पीएम मोदी की ‘डी हाइफनेशन’ नीति दर्शाता फिलिस्तीन दौरा

सबसे अधिक चर्चा मोदी के फिलिस्तीन दौरे की रही, जिसको भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बड़े गौर से देखा गया. उनका फिलिस्तीन दौरा ऐसे समय में हुआ जब भारत का सबंध फिलिस्तीन के सबसे बड़े विरोधी माने जाने वाले इजराइल के साथ सबसे मजबूत स्तर पर है और एक तरह से अपने ‘स्वर्णिम युग’ में भी चल रहा है.

पीएम मोदी की ‘डी हाइफनेशन’ नीति दर्शाता फिलिस्तीन दौरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम एशिया के अपने तीन देशों के दौरे पर हैं. पश्चिम एशिया भारत के लिए सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है और वहां पर हुई हर छोटी-बड़ी घटना का सीधा प्रभाव भारत पर पड़ता है. यह क्षेत्र हमेशा से ही एक अस्थिर क्षेत्र भी रहा है जहा पर खूनी संघर्ष, अस्थिर सरकार और व्यापक तौर पर अराजकता देखने को मिली है. पीएम मोदी पहले जॉर्डन गए, उसके बाद वे फिलिस्तीन दौरे पर गए. सबसे अधिक चर्चा मोदी के फिलिस्तीन दौरे की रही, जिसको भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बड़े गौर से देखा गया. उनका फिलिस्तीन दौरा ऐसे समय में हुआ जब भारत का सबंध फिलिस्तीन के सबसे बड़े विरोधी माने जाने वाले इजराइल के साथ सबसे मजबूत स्तर पर है और एक तरह से अपने ‘स्वर्णिम युग’ में भी चल रहा है. पिछले ही साल भारत-इजराइल कूटनीतिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ को मनाने के लिए मोदी इजराइल यात्रा पर गए थे, जो किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा की गई पहली इजराइल यात्रा थी. फिर उसके बाद इस साल इजराइली प्रधानमंत्री नेतनयाह्यु भी भारत आए थे जिसमें कई समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए जिससे दोनों देशों के रिश्ते और गहरे हुए. ऐसे में सवाल उठने लगे थे कि क्या मोदी के नेतृत्व में भारत ने फिलिस्तीन के प्रति अपने पारंपरिक रवैये और प्रतिबद्धता को अपने नए दोस्त इजराइल के लिए छोड़ दिया है, जिसकी नींव देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने रखी थी.

डी हाइफनेशन नीति
देखा जाए तो इसी दिशा में प्रधानमंत्री मोदी की विदेश-नीति की सबसे बड़ी सफलता है कि उन्होंने इजराइल के साथ भारत की नई मित्रता को फिलिस्तीन के साथ भारत के एतिहासिक संबंधों से अलग कर के राष्ट्रहित और आदर्शवाद के बीच एक संतुलन स्थापित किया है जिसके चलते भारत, इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ मधुर संबंध रख सकता है. भारत द्वारा इजरायल और फिलिस्तीन को लेकर अपनाई गई इस नई नीति को कूटनीतिक जानकार ‘डी हाइफनेशन (de-hyphenation)’ नीति का नाम देते हैं जिसकी मांग लंबे समय से कई बुद्धिजीवियों द्वारा की जा रही थी.

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इस नीति ने भारत का कद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है क्योंकि अब सभी देश यह समझने लगे हैं कि व्यावहारिक-नीति अपनाने वाला भारत पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष-समाप्ति के लिए मध्यस्ता करने में सक्षम है. भारत के लिए दोनों देशों की अलग महत्ता है इसीलिए इजराइल के साथ संबंध रखने पर भारत के लिए कोई भी शर्म की बात नहीं होनी चाहिए न ही इसको फिलिस्तीनी-संबंध या फिलीस्तीन-संबंध के चश्मे से देखा जाना चाहिए. इजराइल एक ओर जहां भारत के लिए हथियारों और अन्य सुरक्षा संबंधी विषयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है वहीं फिलिस्तीन के समर्थन में खड़े होना भारत की स्वायत्ता, विरोधी-औपनिवेशिक, परस्पर समन्वय और विश्व-शांति की विचारधारा को दर्शाता है, जो उसकी विदेश-नीति के मूल आदर्श भी हैं. 

