Opinion : 2019 के मोदी को है 2014 वाले मोदी की ज़रूरत...!

एक के बाद एक देश में हो रही अलग-अलग घटनाओं ने BJP को कहीं न कहीं बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है और अपनी नीतियों और कार्यशैली पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया है.

Opinion : 2019 के मोदी को है 2014 वाले मोदी की ज़रूरत...!

2019 के लोकसभा चुनावों में अब लगभग एक साल का ही समय रह गया है. ऐसे में देश की राजनीति में नए नए समीकरण बनने लगे है. वैसे तो देश का वास्तविक चुनावी मूड चुनावों के छह महीने पहले ही समझ में आता है, लेकिन उसकी झलकियां एक साल पहले ही दिखने लगती हैं. ऐसे में सत्ताधारी दल और विपक्ष का एक साल का कार्यकाल उसके बीते चार सालों के कार्यकाल पर भारी पड़ता है. यही आने वाले चुनावों में निर्णायक साबित होता है. उस लिहाज़ से सत्ताधारी भाजपा के लिए मौजूदा राजनीतिक परिस्तिथियां बहुत अनुकूल नहीं नज़र आ रही हैं. ये प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के लिए चिंता का सबब बन सकती हैं.

दरअसल एक के बाद एक घटनाओं ने पार्टी को कहीं न कहीं बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है और अपनी नीतियों और कार्यशैली पर पुनः विचार करने पर मजबूर कर दिया है. कुछ समय पहले उपचुनावों में मिली हार, 2 अप्रैल को भारत बंद का व्यापक असर और फिर पार्टी के भीतर से दलित सांसदों द्वारा उठाए गए सवालों ने भाजपा के 2019 के ‘व्यापक विजय’ के एजेंडे पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि पार्टी का भविष्य अधर में है और वह कोई कमाल नहीं कर पाएगी.

प्रधानमंत्री मोदी आज भी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और विपक्ष का कोई भी नेता उनकी लोकप्रियता के आस-पास भी नहीं खड़ा होता है. यह बात समय-समय पर विभिन्न सर्वे में सामने आती है. जनता में आज भी उनकी छवि एक ऐसे ईमानदार, कर्मठ और मज़बूत नेता के रूप स्थापित है जो अपने निजी लाभ के लिए कोई काम नहीं करता है. लेकिन 2014 की तरह उनकी छवि और लोकप्रियता के दम पर 2019 में भी भाजपा सरकार बना लेगी ऐसी संभावनाएं कम ही नज़र आती हैं. ऐसे में 2019 का किला फतह करने के लिए मोदी को अपने 2014 वाले रूप में आना होगा.

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2014 वाले मोदी...
2011 की बात है. 2G घोटाले ने देशभर में तत्कालीन कांग्रेस सरकार की किरकिरी करा दी थी. रही-सही कसर सरकार द्वारा स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे आंदोलन को गलत तरीक़े से संभालने और उसकी नीति-पक्षाघात (policy-paralysis) ने पूरी कर दी थी. जनता में आक्रोश था लेकिन विपक्ष में बैठी भाजपा भी ज़मीनी नेता के अभाव में उस आक्रोश को भुना नहीं पा रही थी. उसका दिल्ली-केंद्रित नेतृत्व कांग्रेस के मुक़ाबले न तो साफ़-सुथरा विकल्प दे पा रहा था, न ही कोई नयी पथ-कथा (narrative). ऐसे में दिल्ली से कई किलोमीटर दूर गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी अपने हिंदुत्व और विकास के रथ पर सवार होकर दिल्ली की ओर देख रहे थे.

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पिछड़ी जाति से आने के कारण और 2002 के बाद से अपने व्यक्तित्व में आमूलचूल बदलाव लाने के कारण नरेंद्र मोदी के नर्म-समावेशी-हिंदुत्व (softcore inclusive hindutva) का सन्देश गुजरात में हिंदू समाज के उन समुदायों को भी प्रभावित कर गया जो अब तक हिंदुत्व को ‘ब्राह्मणवाद’ और ‘मनुवाद’ की दृष्टि से देखते थे. वहीं उनके विकास का संदेश समाज के उन तबकों को भी भाजपा की तरफ़ खींच ले गया, जो ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और हिंदुत्व से तो असहज महसूस करते थे, लेकिन जिनको एक साफ़-सुथरी और विकास करने वाली सरकार चाहिए थी. ऐसे में जनता और कार्यकर्ताओं के दबाव में पार्टी को उनको प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करना पड़ा. अपनी इन्ही संदेशों को लेकर उन्होंने पूरे देश में भाजपा का प्रचार किया और गठबंधन में नए दलों को भी जोड़ा. इसका परिणाम हुआ कि तीस साल बाद देश में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और वो अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम बनी.

