लड़कों से होने वाले बलात्कार को छिपाना सामाजिक नियम है!

भारत में केवल लड़कियां ही असुरक्षा के जाल में नहीं फंसी हैं. लड़के भी बलात्कार और यौन शोषण के शिकार होते हैं. इस विषय को पेश करने का मकसद यह साबित करना कतई नहीं है कि समाज में लड़के असुरक्षित है और लड़कियां सुरक्षित हैं!

लड़कों से होने वाले बलात्कार को छिपाना सामाजिक नियम है!

कुछ बातें हम भूल जाते हैं और कुछ बातें हम याद नहीं रखना चाहते हैं, कुछ बातें याद रहती हैं, पर हम उन्हें स्वीकार नहीं करना चाहते हैं; ये कोई दार्शनिक निष्कर्ष नहीं हैं. ये हमारे सामाजिक व्यवहार की वास्तविकताएं हैं. उत्तर भारत से आकर मुंबई में काम करने वाले प्रवासी मजदूर परिवार के 13 साल के लड़के ने चूहे मारने वाला जहर खा लिया. मुंबई के शींव अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई. आठवीं कक्षा के इस लड़के के साथ किसी पुरुष ने “बलात्कार” किया था. चिकित्सा जांच से यह साबित हुआ कि उसके साथ जबरिया लैंगिक प्रवेशन किया गया था.  इसके बारे में पुलिस जांच अधिकारी कहते हैं कि यह प्रकरण सामने ही नहीं आता, यदि लड़के ने जहर नहीं खाया होता. उसके पिता भी यही कहते हैं कि लड़का कुछ दिनों से बहुत विचलित था. हम समझ ही नहीं पाये, इसीलिए उसने आत्महत्या की. हमें बदलना होगा ताकि बच्चे अपने साथ होने वाले आघात को कह सकें. 

सभी लोग बच्चों के प्यार करते हैं; इसलिए वे बच्चों को अपनी गोद में बिठाते हैं, उन्हें सहलाते हैं, उन्हें चूमते हैं. कई लोग बच्चों के यौनांगों को भी छूते हैं और उनकी छाती को स्पर्श करते हैं. इसे कौन बुरा मानता है? सच तो यह है कि इस व्यवहार में “मंशा” सबसे मूल चरित्र है. जब कोई “यौन व्यवहार” की मंशा से इस तरह स्पर्श करता है, तब वह व्यवहार यौन शोषण के व्यवहार की श्रेणी में आता है. हमारे समाज में इस मंशा को समझने का कौशल सिखाया ही नहीं गया है. अतः स्नेह का आवरण ओढ़ कर अक्सर यौन शोषण होता है और हमारी आँखें उसे देख नहीं पाती; उस मंशा को बच्चे महसूस कर पाते हैं. पर बच्चों की बात हम महसूस नहीं कर पाते!    

भारत में केवल लड़कियां ही असुरक्षा के जाल में नहीं फंसी हैं. लड़के भी बलात्कार और यौन शोषण के शिकार होते हैं. इस विषय को पेश करने का मकसद यह साबित करना कतई नहीं है कि समाज में लड़के असुरक्षित है और लड़कियां सुरक्षित हैं! हमारा समाज इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि लड़के और लड़कियां, दोनों के साथ बलात्कार हो रहे हैं; पर लड़कों के साथ होने वाले बलात्कार देखे और महसूस नहीं किये जा रहे है. अहम् बिंदु यह है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा में जिन छः परिस्थितियों का उल्लेख है, उनके मुताबिक बलात्कार केवल “स्त्री” के साथ ही होता है; यानी पुरुष के साथ बलात्कार होता है, यह सच हमारी न्यायिक व्यवस्था की समझ में है ही नहीं! इस धारा में दर्ज है कि जो पुरुष निम्न परिस्थितियों में किसी स्त्री के साथ मैथुन करता है, वह पुरुष “बलात्संग” करता है.

पहलाः उस स्त्री की इच्छा के विरुद्ध.
दूसरा : उस स्त्री की सम्मति के बिना.
तीसरा : उस स्त्री की सम्मति से, जबकि उसकी सम्मति, उसे या ऐसे किसी व्यक्ति को, जिससे वह हितबद्ध है, मृत्यु या उपहति के भय में डालकर अभिप्राप्त की गई है.
चौथा : जब किसी स्त्री को विवाह का वायदा किया जाता है और इस वायदे के आधार पर विश्वास में लेकर सहमति ली जाती है.
पांचवा : विकृतिचित्त या नशे या अस्वास्थ्यकर पदार्थ दे कर किया जाता है, या ऐसी अवस्था में कि वह कृत्य की प्रकृति और परिणाम को समझने में असमर्थ हो; छठा : जब स्त्री सोलह वर्ष से कम आयु की है.