मोदी के इस दौरे के पहले भी संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प के इजराइल स्थित अपने तेल अवीव के दूतावास को विवादित जेरूसलम में स्थापित करने के निर्णय पर भारत ने इजराइल के खिलाफ वोट दिया था. हालांकि ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि इजराइल से अपनी नई मित्रता की खातिर भारत इस मुद्दे पर वोट ही नहीं डालेगा, लेकिन भारत ने इस मत के समर्थन में वोट डाल कर विश्व समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की कि भारत ने फिलिस्तीन को लेकर अभी भी अपनी विदेश-नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया है और आज भी वो ‘दो-राज्य समाधान’ (टू-स्टेट सलूशन) में विश्वास रखता है. इसके तहत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों ही संप्रभु राष्ट्र-राज्य के रूप में अस्तित्व में आकर शांति से रह सकते हैं.

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वैसे फिलिस्तीन जाने वाले भी मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं. जहां पर वो फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मिले और यासिर अराफात म्यूजियम जाकर दिवंगत नेता को श्रद्धांजलि दी. दोनों नेताओं के बीच ये चौथी मुलाकात थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'फिलिस्तीन इंस्टिट्यूट ऑफ डिप्लोमेसी' का उद्घाटन भी किया जिसे ₹ 28.64 करोड़ की भारतीय मदद से बनाया गया है. इसके पहले अब्बास पिछले साल भारत आए थे जिस दौरान दोनों देशों के बीच स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी और कृषि आदि क्षेत्रों में सहयोग समझौते हुए थे. 

फिलिस्तीन में भारत का योगदान तीन तरफा रहा है और मोदी सरकार ने न सिर्फ इसको जारी रखा है, बल्कि इसमें बढ़ोत्तरी भी की है. पहला, राजनीतिक तौर पर, दूसरा वहां आधारिक संरचना और कौशल विकास में और तीसरा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जहां पर भारत फिलिस्तीन का सहयोग करता रहा है.

तत्कालीन समय में भारत ने फिलिस्तीन के प्रति अपने समर्थन की प्रतिबद्धता को दोहरा के तीन पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास किया है. पहला, ऐसा करके भारत ने उन विकासशील देशों को अपने पाले में लाने की कोशिश की है, जिनके लिए फिलिस्तीनी-संघर्ष आज भी एक ‘तृतीय विश्व एकजुटता’ का मुद्दा है, और जिनकी आवश्यकता भारत को संयुक्त राष्ट्र में सुधारों और स्थाई सदस्यता के लिए सबसे अधिक है. इसके अलावा भारत अगर पूरी तरह से इजरायल के समर्थन में नजर आता है तो इससे चीन को अरब देशों में भारत की छवि धूमिल करने का अवसर मिल सकता है, जो घोर इजराइल विरोधी हैं. 

वहीं पाकिस्तान भी भारत के फिलिस्तीन के साथ बदलते हुए संबंधों को भारत को ‘मुस्लिम-विरोधी’ देश दिखाने के लिए कर सकता है. वैसे भी हमेशा से पाकिस्तान का यह प्रयास रहा है कि वो कश्मीर मुद्दे की तुलना गाजा-पट्टी से करवा के उसे भी ‘स्वतंत्र राष्ट्र के लिए संघर्ष’ और ‘सेना द्वारा मुसलमानों के ऊपर हो रहे अत्याचार’ के रूप में प्रस्तुत करे. इजराइल और फिलिस्तीन सिक्के के दो पहलु नहीं है और दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी दोनों देशों से स्वतंत्र संबंध रख सकता है. अपनी तटस्थता, डी हाइफनेशन नीति, बढ़ी हुई आर्थिक, सामरिक, सैन्य-शक्ति और इजराइल में अपनी साख/गुडविल के चलते फिलिस्तीन भी भारत से बड़ा किरदार निभाने की मांग कर रहा है ताकि अमरीका, यूरोप के अलावा भारत भी इजराइल-फिलस्तीन के बीच मध्यस्ता करवाए और शांति स्थापित हो सके. देखना होगा कि क्या भारत इस नए दायित्व के लिए तैयार होगा?

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं)

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