नर्मदा खुद भी क्या सोच रही होगी …? - भाग-1

मैं आपको बता दूं कि मैं मालवा की उपजाऊ धरती से होते हुए खलघाट में नर्मदा को पारकर निमाड़ में प्रवेश कर चुका हूं. यह इलाका किसी समय में हिंदुस्तान की द्रविड़ और आर्य सभ्यता का मिलन स्थल माना जाता था.

अंतिम अपडेट: Aug 11, 2017, 05:02 PM IST
नर्मदा खुद भी क्या सोच रही होगी …? - भाग-1
मध्यप्रदेश के बड़वानी में स्थित महात्मा गांधी का दूसरा 'राजघाट' पर भी डूब क्षेत्र में है, अब इसे शिफ्ट किया जा रहा है...

राकेश कुमार मालवीय

सात-आठ घंटे की सड़क यात्रा आपको थका देने वाली हो सकती है, लेकिन धरती के हरे रंग से श्रृंगार कर लेने के बाद यदि आप सफ़र में हों तो यकीन कीजिए आप पलकें नहीं झपकाते, भले ही रात देर से सोये और सुबह जल्दी जाग गए हों. गाड़ी की आरामदायक सीट भी झपकी लेने पर मजबूर नहीं कर सकती. शहर से निकलते ही गाड़ी का एयरकंडिशनर बंदकर खिड़कियों के चढ़े हुए शीशों को गिरा लेते हैं ताकि फुहारों से अतिरिक्त ठंडक प्राप्त कर चुकी हवा सीधे आपके शरीर पर पड़े और ऐसा आनंद मिले जिसे दुनिया की कोई मशीन ईजाद नहीं कर पाई है.
 
आप अपलक हरे रंगों के भिन्न-भिन्न शेड्स देखते हैं, आकाश के बादल इन्हें टक्कर देते दीखते हैं, मानो रंगों का कोई तराना ही छिड़ा हो. बीच में कुछ गांव हैं. सफेद रंग के कपड़ों को नील में डुबोकर पहनने वाले लोग, सबकी अपनी-अपनी मात्रा ताकि धरती के साथ अपने रंग भी बचे रहें. खेतों में मेहनत इतनी कि घुटने-घुटने हो आए कपास के पौधों की कतारों को आप गाड़ी चलते-चलते भी गिन सकते हैं, उन्हें इस छोर से उस छोर तक देख सकते हैं, बीच में कोई कचरा नहीं, धरती को प्रेम करें तो वह भी क्या तादात्‍म्‍य स्थापित करती है.

मैं आपको बता दूं कि मैं मालवा की उपजाऊ धरती से होते हुए खलघाट में नर्मदा को पारकर निमाड़ में प्रवेश कर चुका हूं. यह इलाका किसी समय में हिंदुस्तान की द्रविड़ और आर्य सभ्यता का मिलन स्थल माना जाता था. सांस्कृतिक रूप से बेहद समृद्ध. इसी इलाके के आसपास लाखों साल पहले मानव सभ्यता के विकसित होने के अवशेष पाए गए. ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में जब आपको हर कहीं सबकुछ एक जैसा दिखाई देने लगा हो, आप इस इलाके में आंखें खोलकर देखना चाहें तो अब भी कुछ पा सकते हैं.

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होटल के कमरे को ताजी हवा से भर देने के जतन से जब मैंने खिड़की खोली तो शाम लगभग हो ही चुकी थी. होटल के ठीक बगल और सामने नीम के हवा में लहराते पेड़ों पर बगुले अपने घोंसलों में दुबक चुके हैं. हवा की रफ्तार कुछ ज्यादा है, घोसले हवा में बहकते हैं, हवा की थिरकन से बगुले सावधान हैं, कुछ डालियों पर भी हैं, इसे मेरी मनोस्थिति भी मान सकते हैं, या संयोग भी या कुछ और, लेकिन इस यात्रा का मकसद जो कहीं अपनी जिंदगी, अपनी आजीविका और अपने रहने के अधिकार से जुड़ा है, वह मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों की ​जिंदगी में भी कितना महत्व रखता है.

हम केवल अपनी-अपनी दुनिया देखते हैं, इस दूसरी दुनिया के कई पक्षों पर सिवाय ​सेमिनारों के किया ही क्या है. यह दो चार-पक्षी हैं, अच्छा है कि इनकी सीमाएं खींचने की हिमाकत मनुष्य नहीं कर पाया है, वह अब भी आजाद हैं.

narmada river, sardar sarovar dam
बांध के डूब प्रभावित क्षेत्र में आ चुके लोगों के साथ ही सभी जीव-जंतु इस समय पशोपेश में हैं...