इस धारा का एक अर्थ यह भी है कि पुरुष “बलात्संग” से पीड़ित नहीं हो सकता है. इसके साथ ही धारा 377 को अनुसार जो कोई पुरुष, स्त्री या जीव-जंतु के साथ प्रकृति की अवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इंद्रीय भोग करेगा, उसे आजीवन कारवास या दस वर्ष तक की अवधि के कारवास से दण्डित किया जाएगा. आमतौर पर लड़कों के साथ किये जाने वाले यौनिक दुराचार को इसी श्रेणी में रखा गया है. भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के मुताबिक स्त्री की लज्जा भंग करने के मकसद से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करने की स्थिति में दो साल की सजा हो सकती है. यह धारा भी संकेत देती है कि “लड़कों” की लज्जा भंग नहीं होती है.  

किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अंतर्गत धारा 75 में बच्चों के प्रति क्रूरता को अपराध मान गया है. यह धारा कहती है कि ऐसा कोई भी व्यक्ति ऐसा कृत्य, हमला, परित्याग, उत्पीडन या उपेक्षा करेगा, जिससे किसी भी बच्चे को अनावश्यक मानसिक और शारीरिक कष्ट होने की संभावना हो, उसे तीन साल के कारावास या एक लाख रूपए के जुर्माने या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा. यह भी एक सच्चाई है कि हमारी व्यापक न्याय व्यवस्था इस क़ानून के प्रावधानों की जरूरत और गंभीरता को महसूस कर पाने में अक्षम रही है.  

अब यह उल्लेखनीय है कि यौन (लैंगिक) अपराधों से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम, 2012 (पोक्सो) में बच्चे की परिभाषा के तहत अठारह वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है! यानी इस क़ानून में लड़के और लड़कियों को यौन शोषण और उत्पीडन से पीड़ित माना जा सकता है. इस क़ानून की धारा तीन के अनुसार “जब कोई व्यक्ति अपना लिंग किसी भी सीमा तक किसी बच्चे की योनी, मुंह, मूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश करता है या बच्चे से या उसके साथ किसी अन्य व्यक्ति से ऐसा करवाता है या लिंग के अलावा किसी अन्य अंग से भी ऐसा करता या करवाता है और बच्चे के लिंग, योनी या मूत्रमार्ग पर अपना मुंह लगता है या ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा बच्चे से ऐसा करवाता है; इसे लैंगिक प्रवेशन हमला माना जाएगा”. इस परिभाषा को पढना और स्वीकार करना ही समाज के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण काम है. 

पोक्सो क़ानून के आने से पहले तक कानूनी व्यवस्था में यह पक्ष इतनी स्पष्टता के साथ परिभाषित नहीं था. हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पोक्सो क़ानून आने के बाद भी लड़कों के साथ बलात्कार जैसे गंभीर पहलू पर समाज और क़ानून व्यवस्था में सक्रिय कार्यवाही का अभाव है. वास्तविकता यह है कि हमें यह स्वीकार करने में बहुत दिक्कत हो रही कि यौनिकता के सन्दर्भ में समाज इस हद तक कुंठित और अपराधी है और हर दूसरा लड़का यौन शोषण का शिकार हो रहा है. परिवार, समुदाय और सरकार की चुप्पी ने पहले लड़कों को “पीड़ित” बनाया और फिर यही बच्चे मनौवैज्ञानिक-भावनात्मक उपचार और परामर्श के अभाव में आगे चल कर अपराधी और बलात्कारी बनने लगे. जब संकट बढ़ गया तब, सरकार और समाज दोनों मिलकर एक स्वर में इन्हें फांसी देने की मांग करने लगे. ऐसा क्यों है कि इस विषय पर समाज और राज्य, दोनों एक नजरिया रख रहे हैं; ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों को सच पता है कि वास्तव में अपराधी ये बच्चे या वयस्क अपराधी नहीं है, अपराधी तो पितृसत्तात्मक समाज और राज्य है, जिसने यौनिक अपराधों की पटकथा लिखी है!  

