हिंदी के दांत, खाने के कुछ दिखाने के कुछ

हिन्दी, सरकार और राजनीति दोनों के दोमुंहापन का शिकार हो गई. यह दोमुंहापन आज भी जारी है. लाटसाहबियत में अंग्रेजी अभी भी है, कल भी रहेगी, नेता कुछ भी बोलें उसे फर्जी समझिए.

हिंदी के दांत, खाने के कुछ दिखाने के कुछ

दिलचस्प संयोग है कि हिंदी पक्ष हर साल पितरपक्ष के साथ या आगे पीछे आता है. परंपरानुसार हम लगे हाथ हिंदी के पुरखों को याद करके उनकी भी श्राद्ध और तर्पण कर लेते हैं.हाल ही हम मॉरीशस के विश्व हिंदी सम्मेलन से निपटे हैं. इससे पहले भोपाल में विश्व हिंदी सम्मेलन रचा गया था. सरकारी स्तर पर कई दिशा-निर्देश निकले, संकल्प व्यक्त किए गए. लगा मध्यप्रदेश देश में हिंदी का ध्वजवाहक बनेगा, पर ढाक के वही तीन पात.

सरकार हिंदी को लेकर कितनी निष्ठावान है, यह जानना है तो जा के भोपाल का अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय की दशा देख आइए. विश्वविद्यालय की परिकल्पना यह थी कि विज्ञान, संचार से लेकर चिकित्सा और अभियंत्रिकी तक सभी विषय हिंदी में पढ़ाएंगे. आज भी विश्वविद्यालय नामचार का है. सरकार को अपनी नाक की चिंता ना हो तो इसे कब का बंद कर चुकी होती.

 हां, नरेन्द मोदी को इस बात के लिए साधुवाद दिया जाना चाहिए कि वे हिंदी के लोकव्यापीकरण में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं. उन्हें विदेशों में भी हिंदी में सुनकर अच्छा लगता है. जब बहुत ही जरूरी होता है तभी वे अंग्रेजी में बोलते हैं. मोदी गुजराती हैं, गांधी के इलाके के. उनकी मातृभाषा भी गुजराती है. इसी जुबान में उन्होंने कई कविताएं भी रची हैं. डा.मनमोहन सिंह तो अपने प्रधानमंत्रित्व काल में इंग्लैंड में जाकर भारतीयों को अंग्रेजी की दीक्षा देने के लिए क्राउन के प्रति श्रद्धावनत हो आए थे.

सही पूछा जाए तो अहिंदी क्षेत्रवासियों ने ही हिंदी का बाना उठाया. बालगंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, सुब्रह्मण्यम भारती, रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसे मनीषी थे, जिन्होंने हिंदीकी प्राण प्रतिष्ठा में मदद की. ये सभी यह मानते थे कि हिंदीही देश को एक सूत्र में बांध सकती थी. क्योंकि यह संघर्ष की भाषा है, यह आंदोलन की जुबान है.

महात्मा गांधी खुद स्वीकार करते थे कि उनकी हिंदी कमजोर है फिर भी यह भाषा राष्ट्र की आन, बान, शान है. देश को आजादी प्राप्त होने के तत्काल बाद जब बीबीसी ने गांधीजी का इंटरव्यू लिया था तभी उन्होंने ऐलान कर दिया-दुनिया वालों को बता दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता." संविधान  में हिंदीको जब राजभाषा स्वीकार किया गया तो ये बात कही गई कि निकट भविष्य में देश अंग्रेजी की केंचुल उतार फेंकेगा, लेकिन यह एक झांसेबाजी थी.

भारतीय प्रशासनिक एवं समकक्षीय सेवाएं जिनसे देसी लाटसाहब तैयार होते हैं, वहां हिंदी के संस्कार नहीं दिए गए. ये देश के नए राजे-महाराजे हैं और हर बाप अपने बेटों का भविष्य इन्हीं की छवि में देखता है. इसलिए सरकारी स्कूलों के समानांतर पब्लिक स्कूलों का कारोबार आजादी के बाद न सिर्फ जारी रहा वरन दिनदूना रात चौगुना बढ़ता रहा. साठ के दशक तक आते आते यह धारणा पुख्ता हो गई कि अंग्रेजी अफसर पैदा करती है और हिंदी चपरासी.

 इन्हीं दिनों जब डाक्टर राममनोहर लोहिया ने हिंदीका आंदोलन चलाया तो मध्य व पिछड़ा वर्ग इसलिए जुडा़ कि उनके बच्चों के लिए भी भविष्य का रास्ता हिंदी से भी साफ होगा. समाजवादी नेताओं ने इसका फायदा उठाया. कई राज्यों की सरकारें बदलीं. इधर डा.लोहिया सत्तर का दशक नहीं देख पाए, उधर इनके चेलों ने लोहिया के संकल्पों को विसर्जित करना शुरू कर दिया. चरण सिंह और मुलायम सिंह लोहिया टोपी लगाकर बात तो हिंदी की बढ़ाने की करते थे, पर बेटों को विलायत पढ़ने के लिए भेजते रहे.

