शेखर कपूर: पानी चंद मुट्ठियों में सिमट गया है...

घर के पास साफ पानी के न होने से महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पर बुरी तरह असर पड़ता है जिनमें से कई तो लंबी दूरी और प्रदूषित स्रोत से पानी लाने के बोझ तले दबती चली जाती हैं.

शेखर कपूर: पानी चंद मुट्ठियों में सिमट गया है...

पानी दुनिया के सबसे कीमती संसाधनों में से एक है. मनुष्य के जीवित रहने के लिए उतना ही जरूरी है, जितनी वो हवा जिसे हम ग्रहण करते हैं. हम में से कई लोग पानी के महत्व को समझे बिना उस जीन्स को खरीद लेते हैं, जिसे बनाने में 7,600 लीटर पानी खर्च होता है. या पावर शॉवर का मजा लेते हैं जब की दुनिया भर में 84 करोड़ से अधिक लोग साफ पानी के बगैर जी रहे हैं. यही नहीं, करीब 400 करोड़ लोग हर साल कम से कम एक महीना भीषण पानी की कमी से जूझते हैं.

यही वजह है कि मैंने Brides of the Well नाम कि एक एनिमेशन फिल्म बनाई है, जो मेरी ही लिखी एक लघुकथा का रूपांतरण है. मैंने इस फिल्म को अंतरराष्ट्रीय विकास संस्था, वॉटरएड, के साथ मिलकर तैयार किया है. यह सरस्वती और पारस की कहानी है, दो किशोरियां जो उत्तरी भारत के पंजाब में रहती हैं. सरस्वती और पारस का बाल विवाह करवा दिया गया और अब वह एक तरह से दासी की जिंदगी जी रही है. वह अपने उम्रदराज पतियों के लिए पानी लाने के लिए घंटों लंबा सफर पैदल तय करती है.

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हालांकि यह कहानी काल्पनिक है, लेकिन यह एक सार्वभौमिक सच की तरफ इशारा करती है कि दुनिया दो हिस्सों में बंटी है - संपन्न और गैर-संपन्न. जहां कई लोग एक ग्लास साफ और स्वच्छ पानी पीने के लिए नल को खोलने से पहले एक बार भी नहीं सोचते, वहीं लाखों लोग रोज घंटों पैदल चलते हैं ताकि उनकी जरूरत का पानी उन्हें मिल सके, जो कि अक्सर उन्हें प्रदूषित स्रोत से मिलता है. इस वजह से उनकी सेहत, शिक्षा, आजीविका और सपनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

भारत में पला बढ़ा मैं, रोज सुबह 4 या 5 बजे उठकर अपने घर की पानी की टंकी भरा करता था क्योंकि उसी वक्त पानी उपलब्ध होता था. आज मुंबई में, मैं देखता हूं कि बस्तियों में रहने वाले लोग साफ पानी के लिए जद्दोजहद करते हैं. वहीं सड़क के उस पार अमीर घरों में नल का पानी रुकने का नाम ही नहीं लेता. भारत में सरस्वती और पारस उन 16.3 करोड़ लोगों का ही प्रतिनिधित्व करती हैं - जिनमें 8.10 करोड़ महिलाएं हैं – जिनके घर के पास साफ पानी उपलब्ध नहीं है.

घर के पास साफ पानी के न होने से महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी पर बुरी तरह असर पड़ता है जिनमें से कई तो लंबी दूरी और प्रदूषित स्रोत से पानी लाने के बोझ तले दबती चली जाती हैं. नतीजा यह होता है कि अक्सर लड़कियों को कम उम्र में ही स्कूल को अलविदा कहना पड़ता है. वह शिक्षा के अवसरों को गंवा देती हैं, और कुछ मामलों में तो जल्दी शादी करने के लिए भी मजबूर कर दी जाती हैं.

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हर साल ज्यादा से ज्यादा लोगों तक साफ पानी पहुंच रहा है, लेकिन उसी दौरान भारत में पानी की कमी बढ़ती जा रही है. इसमें 60 करोड़ लोग अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जैसे भूमिगत जल स्तर में कमी, सूखा, कृषि और उद्योग में मांग और जल संसाधन प्रबंधन में कमी इत्यादि. जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव से इन सबमें इज़ाफा होने वाला है. सरकारी नुमाइंदों के मुताबिक देश में पानी की प्रस्तावित मांग 2030 तक उपलब्ध पानी की आपूर्ति के मुकाबले दोगुना होने वाली है. वैसे ऐसी परिस्थिति सिर्फ भारत में नहीं है. बढ़ती मांग का अर्थ है कि यह जीवनदायी संसाधन दुनिया भर में खतरे का सामना कर रहा है. जनवरी में केप टाउन की सरकार ‘डे ज़ीरो’ के दस्तक देने की चेतावनी दे चुकी है, जहां लगातार तीन साल तक सूखे की वजह से शहर के नलों को अनिवार्य रूप से बंद रखना पड़ सकता है. वहीं चीन में हुए देश के पहले जल राष्ट्र गणना में बताया गया कि पिछले 25 सालों में नदी किनारों के 28 हज़ार जल स्रोत गायब हो गए हैं. जबकि भूमिगत जल स्तर भी प्रति वर्ष एक से तीन मीटर घटता जा रहा है.

सरस्वती और पारस काल्पनिक हो सकती हैं, लेकिन उनकी कहानी – सूखते जा रहे कुओं से पानी लाती जिंदगियों के इर्द-गिर्द घूमती है जो दुनिया भर में लाखों लोगों का सच है. उम्मीद है Brides of the Well लोगों को उस अन्याय के बारे में बता पाएगी, जो नतीजा है साफ पानी न मिल पाने का, खत्म होते जीवन और उन सपनों का जो पूरे नहीं हो पाए, सिर्फ इसलिए कि जन्म के संयोग ने उन्हें उनके बुनियादी मानवाधिकार से वंचित कर दिया. यहां देखें यह फिल्‍म.

उम्मीद है कि यह फिल्म, अहम कदम उठाए जाने के लिए एक नारे का काम करेगी, लोगों को सोचने पर मजबूर करेगी कि पानी आता कहां से हैं, और सभी जगह, सभी के लिए बेहतर पहुंच की मांग उठ पाएगी. पानी अब सामुदायिक संसाधन न होकर कुछ लोगों की मुट्ठी में सीमित हो रहा है. वैश्विक जल संकट, वह समस्या नहीं है जिससे सिर्फ हमारी अगली पीढ़ी को निपटना है. यह परेशानी आज-कल हमारी टीवी स्क्रीन और अखबारों की हेडलाइन बनती जा रही है. हमें जल्दी ही कदम उठाने होंगे, सिर्फ हमारी सरकार को ही नहीं, बल्कि निजी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी उन लोगों की मदद के लिए आगे आना होगा जो मूलभूत संसाधन के बगैर गुजर बसर कर रहे हैं. तभी सरस्वती और पारस जैसे लोग सच में आजाद हो पाएंगे.

(लेखक जानेमाने फिल्‍म निर्देशक हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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