मौजूदा धारणा के अनुसार बलात्कार की घटना में पुरुष हमेशा “आरोपी” होता है, “पीड़ित” नहीं! हमें यह समझने जरूरत है कि बलात्कार में पुरुष “पीड़ित” होता है!  इंडियन जर्नल आफ सायकेट्री में छपे एक आलेख में एक उद्धरण है. नौ साल के एक लड़के को बाल मनोवैज्ञानिक इकाई में लाया गया. वह बच्चा स्कूल जाने को तैयार नहीं था, पढ़ाई में तेज़ी से पिछड़ रहा था, उसकी नींद बिगड गई थी, साफ़ दिखाई देने वाली सामाजिक व्यग्रता के चिन्ह थे, और वह एकाकी होने लगा था.

किराने की दुकान चलाने वाले पिता ने बताया कि “पड़ोस के कुछ बड़े लड़के उसे दुकान से पैसे चुराकर लाने के लिए बहुत तंग करते थे. जांच में बच्चे के 14 वर्षीय भाई ने बताया कि उसका नौ साल का भाई ‘गंदे काम” कर रहा था. उसने बताया कि मैंने मोबाइल में एक वीडियो देखा है, जिसमें एक लड़का, जिसकी उम्र 18 साल से ज्यादा होगी, नौ साल के भाई से मुखमैथुन करवा रहा है. यह वीडियो 12 साल के एक अन्य लड़के के द्वारा बनाया गया था. मैंने उस वीडियो को हटा दिया. यह घटना तीन महीने से ज्यादा पुरानी थी. इस वीडियो के आधार पर लड़के को डराया-धमकाया का रहा था और पैसे लाने के लिए दबाव बनाया जा रहा था. बच्चे के पिता पोक्सो क़ानून के तहत कार्यवाही चाहते थे, किन्तु चूंकि घटना 3 महीने पुरानी थी, फोरेंसिक प्रमाण नहीं जुटाए जा सके और वीडियो मिटाया जा चुका था, इसलिए कानूनी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी. बच्चे के पिता केवल कानूनी कार्यवाही के इच्छुक थे, जिसके न होने पर उन्होंने बच्चे के मनौवैज्ञानिक उपचार में कोई रूचि नहीं दिखाई. उनका कहना था कि “न तो उसकी कौमार्य बनाए रखने वाली यौनिक झिल्ली फटी है, न ही वह गर्भवती होगा. उसे एक पुरुष की तरह आचरण करना चाहिए, न कि एक लड़की की तरह!”

इसी इकाई में 4 साल के एक लड़के को लाया गया. उसे बुखार था, गुदा में गहरे घाव थे. पिता के अनुसार उसके साथ स्कूल में बड़े लड़कों ने शौचालय में “दुराचार” किया था. वह बहुत गहरे आघात में था और परामर्शदाता के सवालों के जवाब बड़ी मुश्किल से केवल “हाँ या नहीं” में दे पा रहा था. उसके मामले में जांचकर्ताओं में संवेदनशीलता नहीं दिखाई, जिससे प्रमाण इकट्ठे नहीं किये जा सके. बच्चे ने स्कूल जाना बंद कर दिया, वह लड़कों से डरने लगा. केवल जानवर आकृति वाले खिलौनों से खेलता और रात भर जागता रहता. बार-बार वह डर जाता है. पिता कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, पर न्याय व्यवस्था के कठोर रवैये के चलते अवसाद में आ गए. पहले नौकरी छूटी और फिर उन्हें शहर छोड़ देना पड़ा. वे कहते हैं कि “स्कूल से लेकर पुलिस तक ने इस मामले को कमज़ोर किया, क्योंकि आघात लड़की ने नहीं, लड़के ने झेला था.” 

क्या यह कोई स्थापित सिद्धांत है कि हमारे साथ सबसे गंभीर अपराध वही करता है, जो हमसे या हम जिससे परिचित होते हैं, जिसे हम जानते हैं और जिस पर हम विश्वास करते हैं? कुल बलात्कार और बच्चों से बलात्कार के मामले तो कम से कम यह बता रहे हैं. वर्ष 2007 में भारत में बलात्कार के कुल 20737 मामले दर्ज हुए थे. इनमें से 19188 (93 प्रतिशत) मामलों में बलात्कार करने वाला व्यक्ति पीड़ित महिला या बच्चे का परिचित, रिशेत्दार या जानकार था. 