हिन्दी, सरकार और राजनीति दोनों के दोमुंहापन का शिकार हो गई. यह दोमुंहापन आज भी जारी है. लाटसाहबियत में अंग्रेजी अभी भी है, कल भी रहेगी, नेता कुछ भी बोलें उसे फर्जी समझिए.
 
हिंदी अब तक न्याय की भी भाषा नहीं बन पाई. उच्च न्यायालयों में नख से शिख तक अंग्रेजी है. मुव्वकिलों को हिंदीकी एक चिंदी का अंग्रेजी रूपांतरण करवाना होता है और उसके लिए भी रकम खर्चनी पड़ती है. यहां अंग्रेजी शोषण की भाषा है. कल्पना करिए यदि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में हिंदीव देश की अन्य भाषाओं को उनके क्षेत्र हिसाब से चलन में आ जाए तो अंग्रेजी का एकाधिकार टूटने में पलभर भी नहीं लगेगा. मंहगे वकीलों की फीस जमीन पर आ जाएगी और न्याय भी सहज और सस्ता हो जाएगा.

हिंदी और देशी भाषाओं की लड़ाई लड़ने वाले श्यामरुद्र पाठक की सुधि लेने वाली न भाजपा है, न स्वदेशी आंदोलन वाले. सन् 2011 में यूपीए सरकार के खिलाफ लंबी लडा़ई लड़ी. सालों-साल धरने पर बैठे रहे. एक दिन सरकार ने पकड़कर तिहाड़ भेज दिया तब से पता नहीं कि वे कहां हैं.

श्यामरुद्र पाठक कोई मामूली आदमी नहीं हैं. उच्च शिक्षित व हिंदी माध्यम से विज्ञान विषय में पीएचडी करने वाले, हिंदी माध्यम से आईएएस की परीक्षा पास करने वाले.

मोदीजी भले ही हिंदीकी बात करें पर वे ऊंची अदालतों और लाटसाहबी की भाषा हिंदीको बना पाएंगें मुश्किल है. इसकी साफ वजह है. पिछली सरकारों से लेकर अब की सरकार में भी बडे़ वकील ही प्रभावशाली मंत्री हैं. ये जब कुछ नहीं रहते तब वकील होते हैं. जब अंग्रजी ही इनकी विशिष्टता है त़ो भला ये क्यों राय देंगे कि हिंदीऔर देशी भाषाओं को न्याय की भाषा बनाई जाए.
 
सरकार के नीति निर्देशक प्रारूप यही अंग्रेजीदा लाटसाहब लोग बनाते हैं. तो ये अपनी ही पीढ़ी के पांच में कुल्हाड़ी क्यों मारेंगे. सो यह मानकर चलिए कि ये सरकारों में आने जाने वाले लोग बातें तो हिंदीकी बहुत करेंगे, कसमें खाएंगे और संकल्प भी लेंगे पर हिंदी की बरकत के लिए करेंगे कुछ भी नहीं.
 
हिंदीको हिंदीके मूर्धन्य भी नहीं पालपोस रहे हैं. उनकी रचनाओं, कृतियों को पढ़ता कौन है..जो पीएचडी कर रहे होते हैं वे, या वे जिन्होंने समालोचकों का हुक्का भरा व उसके प्रतिद्वंद्वी को गरियाने में समय जाया किया. वे भी हिंदी के हितैषी कहां.? जो सरकार से लाभ या लोभ मे कमराबंद संगोष्ठियों में अपनी अपनी सुनाने  में ही मुदित हैं व इक दूजे को हिंदी का महामहोपाध्याय घोषित कर रहे हैं.
 
 यदि ये माने कि हिंदी इनके माथे बची है या आगे बढ़ रही है तो मुगालते में हैं. हिंदी में कोई बेस्टसेलर क्यों नहीं निकलती...? मैंने ही कमलेश्वर की..कितने पाकिस्तान ..के बाद कोई पुस्तक नहीं खरीदी. प्रेमचंद, निराला, दिनकर और इनके समकलीन ही बुकस्टाल्स में अभी भी चल खप रहे हैं.
 
दरअसल जो लोकरूचि का लेखक है, उसे ये महंत और उनके पंडे साहित्यकार मानते ही नहीं. बाहर गॉडफादर, और लोलिता जैसे उपन्यासों को साहित्यिक कृति का दर्जा है. यहां ऐसी कृतियों को लुगदी साहित्य करार कर पल भर में खारिज कर दिया जाता है. हिंदी के कृतिकार अपने ख़ोल में घुसे हैं. यही इनकी दुनिया है.

 हिंदीको बाजार पालपोष रहा है. यह उत्पादक और उपभोक्ता की भाषा है. बाजार के साथ साथ हिंदी का भी आकार बढ़ रहा है. फिल्में हिंदी को सात समंदर पार ले जा रही हैं. जिस काम की अपेक्षा साहित्यकारों से है वह काम अपढ फिल्मकार कर रहे हैं. हिंदी की गति उसकी नियति से तय हो रही है. जैसे फैले फैलने दीजिए. अपन तो यही मानते हैं कि जैसे घूरे के दिन भी कभी न कभी फिरते हैं, वैसे ही हिंदी के भी फिरेंगे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

 

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