लेकिन आज उनके यही संदेश फीके पड़ते जा रहे हैं. दरअसल जनता में मोदी की छवि तो अब भी साफ़ है लेकिन पहले जैसी बात नहीं है. जिस नर्म समावेशी हिंदुत्व को लेकर वो चले थे कहीं न कहीं आज वो टूटता दिखाई दे रहा है. पिछड़ी जातियों एवं दलित समुदायों में पार्टी का प्रभाव कम होता जा रहा है जिसका नमूना उत्तरप्रदेश के उपचुनावों और 2 अप्रैल के भारत-बंद में देखने को मिला. ऐसे में मोदी को फिर से यह विश्वास दिलाना पड़ेगा कि पार्टी ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे को लेकर प्रतिबद्ध है. इसके लिए सबसे पहले तो वो भाजपाशाषित राज्यों को यह सख्त निर्देश दें कि दलितों पर हमला करनेवालों के ऊपर सख्ती से कार्रवाई हो और इसका संज्ञान सीधे राज्य का गृहमंत्री या स्वयं मुख्यमंत्री लें.

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गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वाले फर्जी गोरक्षकों के ऊपर भी नकेल कसी जाए जैसा कि मोदी स्वयं पहले भी कह चुके हैं. राष्ट्रीय स्तर से पार्टी को चाहिए कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने के प्रयासों को तेज़ करे और उसका भरपूर प्रचार किया जाए.

लगातार हो रहे घोटालों की वजह से जनता में कांग्रेस के प्रति रोष था. उसको आशा थी कि मोदी सत्ता में आते ही आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे. लेकिन चार साल में जनता को कोई बड़ी कार्रवाई नहीं देखने को मिली. 2G घोटालों में भी जिस तरह से मुख्य आरोपी पूर्व मंत्री ए. राजा को ज़मानत मिल गई उससे जनता में गलत संदेश गया है.

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पीएम मोदी को चाहिए कि वो भ्रष्टाचार के मामलों में आरोपियों के खिलाफ उदाहरणनात्मक कदम उठाएं फिर चाहे उनके ऊपर विपक्ष एवं मीडिया के द्वारा बदले की भावना से राजनीति करने का आरोप ही क्यों न लगाया जाए. बैंक का पैसा लेकर भागने वालों को भारत लाकर उनको सज़ा दिलवाने से सरकार की छवि अपने चुनावी वादों को पूरा करने वाली बनेगी. गंगा की सफाई को सरकार को अपने मुख्य एजेंडे में सबसे ऊपर लाना होगा. इससे न केवल हिंदुत्व का विषय प्रभावित होता है बल्कि उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल आदि राज्यों में सरकार के प्रति विश्वास बढ़ेगा जहां पर गंगा धार्मिक-आस्था के अलावा आर्थिक-उत्थान का विषय भी है.

आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट-अप इंडिया जैसे महत्वाकांक्षी योजनाओं का ज़मीनी स्तर पर आकलन करना पड़ेगा क्योंकि अपनी अच्छी मंशा और दृष्टिकोण के बावजूद नौकरशाही की कार्यशैली की भेंट चढ़ने के कारण यह ज्यादा सफल नहीं हो पा रही हैं.

पीएम मोदी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी जनता से सीधे जुड़ने की शैली है. वो जनता से जुड़कर बिना किसी मीडिया के संवाद करने में माहिर हैं. ऐसे में उनको चाहिए कि वो यह समझें कि जनता उनको लुटियन्स दिल्ली (Lutyens' Delhi) का हिस्सा बनते नहीं देखना चाहती जो मीडिया और नौकरशाही के चश्मे से ही देश को देखता है. जनता उनको 2014 वाले मोदी के रूप में देखना चाहती है जो दिल्ली की गद्दी में बैठकर भी बिहार, तमिलनाडु, उड़ीसा और अरुणाचल प्रदेश के ग्रामीण, दलित, आदिवासी और किसानों की भावनाओं को समझ सके और उनके सपनों को पूरा कर सके. 2019 के मोदी को वास्तव में अब 2014 वाले मोदी की आवश्यकता है...

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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