यह स्थिति लगातार बनी हुई है. एनसीआरबी (2016) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक देश में घटित हुए बलात्कार के 38947 अपराधों में 95 प्रतिशत मामलों (38947) में अपराध करने वाला व्यक्ति कोई परिचित और करीबी रिश्तेदार ही था. आज के समाज और मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी चुनौती है कि बच्चे और महिलायें किन पर और किस हद तक विश्वास कर सकती हैं? 

इकपेट इंटरनेशनल नामक संस्था द्वारा कराये गए अध्ययन की रिपोर्ट “ग्लोबल स्टडी आन सेक्सुअल एक्स्प्लाइटेशन आफ चिल्ड्रन (वर्ष 2016) बहुत गंभीर स्थिति का खुलासा करती है. यह बताती है कि दुनिया भर में लड़कों को लड़कियों के तुलना में कठोर और मज़बूत होने का अहसास करवाया जाता है. उन्हें घर के बाहर दुनिया से जूझने के लिए प्रेरित किया जाता है. धारणा है कि वे हर आघात सहन कर लेंगे. समाज के ये मानक लड़कों के ऊपर इतने हावी हो जाते हैं कि वे अपने साथ होने वाली लैंगिक शोषण को अभिव्यक्त भी नहीं कर पाते हैं, वे सोचते हैं कि कहीं उन्हें कमज़ोर न मान लिया जाए.

यह रिपोर्ट बताती है कि जब बच्चे किशोरावस्था में प्रवेश कर रहे होते हैं, तब उनमें कई शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक बदलाव होते हैं. तब उन्हें संबल, सहयोग, संवाद और दोस्ताना मार्गदर्शन की जरूरत होती है. यदि परिस्थितियां ऐसी हों, जब परिजनों और परिवार का सहयोग उन्हें नहीं मिले, तब वे अपने बराबर की उम्र वाले, कभी ज्यादा उम्र वाले या ऐसे प्रभावी लोगों के संपर्क में आते हैं, जो इन किशोरों की स्थिति का फायदा उठाकर उन्हें मंहगी वस्तुओं के शौक और नशे से जोड़ देते हैं. किशोरवय बच्चे इन मंहगे शौकों में सुकून, दोस्ती और आज़ादी ढूंढते हैं. यह आर्थिक रूप से बहुत खर्चीला काम होता है, तब इसे पूरा करने के लिए वे अपना यौनिक शोषण करवाने के लिए तैयार हो जाते हैं और शोषण के गहरे चक्र में फँस जाते हैं. इकपेट इंटरनेशनल के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि उपेक्षा, मंहगे शौकों में फंसे और पारिवारिक सहयोग के अभाव वाले बच्चे इंटरनेट के जरिये भी यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं. इससे जब उनकी जरूरतें पूरी होती रहती हैं, तो वे इस शोषण को “सामान्य मानकर स्वीकार” करने लगते हैं; और इस तरह यह शोषण एक ढांचागत रूप लेता जाता है.  हेंड्स आफ होप फाउन्डेशन ने वर्ष 2018 के शुरूआती महीनों में एक सर्वेक्षण किया. इसमें 160 पुरुष शामिल हुए. इनमें से 71 प्रतिशत पुरुषों ने स्वीकार किया कि उनके साथ यौन दुराचार हुआ है. हमें इस व्यवहार पर डाला हुआ पर्दा उठाना ही होगा!

अब अध्ययन बता रहे हैं कि जिन बच्चों, खास तौर पर लड़कों के साथ यौन शोषण-दुराचार हुआ है, वे आगे चल कर खुद सबसे ज्यादा बलात्कार को अंजाम दे रहे हैं. उनकी बात नहीं सुनी गई, उन्हें मनौवैज्ञानिक परामर्श सेवाएं नहीं मिली, उन्हें अपने अपराध बोध के साथ जीने के लिए अकेला छोड़ा दिया गया; तब स्वाभाविक है कि उनका स्वभाव और व्यवहार पर बचपन के यौन दुराचार का गहरा असर पड़ेगा. आज जबकि हम हर रोज 4 माह की बच्ची से लेकर 70 साल की बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ बलात्कार की ख़बरें पढ़ रहे हैं, तब हमें खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि ये बलात्कार करने वाले कौन हैं? इनमें यह प्रवर्ति विकसित कैसे हुई? लड़के हमेशा से बलात्कार के लिए आसान लक्ष्य रहे हैं, क्योंकि समाज मानता है कि उनसे बलात्कार हो ही नहीं सकता!

(लेखक विकास संवाद के निदेशक, शोधकर्ता और अशोका फेलो हैं.)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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