Book Review : जीवन के गणित की 'प्रमेय' समझातीं रचनाएं

इस पुस्तक की कविताएं न केवल परिस्थितियों और उनमें न्यस्त विडंबनाओं का वर्णन करती हैं बल्कि आप इनमें सुदीर्घ चिंतन की एक ऐसी अंतर्धारा का सहज बोध करेंगे जो अंततोगत्वा आपका साक्षात्कार जीवन के एक सत्य, एक सुचिंतित जीवन-दर्शन से कराएंगी.

Pavan Chaurasia पवन चौरसिया | Updated: Mar 8, 2018, 02:58 PM IST
Book Review : जीवन के गणित की 'प्रमेय' समझातीं रचनाएं

एक नज़र में देखें तो कविता लेखन की वह विद्या-शैली है जो संभवत: सबसे जटिल प्रतीत होती है, और दूसरी ओर शायद सबसे सरल और स्वाभाविक भी जान पड़ती है. लेकिन इस तथ्य को लेकर कोई दो राय नहीं है कि कविता निःसंदेह अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावी माध्यम है. ऐसा इसलिए क्योंकि कविता, लेखन की दूसरी विद्याओं की तरह आपको रुककर असहमति या सर्वपक्षीय चिंतन का मौका नहीं देती. वह आपको अपने प्रवाह और लय में बहा ले जाती है, मानो कोई नदी अल्हड़ रूप से बस चल रही हो, जैसे चलना ही बस उसका काम हो. कुछ ऐसे कि बहुधा आप कवि के इंगित पक्ष पर न चाहते हुए भी अपनी सहमति दे दें. लेखन की बाकी विद्याएं पाठक के मानस पर शायद ही ऐसा प्रभाव उत्पन्न कर पाती हों. मेरा मानना है कि किसी कविता की सार्थकता और सफलता इसी बात में निहित होती है कि वह अपने पाठकों को कितने प्रभावी तरीके से 'अपने हिस्से के सच' से सहमत कर पाती है. कविता की बाकी शास्त्रीय कसौटियों में ये सबसे प्रधान कसौटी है.

रचना-संग्रह 'जीवन का गणित' को पढ़ते हुए यह स्पष्ट रूप से पता चलता है कि ‘अनिकुल’ की कविताएं न केवल इस कसौटी पर खरी उतरती हैं, बल्कि पाठक के मानस पर अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. ये कविताएं न केवल परिस्थितियों और उसमें न्यस्त विडंबनाओं का वर्णन करती हैं बल्कि आप इनमें सुदीर्घ चिंतन की एक ऐसी अंतर्धारा का सहज बोध करेंगे जो अंततोगत्वा आपका साक्षात्कार जीवन के एक सत्य, एक सुचिंतित जीवन-दर्शन से कराएंगी.

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हिंदी कविता के इस काल में जब कविता जगत में रूमानियत का दौर है, तब इन कविताओं में आप इश्क़-मोहब्बत से ज्यादा समूची मानवजाति के कल्याण की पूर्वाग्रह रहित कामना पाएंगे. इन रचनाओं में आप आधुनिकता की भेड़-चाल में ढहते युग-सत्य का दर्शन कर सकते हैं. गंभीर विषयों और जीवन-दर्शन को प्रकाशित करते हुए भी ये कविताएं कहीं भी 'भारीपन' का शिकार नहीं लगतीं, वैसे ही जैसे किसी नदी का शीतल पानी, जो कितनी भी तेज़ धारा में चले, लेकिन अपनी निर्मलता कभी ख़त्म नहीं होने देता. यह कवि की शैली का सबसे बड़ा चमत्कार है. आप इसका अंदाज़ा नीचे की दो पंक्तियों से लगा सकते हैं-

कुछ इतने में ही सिमट आयीं गोया जिंदगी की सारी बातें,
प्यार के दो फूल, पुरुषार्थ के दो मोती, नसीब के दो चाटें.

किसी भी रचना का वास्तविक अर्थ और भाव उसके रचयिता के जीवन-परिचय के बिना अधूरा ही रहता है. ऐसा इसलिए क्योंकि बिना लेख़क/कवि के प्रसंग (context) को समझे हम उनकी रचना (text) के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते. अगर हम कबीर के फक्कड़ी-जीवन को नहीं जानेंगे तो कैसे समझेंगे कि उनके द्वारा लिखे गए दोहे, जैसे-

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर’

 
और

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाया
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

ये पंक्तियां किसी समुदाय का उपहास करने के लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के पाखंड के ऊपर से पर्दा हटाने के लिए लिखी गईं थीं.

