JNU Elections : लाल के मुकाबले नीला और भगवा

जेएनयू एक जमाने में ‘लाल-गढ़’ के नाम से जाना जाता था, जहां वामपंथी विचारधारा ही हावी रहती थी. लाल से अलग कोई भी रंग (नीला, भगवा आदि) अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा पाने में सफल नहीं हो पाता था. यहां तक कि पूरी डिबेट मार्क्स से शुरू होकर, लेनिन से होते हुए फिदेल कास्त्रो पर जाकर खत्म होती थी.

JNU Elections : लाल के मुकाबले नीला और भगवा

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में इस साल 14 सितंबर को छात्र-संघ (जेएनयूएसयू- जवाहरलाल यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन) के चुनाव होने हैं. जेएनयू का छात्रसंघ चुनाव अपनी विशेष शैली के लिए पूरे देश में मशहूर है और मीडिया का भी इस पर जबर्दस्त ध्यान जाता है. भले ही विश्वविद्यालय में छात्रों (मतदाताओं) की संख्या सात हजार के आस-पास ही है (दिल्ली विश्वविद्यालय में यह संख्या एक लाख से भी अधिक है.), लेकिन जेएनयू छात्रसंघ चुनाव को किसी बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव जितनी ही महत्ता मिलती है. जेएनयू की विशेषता भी रही है कि यहां के चुनाव में पैसे, गाड़ियों और बाहुबल आदि का प्रयोग लगभग न के बराबर है, जैसा कि अन्य विश्विद्यालयों में प्रायः देखा जाता है और जिसकी वजह से समय-समय पर कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में चुनावी राजनीति पर रोक लगाने की मांग की जाती रही है.

जेएनयू एक जमाने में ‘लाल-गढ़’ के नाम से जाना जाता था, जहां वामपंथी विचारधारा ही हावी रहती थी. जहां पर असली चुनावी मुकाबला बस लाल रंग (वामपंथ) के ही अलग-अलग छाया (शेड्स) के बीच होता था. लाल से अलग कोई भी रंग (नीला, भगवा आदि) अपनी उपस्थिति भी दर्ज करा पाने में सफल नहीं हो पाता था. और तो और संगठनों में यह दर्शाने की होड़ लगी रहती थी कि कौन अधिक लाल है, अर्थात किस संगठन का झुकाव वामपंथ की तरफ ज्यादा है. सारी की सारी डिबेट मार्क्स से शुरू हो कर, लेनिन से होते हुए फिदेल कास्त्रो पर जाकर खत्म होती थी. हर तरफ, ढफली, कामरेड, लाल सलाम और क्रांति की ही गूंज सुनाई पड़ा करती थी.

 इसी विश्वविद्यालय ने भारत की वामपंथी राजनीति को कई बड़े नेता दिए हैं, फिर चाहे वो माकपा के वर्तमान महासचिव सीताराम येचुरी हों या पूर्व महासचिव प्रकाश करात. ये दोनों ही नेता जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके हैं.

लेकिन आज ऐसा नहीं है और जेएनयू अपनी इस पुरानी छवि से निकलकर बहुत आगे आ चुका है. वैश्विक-परिदृश्य की भांति आज यहां कैंपस में भी वामपंथी विचारधारा वाले संगठन हाशिये पर हैं. बल्कि यह कहना भी अतिशियोक्ति नहीं होगा कि ये संगठन जेएनयू की तत्कालीन राजनीति में अपनी उत्तरजीविता (Survival) की लड़ाई लड़ रहे हैं. इसका परिणाम यह हुआ है कि कैंपस में दक्षिणपंथी विचारधारा वाली छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (ABVP) का वोट तेजी से बढ़ रहा है. उसके अलावा जेएनयू में साल 2015 से अस्तित्व में आया अम्बेडकरवादी विचारधारा से ताल्लुक रखने वाला संगठन BAPSA (बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) भी छात्रों में अपनी पैठ बनाने में सफल रहा है. अब कैंपस की डिबेट में अगर कार्ल मार्क्स हैं, तो स्वामी विवेकानंद भी हैं, लेनिन हैं तो अम्बेडकर भी हैं, ढफली है तो शंख भी, और ‘लाल सलाम’ है तो ‘जय भीम, हुल जोहार’ और ‘वंदे मातरम्, भारत माता की जय’ भी है! यानी किसी विचारधारा विशेष का न तो एकाधिकार बचा है और न वर्चस्व.

