राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद के मायने

Last Updated: Tuesday, June 20, 2017 - 09:51
राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद के मायने
यदि कोविंद राष्ट्रपति बनते हैं तो दलित समुदाय से आने वाले वो दूसरे राष्ट्रपति होंगे.

पवन चौरसिया

26 जनवरी, 1950 को जब स्वतंत्र भारत ने अपना संविधान लागू किया तो वो कई मायनों में एक क्रांतिकारी कदम था. लगभग दो सौ से भी अधिक सालों की दासता के बंधनों को तोड़ कर भारत के नए भविष्य की ओर बढ़ा रहा था और अपनी दशा और दिशा का स्वामी भी वो स्वयं बनने जा रहा था. ऐसे में भारत ने अपनी शासन व्यवस्था और सरकार के लिए उस समय मौजूद संसदीय शासन प्रणाली (parliamentary system) और अध्यक्षीय शासन प्रणाली (presidential system) में से पहली वाली को चुना. 

संविधान सभा का यह मानना था कि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में संसदीय प्रणाली अधिक तर्कसंगत और न्यायसंगत होगी. और चूंकि संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है, अर्थात् यदि विधायिका का कार्यपालिका में विश्वास नहीं रह जाता तो विधायिका उसे हटा सकती है, इसलिए भी इस प्रणाली को स्वीकार किया गया. इसका मतलब यह भी नहीं कि भारतीय शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति महज केंद्र सरकार का एक सरकारी प्रतिनिधि बन कर रहे. बल्कि संविधान की भावना के अनुसार राष्ट्रपति को भारतीय राज्य का प्रमुख और प्रथम नागरिक का दर्जा दिया गया है. इसके अलावा वो तीनो सेनाओं का प्रमुख भी होता है. यही नहीं, अपनी शपथ के अनुसार संविधान को संरक्षित, रक्षा और बचाव करना भी उनका दायित्व है. ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि जो भी व्यक्ति इस पद पर आसीन हो वो अपने कर्तव्यों और शपथ के साथ पूरा न्याय करे. 

प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर मौजूदा राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी तक सभी व्यक्तियों ने इस पद की गरिमा ही बढ़ाई है और समय-समय पर अपने निर्णयों से यह दर्शाया है के वो एक केंद्र सरकार का एक ‘रबर-स्टाम्प’ नहीं हैं, बल्कि राजनीति से परे राष्ट्रनीति के नायक हैं जिनके लिए कोई भी पार्टी, व्यक्ति या पद संविधान से ऊपर नहीं हो सकता है.

कुछ ही दिनों में पंद्रवां राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहा है. सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस चुनाव के लिए कमर कस चुके हैं और अपनी-अपनी तैयारियों में पूरे जोर-शोर से लगे हुए हैं. मैंने अपने पुराने लेख में पहले ही यह चर्चा की थी के किस प्रकार से यह चुनाव विपक्ष के लिए किसी अग्नि-परीक्षा से कम नहीं है. और अब तो यह लग रहा है कि सत्ताधारी भाजपा भी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है और इस चुनाव के जरिये जनता में अपनी पकड़ को और मजबूत करना चाहती है. 

यह लेख लिख जाने तक यह समाचार आ रहा था कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के राज्यपाल श्री रामनाथ कोविंद को रा.ज.ग. का उम्मीदवार घोषित कर दिया है. ऐसा माना जा रहा है के इस कदम के पीछे भाजपा की दूरदर्शी रणनीति है. कोविंद उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर से हैं और भाजपा के दलित समुदाय से आने वाले के नेताओं की प्रथम पंक्ति में से एक हैं. अपने साथ राजनीति का एक लंबा अनुभव रखने वाले कोविंद पेशे से अधिवक्ता भी हैं और साफ सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं. 

बिहार के राज्यपाल के रूप में अपने मौजूदा कार्यकाल में भी भाजपा की विरोधी लालू-नीतीश की सरकार होने के बावजूद वो किसी भी विवाद से दूर रहे हैं. भाजपा उनके नामांकन के ज़रिये यह संदेश देना चाहती है के एक जमाने में ब्राहमण-बनिया की पार्टी कही जाने वाली भाजपा आज सर्व-समाज, विशेष रूप से दलित-समाज की हितैषी है और यह साबित करने के लिए वो हर संभव प्रयास करने को तैयार है. 

