राहुल गांधी की ताज़पोशी- वंशवाद से लोकतंत्र को किस तरह से है खतरा!

सोनिया गांधी कांग्रेस की 19 सालों से अध्यक्ष रही हैं. यह पद उन्हें गांधी-नेहरू परिवार की विरासत की वजह से ही मिला. कांग्रेसी वंशवाद के इसी दौर में 8 अध्यक्षों के माध्यम से भाजपा देश की रूलिंग पार्टी बन गई.

Virag Gupta विराग गुप्ता | Updated: Dec 5, 2017, 12:19 PM IST
राहुल गांधी की ताज़पोशी- वंशवाद से लोकतंत्र को किस तरह से है खतरा!

राहुल गांधी ने अमेरिका में बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में स्टूडेंट्स से बातचीत करते हुए कहा था कि उन्हें कोसे जाने की बजाय, पूरे मुल्क में परिवारवाद के सिस्टम को देखना चाहिए. दूसरे दलों में आंतरिक लोकतंत्र के खात्मे और रजवाड़ों के प्रभाव की दुहाई देकर वंशवाद को सही बताने की कोशिश कांग्रेस और देश के लोकतंत्र के लिए नुकसानदायक है. सवाल यह है कि वंशवाद से कांग्रेस का ताज़ हासिल करने वाले नेता मौका मिलने पर मुल्क को कैसे बदल पाएंगे?

वंशवाद से मेरिट की एंट्री पॉइंट का दरवाज़ा बंद
सोनिया गांधी कांग्रेस की 19 सालों से अध्यक्ष हैं. यह पद उन्हें गांधी-नेहरू परिवार की विरासत की वजह से ही मिला. कांग्रेसी वंशवाद के इसी दौर में 8 अध्यक्षों के माध्यम से भाजपा देश की रूलिंग पार्टी बन गई. लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारों पर अंकुश के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरूरी है. कांग्रेस में कई बेहतरीन नेताओं की बजाय राहुल गांधी की ताज़पोशी से कांग्रेसी वंशवाद पर देशव्यापी हमले हो रहे हैं. सवाल यह है कि कमजोर कांग्रेस और विपक्ष देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कैसे शुभकारी हो सकता है?
    
वंशवाद की राजनीति और सत्ता की मंडी
राजनीति नहीं करने का स्वांग करने वाले सभी नेता राजनीति में येन केन प्रकारेण सफल होना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें पार्टी का वह पिरामिड चाहिए होता है जिसके नाम से चुनावी वैतरणी पार हो सके. अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के कालिखो पुल के सुसाइड नोट मे कैद यह सच्चाई अब जांच की स्याह फाइलों में खो गई है. आंध्रप्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री के पुत्र जगन मोहन रेड्डी जैसे कई धुरंधर सत्ता की पुरानी मलाई से अपनी राजनीति चमका रहे हैं, जिसे परिवारवाद को जनसमर्थन का नाम दे दिया जाता है. लोकतंत्र में सत्ता की लूट के तंत्र के हिस्सेदार ही चुनावी राजनीति में संसाधन झोंक सकते हैं, तो फिर वंशवाद की विषबेल क्यों न पनपे?

वंशवाद से संसाधनों की खुराक
ज्यादा से ज्यादा उम्मीदवारों को चुनाव जिता करके सभी राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने की जद्दोजहद में रहते हैं. कांग्रेस के पास देशभर में अभी भी 800 से ज्यादा विधायक हैं. लोकसभा के चुनाव जीतने का औसतन खर्च 25 करोड़ प्रति सीट हो तो सभी 543 सीटों में चुनाव लड़ने और बहुमत से केंद्र में सरकार बनाने के लिए किसी भी पार्टी को लगभग 10 हज़ार करोड़ का फंड चाहिए. विधायकों की कुल 4120 सीट जिन्हें जीतने के लिए औसतन 5 करोड़ की रकम चाहिए. तो राज्यों में सरकार बनाने के लिए पार्टियों को 20 हज़ार करोड़ के फंड का जुगाड़ करने में वंशवाद मददगार होता है.
 
सत्ता से पोषित पांच माफिया- माइनिंग, जंगल, ड्रग्स, टेंडर और ट्रांसफर
30 से 40 हज़ार करोड़ की लागत से सरकार बनाने वाली पार्टियों को चुनाव में किए गए निवेश पर रिटर्न के लिए माफियाओं की गोद में बैठना मजबूरी हो जाता है. प्रधानमंत्री मोदी ने हिमाचल चुनाव के दौरान माइनिंग, जंगल, ड्रग्स, टेंडर और ट्रांसफर जैसे 5 माफियाओं का जिक्र किया था, जिससे अब कोई भी सरकार अछूती नहीं है. किसी भी पार्टी की सरकार बने परंतु सत्ता के पिरामिड से ये माफिया कभी नहीं हिलते.

वंशवाद, राजतंत्र और सामंतवाद की विषबेल
वंशवाद के साथ देश में राजतंत्र को भी चुनावी स्वीकृति मिल जाती है. राजाओं और जमीदारों ने अंग्रेजों के जमाने में संसाधनों में जो कब्ज़ा जमाया, उसका अभी भी राजनीति में रिटर्न मिल रहा है. सामंती व्यवस्था में पार्टियों द्वारा फेंके गए सब्सिडी और आरक्षण जैसे कार्डों का दमित जनता जल्द शिकार हो जाती है, जिसे जनादेश कहना क्या लोकतंत्र का अपमान नहीं है?

(लेखक संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)