स्वच्छ भारत अभियानः अब साफ-सुथरे होने लगे गांवों में घुसने के रास्ते

राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ भारत मिशन की उपलब्धि शानदार रही, लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है. ऐसे में केंद्र सरकार को बिहार जैसे राज्यों में इस दिशा में आ रही समस्याओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. 

स्वच्छ भारत अभियानः अब साफ-सुथरे होने लगे गांवों में घुसने के रास्ते

सातो अवंती बिहार के कैमूर जिले का एक प्रतिष्ठित गांव है. कभी वहां गांव में घुसने के रास्ते गंदे होते थे. शौचालय के अभाव में अधिकतर महिलाएं और बच्चे इन रास्तों पर शौच किया करते थे. न तो शौच करने वालों को यह पसंद था और न ही इस पर आने-जाने वालों को. फिर भी यह सब जारी रहा. कोई किसी को ऐसा करने से नहीं रोकता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है. गांव में घुसने के रास्ते साफ-सुथरे हो गए हैं. अब कोई प्रवेश मार्ग पर शौच के लिए नहीं बैठता. उन्हें अब यह साफ-सफाई अच्छा लगने लगा है. आखिर लोगों के व्यवहार में यह परिवर्तन कैसे आ गया? 

यह कहानी किसी एक गांव की नहीं है. बिहार और देश के कई गांवों की यह कहानी है. मोदी सरकार के स्वच्छ भारत अभियान ने ऐसे गांवों की तस्वीर बदल दी है. हालांकि इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि लोग शौच के लिए बाहर नहीं जाते. शहर में रहने वाले लोग गांवों के बारे में स्वच्छ भारत अभियान का मतलब यही लगाते होंगे कि वहां हर व्यक्ति घर में ही शौच करता होगा, लेकिन व्यावहारिक यथार्थ ऐसा नहीं है. शौचालय होने के बावजूद कुछ लोग शौच के लिए अब भी बाहर जाते हैं. कुछ पानी की समस्या बताते हैं, लेकिन असल बात है ग्रामीण जीवन-शैली. जिन्हें ग्रामीण परिस्थितियों का आभास होगा, उन्हें यह पता होगा कि खुली हवा में शौच के लिए जाना ग्रामीण जीवन-शैली का हिस्सा रहा है. पर अब लोगों की आदत में बदलाव आ रहा है. इस पर खुले में शौच मुक्त हरियाणा राज्य के महेंद्रगढ़ जिले के दुबलाना पंचायत के प्रधान धर्मपाल कलगानिया कहते हैं कि अब भी गिने-चुने लोग शौच के लिए बाहर जाते हैं, लेकिन सामाजिक दबाव और लोक-लाज के कारण धीरे-धीरे यह भी बंद हो जाएगा. 

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बहरहाल, शौचालय निर्माण धीरे-धीरे उस सवाल को खत्म करता जा रहा है, जहां मजबूरी में शौच के लिए बाहर जाना पड़ता था. जब 2 अक्टूबर, 2014 को इस अभियान की शुरुआत की गई थी, तब जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, झारखंड और ओडिशा में 30 प्रतिशत से कम शौचालय थे. हालांकि आज कोई राज्य इस श्रेणी में नहीं है, फिर भी बिहार और ओडिशा में शौचालय निर्माण की प्रगति धीमी है. यहां अभी 30-60 प्रतिशत घरों में ही शौचालय बनवाए जा चुके हैं, जबकि राजस्थान खुले में शौचमुक्त की श्रेणी में आ चुका है और जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारंखंड में 60 से 90 प्रतिशत तक शौचालय बनवाए जा चुके हैं. इस तरह मोदी सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के तहत अब तक पूरे देश में सात करोड़ से अधिक शौचालय बनवाये जा चुके हैं. अभियान की शुरुआत के समय केवल केरल ऐसा राज्य था, जो खुले में शौचमुक्त था, आज इस श्रेणी में 16 राज्य आ चुके हैं. करीब साढ़े छह लाख गांवों में से साढ़े तीन लाख से अधिक गांव खुले में शौचमुक्त हो चुके हैं. 

राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ भारत मिशन की उपलब्धि शानदार रही, लेकिन बिहार जैसे पिछड़े राज्यों में अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है. ऐसे में केंद्र सरकार को बिहार जैसे राज्यों में इस दिशा में आ रही समस्याओं पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इस पर बिहार के सातो अवंती गांव के मुखिया रणजीत सिंह उर्फ पिन्टू सिंह कहते हैं कि समस्याएं दो तरह की हैं- एक पैसे की और दूसरी जगह की. इस अभियान के तहत शौचालय बनवाने के बाद पैसा मिलता है. इसलिए जिनके पास पैसा है, वे शौचालय बनवा लेते हैं, लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है, वे इस दिशा में पहल नहीं कर पाते. दूसरी ओर अगर शौचालय बनवाने के पहले पैसे दे दिए जाएं, तो लोग अन्य कार्यों में खर्च कर सकते हैं. कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनके पास अगर पैसा है, तो जगह नहीं है. इस कारण कार्य में बहुत तेजी नहीं आ पा रही है, फिर भी शौचालय बन रहे हैं. लोगों का ध्यान इस ओर है. 

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दरअसल, स्वच्छ भारत अभियान ने ग्रामीणों की सोच को बदल दिया है. स्वच्छ भारत अभियान की अगर सबसे बड़ी उपलब्यि कोई है, तो वह स्वच्छता के प्रति गांवों में बढ़ती जागरुकता. ऐसे में इस बात से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता कि सरकार ने गांवों में कितने शौचालय बनवाए हैं. अगर समाज इसके प्रति सचेत है, तो वह अपनी व्यवस्था कर लेता है. बात-बात पर गंदगी की तरफ उनका ध्यान जाता है और उनमें से कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति ताने भी मारते हैं. पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रतिक्रिया भाव ही उनकी सफलता है. यह कुछ वैसे ही है, जैसे आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस के भीतर नरमपंथियों की कमियों के खिलाफ उग्रपंथियों की प्रतिक्रिया राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में सहायक रही. कुल मिलाकर यह इस बात को इंगित करता है कि उनका संदेश लक्ष्य समूह तक पहुंच गया है. पर समाज में ऐसे लोग भी कम नहीं हैं, जिन्हें यह पता ही नहीं है कि यह कार्यक्रम मोदी सरकार चला रही है. इसके बावजूद इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जनता इसके प्रति जागरूक नहीं है. हां, यह स्थिति मोदी सरकार के लिए राजनीतिक दृष्टि से घातक जरूर है. राजनीतिक दृष्टि से काम कराना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, उसकी मार्केटिंग भी आवश्यक है, तभी वोट मिलता है. इस लिहाज से मोदी सरकार के काम का प्रचार मीडिया में जितना दिखता है, उतना जमीन पर नहीं दिखता. 

मोदी सरकार अगले साल गांधी जी की 150वीं जयंती को यादगार बनाना चाहती है. इस समय तक वह भारत को खुले में शौचमुक्त बनाने के इरादे से काम कर रही है. गांवों में कुल नौ करोड़ शौचालय बनाने का लक्ष्य है. अभी तक 83 प्रतिशत शौचालय बनवाये जा चुके हैं. अभियान की शुरुआत के समय 38 प्रतिशत घरों में ही शौचालय थे. ऐसा नहीं था कि स्वच्छ भारत अभियान के पहले ग्रामीण स्वच्छता के लिए अभियान नहीं चलाया जा रहा था, लेकिन उनमें लक्ष्य प्राप्ति के प्रति तीव्रता का अभाव था. 1999 में भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम को नए सिरे से संपूर्ण स्वच्छता अभियान के रूप में लांच किया था. बाद में मनमोहन सिंह के शासन काल में इसका नाम बदल कर ‘निर्मल भारत अभियान’ कर दिया गया था. मोदी के शासन काल में इसमें कुछ बदलाव करके इसे ‘स्वच्छ भारत अभियान’ नाम दे दिया गया.

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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