इन पक्षियों की तरह यहां के हजारों लोग भी इसी तरह अपने-अपने घरों में पशोपेश में बैठे हैं. उनका घर डूबेगा या बचेगा, उनकी खेती बचेगी या डूबेगी, उनका पुनर्वास कैसा होगा, सरकार तरह-तरह के हलफनामे कोर्ट में पेश कर चुकी है, जिनमें उसने कहा है कि सरदार सरोवर में पुनर्वास का काम पूरा हो चुका है, इसके बाद भी सरकार 900 करोड़ का अतिरिक्त पैकेज जारी कर अखबारों में विज्ञापन निकालती है. संख्या को लेकर रोज ही तरह-तरह की गफलत है, सत्य कहने लिखने वाले अखबारों में अलग-अलग जानकारियां हैं.

हम जहां रुके हैं, वहां से नर्मदा पुल महज दो किलोमीटर की दूरी पर है. यह जगह राजघाट कहलाती है. शाम की रिमझिम बारिश ने आसमान में नीला रंग घोल दिया है. खड़े—खड़े नर्मदा को बहता हुआ देख रहे हैं. नर्मदा जैसे बह नहीं रही, किसी अंतिम पड़ाव सी खुद का पल्लू समेट रही हो, वैसे ही जब कोई स्त्री लंबी-सी चुनरी को धो लेने के बाद समेटती है. कुछ ही दिनों बाद यहां सबकुछ पानी-पानी होने वाला है. इसी राजघाट पर सदियों पुराना राजघाट जलमग्न होने वाला है. राजघाट की सीढ़ियां उतरने के बाद शिव के मंदिर में लाइट टिमटिमा रही है.

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एक सेवक बड़े जतन से उसके अंदर पानी से पूरा मंदिर धो लेने के बाद पानी को उतार रहा है. शाम के अंधेरे में ही दो व्यक्ति अगरबत्ती से नर्मदा की आरती उतार रहे हैं. तीन और लोग किसी अनुष्ठान के बाद की सामग्री को सिराने उसी शाम में पहुंचते हैं. कदमों में जल्दबाजी है, अपना जो कुछ अच्छा-बुरा, सुख-दुख सब नर्मदा को अर्पित करके महज एक डुबकी लगाकर खुद का भार कम करने की ऐसी सहज सुविधा भला और कहां हो सकती है. नर्मदा जिंदगी के ऐसे हर रंग में समाई है, नर्मदा महज बहता पानी ही नहीं, जीवनरेखा है, उसका पानी अब ठहरने को है, इस अजीब सी शाम में नर्मदा खुद भी क्या सोच रही होगी.

narmada river, sardar sarovar dam
हम केवल अपनी-अपनी दुनिया देखते हैं, दूसरी दुनिया के कई पक्षों पर सिवाय ​सेमिनारों के किया ही क्या है.

सरदार सरोवर एक विशाल कल्पना है. एक सपना है. नर्मदा को खंड-खंड कर जगह-जगह बांध देने, नदी को विशालकाय तालाबों में बांध देने का दुस्साहस है. यह उन पैंतीस बड़े बांधों में सबसे ​बड़ा बांध है, जो नर्मदा के पानी को दूर-दूर तक पहुंचाने, बिजली का उत्पादन कर देश को तरक्की की रोशनी से भर देने का वायदा है.

नेहरू ने देश के बांधों को आधुनिक भारत के तीर्थ कहा था. नर्मदा का यह सबसे बड़ा आधुनिक तीर्थ है, जिसके खिलाफ पिछले बत्तीस सालों से एक लड़ाई लड़ी जा रही है. नेहरू के आधुनिक तीर्थ के सपने पर सबसे पहले गांधी की एक बार फिर बलि चढ़ाई जाने वाली है. इतिहास अपने को फिर खुद ही दोहरा रहा है. गांधी के स्वावलंबन की सोच पर विकास का प्रतिमान हावी है.

बड़वानी के इस राजघाट पर गांधी समाधि स्थित है. यह देश में इकलौता ऐसा स्थान है, जहां गांधी, कस्तूरबा और महादेव भाई की अस्थियां एक साथ समाधि में मौजूद हैं. यह समाधि स्थानीय गांधीवादी कार्यकर्ताओं की पहल पर बनाई गई थी. गांधी की ही इच्छानुसार देश में 12 नदियों के किनारे उनकी अस्थियों को रखा गया है. इस जगह को ही साक्षी मानकर नर्मदा के वाशिंदों ने सचमुच उनके अहिंसा के हथियार को गांधी के बाद भी प्रासंगिक मानकर दिखाया है. 32 साल की लंबी लड़ाई को गांधी के बाद अहिंसात्मक तरीक से यदि कहीं और लड़कर दिखाया हो तो बताइए.  जारी...

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)