काटने लगते हैं या जब हमारे पास वक्त ही वक्त होता है और कोई सुनने वाला नहीं होता तब भी हमारे मुंह से यही शब्द निकलते हैं.

ऐसे में कई बार ऐसी भी स्थितियां आती हैं जब हमें लगता है कि जीवन बेहद कठिन है. संघर्षपूर्ण है. ठीक इसी वक्त में हमें एक निराशा घेर लेती है, जो स्तब्ध कर देने वाले सन्नाटे की तरह हमारे अंदर घर कर जाती है और हमारे चेहरे की हंसी छीन लेती है. ऐसे में अगर आपको किसी के मुंह से सुनने को मिल जाए- 'जीवन आसान है. हम इसे इतना कठिन क्यों बनाते हैं?' तो लाजमी है यह बात आपको अंदर तक छू जाएगी और आप इस पर सोचने को विवश हो जाएंगे.

साल 2016 की बात है. किसी ने मुझे TEDx का एक वीडियो इस गुजारिश के साथ भेजा कि इसे मैं पूरा सुनूं. एक नहीं कई बार सुनूं. आप यकीन नहीं मानेंगे तब से मैं इस वीडियो को कई-कई बार सुन चुका हूं. हर बार इसमें बोली गई बातें मुझे रोमांचित करती हैं. यह वीडियो जॉन जांडाई का है. मंच पर ढीले-ढाले कपड़े पहने दुबले-पतले से जॉन कहते हैं- 'जीवन सरल है. यह बेहद सरल और मस्ती से भरा हुआ है. यही एक ऐसा वाक्य है जिसे मैं हमेशा हर किसी से कहना चाहता हूं. जब मैं बैंकॉक में था, तब ऐसा नहीं सोचता था. मुझे लगता था- जिंदगी बहुत कठिन और जटिल है.'

मैं थाइलैंड के पूर्वोत्तर में स्थित एक गांव में पैदा हुआ. जब बच्चा था, सब कुछ आसान और मजेदार था लेकिन, टीवी के आते ही गांव में बहुत से लोग आए और उन्होंने कहा- 'तुम गरीब हो. तुम्हें जीवन में सफल होना है. सफलता को हासिल करने के लिए तुम्हें गांव छोड़कर बैंकॉक जाने की जरूरत है. बैंकॉक जाना जरूरी है.' यह  सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा. पर जब मैं बैंकॉक गया वहां कोई आनंद नहीं था. लोगों ने कहा- 'तुम्हें खूब पढ़ना है. सीखना है. कठिन परिश्रम करना है तब जाकर तुम सफल हो सकते हो.'

मैंने खूब मेहनत की. दिन में कम से कम आठ घंटे हार्ड वर्क किया. लेकिन, मुझे एक कप नूडल, कुछ तामा डिश और फ्राई चावल ही खाने को मिल पाया. मैं एक छोटे से गंदे कमरे में बहुत से लोगों के साथ रहता था. वहां बेहद गर्मी थी. इसके बाद मैंने खुद से सवाल करना शुरू किया.

अगर मैं खूब मेहनत कर रहा हूं, तो मेरी जिंदगी इतनी कठिन क्यों है?

कहीं जरूर कुछ गलत है. मैं इतना काम कर रहा हूं लेकिन हासिल कुछ नहीं हो पा रहा. मैंने फिर पढ़ना शुरू किया. मैं सीखने के लिए यूनिवर्सिटी गया और पाया कि यूनिवर्सिटी में पढ़ना बेहद मुश्किल है क्योंकि यह बोरिंग है. मैंने यूनिवर्सिटी में सारे सब्जेक्ट देखे. हर फैकल्टी को देखा. उनमें से ज्यादातर के पास 'घातक ज्ञान' था. मुझे लगा- 'यूनिवर्सिटी में मेरे लिए कोई उत्पादक (प्रोडक्टिव) ज्ञान नहीं है.'

मैंने देखा कि अगर आप सीखकर आर्किटेक्ट और इंजीनियर बनते हैं तो इसका मतलब है आप ज्यादा बर्बाद करते हैं. ये लोग जितना ज्यादा काम करते हैं उतने ज्यादा पहाड़ बर्बाद होते हैं. जमीने कंक्रीट में तब्दील होती हैं. अगर हम कृषि योग्यता सीखते हैं तो इसका मतलब है हम सीखते हैं- 'कैसे खतों को जहरीला करें. पानी को जहरीला करें. और हर चीज़ का विनाश करें.' मुझे लगा कि हम ये जो कुछ भी करते हैं कितना कठिन और जटिल है. ज़िंदगी बहुत कठिन है, यह देखकर मैं निराश हो गया.