जेएनयू की राजनीति में वामपंथी संगठनों की मौजूदा स्थिति क्या हो गई है इसका अंदाजा 2018 के जेएनयूएसयू चुनाव में उनके गठबंधन को देखकर लगाया जा सकता है. यह चुनाव चार लेफ्ट संगठन मिलकर ‘लेफ्ट-यूनिटी’ के नाम से लड़ रहे हैं और केन्द्रीय पैनल की चार सीटों पर सबने अपने संगठन से एक-एक प्रत्याशी खड़ा किया है. इन चार संगठनों में भाकपा-माले (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)) की छात्र इकाई AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन), भाकपा (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) की छात्र इकाई AISF (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन), माकपा (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) की छात्र इकाई SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ़ इंडिया) के अलावा SFI से ही टूटा हुआ एक धड़ा DSF (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन) शामिल हैं. जो लोग भारत की छात्र-राजनीति से, और विशेष रूप से जेएनयू की राजनीति से परिचित हैं वो यह अच्छी तरह जानते हैं कि किस तरह से आज से कुछ साल पहले तक इस प्रकार के गठबंधन की कल्पना करना भी असंभव माना जाता था. मौजूदा लेफ्ट-यूनिटी में आज जो संगठन हैं, अभी कुछ ही साल पहले तक एक दुसरे के धुर-विरोधी, या कहें कि सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे और एक दूसरे पर हर तरह के जायज-नाजायज आरोप लगाया करते थे.

गठबंधन का सबसे बड़ा संगठन AISA हमेशा से ही SFI को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता रहा है. यहां तक कि उसका जन्म और विस्तार भी SFI की नीतियों और विचारधारा की आलोचना करके ही हुआ है. और SFI भी जेएनयू में अपने नब्बे के दशक के वर्चस्व को पाने के लिए AISA को ही सबसे बड़ा रोड़ा मानता था क्योंकि जेएनयू में AISA की ताकत और राजनीतिक भूमिका SFI की कमजोरी की कीमत पर ही बनी है. एक तरफ जहां AISA, SFI को पश्चिम बंगाल की माकपा सरकार द्वारा सिंगूर एवं नंदीग्राम में किये गए अपराधों के लिए घेरती रही है, वहीं SFI भी AISA को उसके कुछ बड़े नेताओं द्वारा तथाकथित रूप से किए गए यौन शोषण के लिए उसकी जोरदार मुखालफत करने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. इन सबके बीच AISF, जो कैंपस में काफी कमजोर हो चुकी थी, इन दोनों ही संगठनों को इनकी नाकामियों के लिए आड़े हाथों लेती रही है.

ध्यान रहे कि 9 फरवरी की तथाकथित रूप से देश-विरोधी नारे लगने की घटना से सुर्खियों में आए जेएनयूएसयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार AISF के प्रत्याशी थे जिन्होंने 2015 में जेएनयू में अध्यक्ष पद के लिए होने वाली प्रेसिडेंटशिअल डिबेट में अपने भाषण में इन दोनों ही संगठनों पर करारा हमला किया था. ऐसे में इन सभी का एक गठबंधन में आना उतना ही आशचर्यजनक है जितना कि राष्ट्रीय राजनीति में परस्पर विरोधी सपा और बसपा का. इस साल यूनाइटेड लेफ्ट का मुकाबला 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से कैंपस में तेजी से मज़बूत हुई भगवा ABVP से और पारम्परिक रूप से लेफ्ट के समर्थक रहे दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों को तीव्र गति से अपनी ओर खींचने वाले संगठन नीले BAPSA से है. इसके अलावा कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI (नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया) भी मुकाबले में है.

इन सबके बीच लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद की छात्र-इकाई हरी ‘छात्र राजद’ भी पहली बार जेएनयू के चुनावी मैदान में उतर रही है. चुनाव परिणाम चाहे जो भी हों, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि जेएनयू की राजनीति में अब केवल एक रंग (लाल) का एकाधिकार नहीं रह गया है और विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते अलग-अलग रंग भी इस राजनीति में शामिल हो चुके हैं, जिससे यह और अधिक लोकतांत्रिक और मजबूत हुई है. देखतें हैं इस साल जेएनयू में कौन सा रंग चढ़ता है...

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के शोधार्थी हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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