वैसे भी देखा जाए तो बसपा के लगातार खराब प्रदर्शन ने दलित राजनीति के लिए नेतृत्व की गहरी समस्या और कुछ हद तक शुन्यता भी पैदा कर दी है. इसी रिक्त-स्थान को भाजपा भरना चाहती है और यह कदम भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. वैसे भी उत्तर प्रदेश विधान-सभा में मिली भारी बहुमत दलित वोटों के भाजपा के खेमे में जाने का ही परिणाम है. लेकिन फिर उसके बाद सहारनपुर की घटना ने भाजपा को बैकफुट पर ला के खड़ा कर दिया. जिस प्रकार से भीम-आर्मी ने बिना किसी विशेष साधन के सिर्फ सोशल-मीडिया के दम पर इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया और भीम-आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर को रातों-रात युवा दलितों का हीरो बना दिया, वो यह दर्शाता है के आज भी दलित समुदाय भाजपा को पूरी तरह अपना नहीं पाया है उसको शंका की दृष्टि से देखता है. 

यदि कोविंद राष्ट्रपति बनते हैं तो दलित समुदाय से आने वाले वो दूसरे राष्ट्रपति होंगे. इसके पहले सन 1997 में तमिलनाडु के श्री के. आर. नारायणन इस पद पर बैठ चुके है. कोविंद पर न सिर्फ यह जिम्मेदारी होगी कि वो संविधान की रक्षा करें बल्कि उनसे यह विशेष आशा भी जुड़ जाएगी कि वो दलित और वंचित समाज के लिए एक कदम आगे जा कर उनकी समस्याओं और चुनौतियों पर ध्यान दें जो संवैधानिक और राजनीतिक रूप से तो बराबरी का दर्जा प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन सामाजिक और आर्थिक रूप से आज भी बहुत पीछे हैं. 

श्री नारायण की तरह एक शिक्षित और सक्षम दलित को देश के सर्वोच्च पद पर देख कर देश के उन करोड़ो दलितों को भी आत्मविश्वास और साहस मिलेगा जो अपने रोजमर्रा के जीवन में किसी न किसी प्रकार के भेद-भाव का शिकार होते हैं. आखिर प्रतिनिधित्व देने का मूल विचार और भाव ही यही है कि जब समाज के हाशिये में पड़े लोग अपने समुदाय के किसी व्यक्ति को सफल होते हुए देखते हैं तो उनको ‘सिस्टम’ पर विश्वास होने लगता है. उनको यह एहसास होता है के उनका हित माओवादी-नक्सलवादीयों की तरह ‘सिस्टम’ को ख़त्म करने में नहीं, बल्कि उसी ‘सिस्टम’ में घुस कर उसको अंदर से सुधारने में है. यह लोकतंत्र को हिंसा से बचाने का सबसे कारगर हथियार भी है. वरना एक बार समुदायों का लोकतान्त्रिक प्रणाली से भरोसा उठ गया तो वो हथियार उठाने लग जाएंगे.

श्री कोविंद को यह भी चाहिए के राष्ट्रपति बनने के बाद मीडिया में अपने आप को निष्पक्ष साबित करने के लिए न तो वो सरकार का अंध-विरोध करें और न ही किसी पार्टी-विशेष का होने की वजह से उस पार्टी के हर गलत/सही काम को स्वीकृति दे दें. बीते कई सालों से समाज में बढ़ रही असमानता, दूरी, नैतिक-पतन आदि को कम करना उनके लिए सबसे बड़ा काम होगा. अपने आचरण से उनको जनता और सरकारी-व्यवस्था/तंत्र के प्रति विश्वास-बहाली की प्रक्रिया को और बल देना पड़ेगा और मुझे ऐसा यकीन है के रायसीना हिल्स में बैठ कर वो अपने पूर्ववर्तीयों की भांति एक नया इतिहास लिखने में सक्षम हैं.  

(लेखक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में एम.फिल. के रिसर्च स्कॉलर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)



First Published: Monday, June 19, 2017 - 17:02
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