फिर मैंने सोचना शुरू किया मैं यहां बैंकॉक में क्यों हूं?

जब मैं छोटा था. हमारे गांव में कोई भी दिन में आठ घंटे काम नहीं करता था. गांव के सभी लोग दिन में दो घंटे और साल में 2 महीने ही काम करते थे. एक महीने धान का रोपण और दूसरे महीने कटाई. बाकि के बचे 10 महीने लोगों के पास भरपूर वक्त था. यही वजह थी कि थाइलैंड में खूब त्यौहार होते थे. हर महीने त्यौहार होते थे, क्योंकि लोगों के पास काफी खाली वक्त था.

यहां तक कि दिन में सभी एक झपकी भी ले लिया करते थे. जब उठते थे तो गप्पे भी लड़ा लिया करते थे. एक दूसरे का हालचाल जान लेते थे. यह सब तभी कर पाते थे, क्योंकि लोगों के पास खूब वक्त था, खुद और दूसरों के लिए भी. यही वजह थी वो एक-दूसरे को समझते भी थे. जब वो एक दूसरे को समझते थे तो उन्हें पता था कि वो जिंदगी से क्या चाहते हैं? वो जानते थे उन्हें जिंदगी से खुशियां, प्यार और आनंद चाहिए.

यही वजह थी कि उनकी जिंदगी खूबसूरत थी. यह सोचकर मुझे लगा कुछ तो गलत हो रहा है. मैं ऐसी जिंदगी नहीं जी सकता. मैंने यूनिवर्सिटी छोड़ी और गांव लौट आया. मैं वापस घर लौट आया. मैंने उसी तरह जीवन जीना शुरू कर दिया, जैसे मैं बचपन में जीता था. साल में दो महीने काम किया और चार टन चावल उगाए. मेरा पूरा परिवार, हम छह लोग साल में सिर्फ आधे टन से भी कम खा पाए. इसलिए, हमने कुछ चावल बेच दिए. इसके बाद मैंने दो तालाब खोदे. मछली पाली. अब मेरे पास सालभर खाने के लिए मछली थी. इसके बाद मैंने एक छोटा- सा बागीचा बनाया. दिन में सिर्फ 15 मिनट इस बगीचे की देखभाल की और 30 तरह की सब्जियां उगाईं. छह लोग इतनी सब्जियां तो खा नहीं सकते, इसलिए मुझे कुछ सब्जियां बाजार में बेचनी पड़ी. इससे मेरी कमाई हुई.

इसके बाद मुझे लगा मैं सात साल बैंकॉक में क्यों था?

वहां इतना कठिन परिश्रम क्यों कर रहा था कि खाने के लिए भी पर्याप्त न हो सके. जबकि गांव में साल में दो महीने काम करके छह लोगों का पेट पाल रहा हूं. इससे आसान और क्या है? मुझे लगता था मेरी तरह मूर्ख जो स्कूल में अच्छा ग्रेड नहीं ला पाते, उनके पास कभी अपना घर नहीं हो सकता. स्कूल में जो ज्यादा नंबर लाते हैं, होशियार होते हैं उनके पास ही अच्छी नौकरी होती है. ...लेकिन, ऐसे लोगों को भी खुद का घर बनाने के लिए 30 साल से ज्यादा काम करना पड़ता है. पर मुझे जैसों के लिए जो यूनिवर्सिटी की पढ़ाई भी पूरी नहीं कर पाए, उनके पास कैसे खुद का घर होगा!

इसके बाद मैंने दिन में दो घंटे- सुबह पांच से सात बजे तक काम करना शुरू किया. इस तरह तीन महीने में खुद का घर बना लिया. मेरा जो दोस्त स्कूल में सबसे ज्यादा चालाक था उसे घर बनाने में 30 साल लग गए. उसकी तुलना में देखा जाये तो मेरे पास 29 साल और 9 महीने फ्री वक्त है. इसलिए, मैं महसूस करता हूं जिंदगी बेहद आसान है.

मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं घर बना सकता हूं. इसके बाद से मैं हर साल एक घर बना रहा हूं. अब मेरे पास, पैसे नहीं है लेकिन बहुत से घर हैं. अब मेरी समस्या है कि आज रात मैं किस घर में सोने जाऊंगा. इसलिए, घर बनाना कोई समस्या नहीं है. हर कोई घर बना सकता है. यह बहुत आसान है. अगर आपको मेरे पर यकीन नहीं है तो आप भी कोशिश कर सकते हैं. अगर यदि कोई अपना घर बनाना चाहता है तो..

अब इसके बाद अगली चीज़ आई कपड़े.

मैं खुद को गरीब महसूस करता था. मुझे लगता था मैं खूबसूरत नहीं हूं. खूबसूरत दिखने के लिए मैं दूसरों की तरह जैसे कि फिल्म स्टार्स जैसे कपड़े पहनने की सोचता था. एक जोड़ी जींस खरीदने के लिए मैंने एक महीने तक पैसे बचाए. जब मैंने इसे पहना था सबसे पहले दाएं-बाएं घूमकर खुद को शीशे में देखा. कई बार देखा. हर बार मेरे में कोई बदलाव नहीं आया. मुझे लगा मैं तो वही पुराना व्यक्ति हूं. इतनी महंगी पैंट मेरी जिंदगी नहीं बदल पाई. मुझे लगा मैं ही सबसे ज्यादा पागल हूं. मैंने क्यों इतनी महंगी पैंट खरीदी? पैंट खरीदने के लिए एक महीने तक पैसे बचाए, लेकिन ये पैंट मुझे बदल न सकी.

इसके बाद मैंने सोचना शुरू किया कि मुझे क्यों फैशन को फॉलो करना चाहिए? जो तुम्हारे पास है उसी को पहनो. अब 20 साल से ज्यादा हो गए हैं मैंने कोई कपड़ा नहीं खरीदा. मेरे पास जो भी कपड़े हैं वो दूसरों के छोड़े हुए हैं. जो कोई भी जब मुझसे मिलने आता है तो कपड़े छोड़ जाता है. अब मेरे पास कई कपड़े हैं. जब लोग मुझे पुराने कपड़ों में देखते हैं तो और ज्यादा कपड़े दे देते हैं. उसके बाद मैं उन कपड़ों को दूसरों को दे देता हूं.

आखिरी चीज़

जब में बीमार पड़ूंगा तो क्या करूंगा?

इस बारे में सोचकर मैं जरूर परेशान हुआ. अगर मेरे पास पैसा नहीं होगा तो क्या होगा? फिर मुझे लगा बीमार पड़ना मामूली चीज़ है. यह इतना भी खराब नहीं है. बीमार पड़ने का मतलब है हमें कुछ याद दिलाना. यह याद दिलाना कि हमने कुछ गलत किया है, तभी हम बीमार पड़े हैं. और मैंने सीखा कि पानी का कैसे इस्तेमाल किया जाए कि बीमार पड़ने पर ठीक हो सकें. मैंने खुद को ठीक रखने का सामान्य ज्ञान सीखा. इसीलिए, अब मुझे लगता है जिंदगी बेहद आसान है. मुझे आज़ादी महसूस होती है. मैं किसी भी चीज़ को लेकर घबराता नहीं हूं. मेरे अंदर डर का भाव सीमित मात्र है. मैं अपने जीवन में जो कुछ भी चाहता हूं, कर सकता हूं.

जॉन जांडाई की ये मामूली सी छोटी-छोटी बातें जीवन के उस तिलिस्म को आसानी से खोलकर सामने रख देती हैं, जिनमें हम सबकी जिंदगी उलझाी हुई हैं। बेवजह के सवालों और ख्वाहिशों में दफ्न होती जिंदगी की रंगीनियत को जॉन तो समझ गए, लेकिन अभी हम जैसे न जाने कितने और लोगों को ​जीवन सरल बनाने के लिए खुद से ऐसे ही सहज सवाल पूछने होंगे. जॉन खुश है, क्योंकि उसने खुद से संवाद किया और हम में से अधिकतर जीवन के संगीत को भुला चुके हैं, जिनमें सवाल भी थे और जिंदगी के उलझे हुए ही सही लेकिन जवाब भी...

(लेखक हमारी सहयोगी वेबसाइट bgr.in में चीफ सब एडिटर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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