इसीलिए ‘जीवन का गणित’ के लेखक अभिनव शंकर 'अनिकुल' के जीवन का गणित जानना सबसे आवश्यक है. रचनाकार बोकारो में रहते हैं और भारत सरकार के एक महती उपक्रम में वरिष्ठ अधिकारी हैं. पेशे से इंजीनियर हैं किन्तु पत्रकारिता में भी काफी काम कर चुके हैं. कई प्रतिष्ठित वेब-पोर्टल के नियमित स्तम्भ-लेखक हैं. लेखक सुदूर आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर काम कर रही संस्था ‘नमन फाउंडेशन’ के राष्ट्रीय सलाहकार हैं. लेखक इसके अलावा भारत सरकार रजि० मानवाधिकार संस्था 'राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं अपराध नियंत्रण ब्यूरो' के राष्ट्रीय सलाहकार हैं. युवा लेखक होने की वजह से वो साहित्य में एक नया दृष्टिकोण तो लाते ही हैं, साहित्य के स्तम्भ समझे जाने वाले गुण अनुभव और गंभीरता की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं.

पुस्तक परिचय के अनुसार- 'पेशे से इंजीनियर लेखक ने जब जिन्दगी को कागज़ पर उतारने की ठानी तो शब्दों के जो समीकरण बने, भावों का जो मानकीकरण हुआ और उससे जीवन का जो गणित उभरा- ये रचनाएं उस गणित की 'प्रमेय' हैं. रचनाएं जो जीवन के नैराश्य को भी साहित्य के रंग में भर मनोरम बना देती हैं और जीवन के उत्सव को अप्रीतम!! रचनाएं जो कल्पना का चित्रण करते हुए उसे यथार्थ से ज्यादा विश्वसनीय बना देती हैं और यथार्थ का चित्रण करते हुए उसे कल्पना से अधिक अकल्पनीय!!' ये रचनाएं पढ़ते समय आप इस परिचय से काफी हद तक सहमत होंगे.

Jiwan ka ganit

कुल तीन खण्डों में बंटी इन रचनाओं (1.दुनियावी 2. रूमानी और 3. रूहानी) में ज्यादातर कविताएं 'दुनियावी' हिस्से की हैं. पर 'रूमानी' और 'रूहानी' खण्डों में जो थोड़ी कविताएं आई हैं वह भी अपनी-अपनी श्रेणी में विलक्षण अन्तर्दृष्टियों की अभिव्यक्तियां हैं. इस रचना संग्रह में "झलकियां" खंड के तहत आगामी उपन्यास के कुछ अंश भी दिए गए हैं. पूरी तरह रूमानियत में डूबे इन अंशों को पढ़ते समय आपको महसूस होगा कि गद्य में होने के बावजूद ये रचनाएं एक 'पोएटिक रोमांटिसिज़्म' ली हुई हैं. पद्य में ऐसी गंभीरता और दार्शनिकता के बाद गद्य में ऐसी रूमानियत पाठक को सुखद आश्चर्य से भर देती है. साथ ही लेखक की लेखनी भी विविधतापूर्ण संभावनाओं को लेकर हिंदी जगत को आश्वस्त करती है.

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इस रचना-संग्रह को ऑनलाइन खरीदा जा सकता है. यह पुस्तक अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में भी उपलब्ध है. आज के ऑनलाइन दौर से कदमताल करते हुए ये पुस्तक “इ-बुक” संस्करण में भी उपलब्ध है.

इसकी प्रस्तावना प्रख्यात लेखक डॉ. अशोक कुमार शर्मा ने लिखी है. आवरण-पृष्ठ पर पुस्तक-परिचय और कवि-परिचय (जो इस रचना संग्रह का उपशीर्षक भी है) भी इस सुरुचिपूर्ण अंदाज़ में लिखे गए हैं जो पाठक को पुस्तक के भीतर झांककर देखने को प्रेरित करते हैं. कुल मिलाकर ‘अनिकुल’ की ये रचनाएं अपने पाठकों को साहित्य के स्तरीय आनंद का आस्वादन करवा पाने में सफल प्रतीत होती हैं.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)



(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)