स्मॉग : स्वच्छता अभियान की समीक्षा की दरकार

Suvigya Jain सुविज्ञा जैन | Updated: Nov 8, 2017, 05:53 PM IST
स्मॉग : स्वच्छता अभियान की समीक्षा की दरकार

देश में जब से नई सरकार बनी है उसने नए नए काम करके आजमाएं. कालाधन, स्मार्ट सिटी, स्टार्टअप, मेक इन इंडिया, सबको पक्के मकान, स्वच्छ मारत, नोटबंदी, जीएसटी वगैरह वगैरह. इन सभी कामों में एक बात समान है कि लगभग सभी पाइपलाइन में हैं. हालांकि सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही. सरकार दावा कर रही है कि कार्य प्रगति पर है. और सरकार के विरोधी कह रहे हैं कि देश का भट्टा बैठा जा रहा है. चश्मदीद जनता किसी नतीजे के इंतजार में है. आज्ञाकारी जनता खासतौर पर उस मामले में तो नतीजा देखना ही चाहती है जिसमें उसे भागीदार बनाया गया हो. जनता की भागीदारी के लिहाज़ से देखें तो दो काम ऐसे हैं जिसके लिए जनता ने आंख बंद करके सरकार का पूरा साथ दिया. पहला स्वच्छता अभियान और दूसरा नोटबंदी. इन दोनों में एक नोटबंदी पर काफी बात हो रही है लेकिन स्वच्छता अभियान की समीक्षा पर किसी का घ्यान नहीं है.

स्वच्छता अभियान की सबसे खास बात
स्वच्छता अभियान का काम समयबद्ध नहीं था. सो इसमें लक्ष्य होने के गुण नहीं थे. मिशन याअभियान के भी गुण इसमें नहीं थे. क्योंकि मिशन भी भले ही दीर्घकालिक होता हो लेकिन समयबद्धता की मांग जरूर करता है. प्रबंधन प्रौद्योगिकी की भाषा में विज़न, मिशन और लक्ष्य के फर्क़ को समझें तो स्वच्छ भारत एक विज़न था. विज़न के बारे में तय है कि यह उस प्रकार का नारा होता है जिसे पूरी तरह से कभी हासिल न किया जा सके और जिसके लिए हमेशा प्रयासरत रहने की जरूरत हो. यानी जो जीवनपर्यंत चलता रह सके. स्वच्छ भारत अभियान के तीन साल का अनुभव बता रहा है कि इस कथित अभियान को एक दृष्टि का नाम देकर अपनी प्रौद्योगिकीय भूल को सुधार लेना ठीक रहेगा.

कैसे हो समीक्षा 
सरकार के इस अभियाननुमा दृष्टि की समीक्षा के लिए पर्याप्त तथ्य उपलब्ध नहीं है. लेकिन सामान्य अनुभव से यह जरूर कहा जा सकता है कि लोगों में जागरुकता लाने के लिए सरकार नेकोई कसर नहीं छोड़ी. गंदगी को कहां और कैसे फेंकें इसके नए-नए तरीके भी ईजाद किए गए और लोगों ने इन्हें अपनाया भी. लेकिन बढ़ती जनसंख्या और कूड़े को एक जगह व्यवस्थित रूप सेफेंकने के साथ देशभर में गंदगी के अंतिम निपटान की समस्या अचानक उजागर हो गई है. कूड़ेके बड़े ढेर का निपटान सरकारी काम है सो देश के हर महानगर, नगर, और कस्बे का प्रशासन परेशान हो उठा है कि कूड़ा कचरा आखिर कहां जाकर फेकें. अब तो शहरों की गंदगी को फेंकने के लिए यानी उसे गड्ढे में भरने के लिए या गंदगी का पहाड़ बनाने के लिए भी जगह नहीं मिल रही है. अंत में ये बात निकलकर आ रही है कि इस कूड़े कचरे को किसी तरह से रीसाइकिल करने का काम किया जाए. वैसे यह कोई नया आइडिया नहीं है. यह एक थका-हारा विचार साबित हो चुकाहै. पिछले तीन दशकों से जो सामाजिक संस्थाएं यह सुझाव दे रही हैं और खुद भी प्रयोगिक परियोजनाएं चला रही हैं उनका अनुभव यह है कि यह बहुत ही खर्चीला काम है. एक-दो संस्थाएं दान-अनुदान के पैसे से प्रतीकात्मक रूप से यह काम भले ही कर लें लेकिन देश के स्तर पर किसी कार्यक्रम की अपनी हैसियत दिख नहीं रही है. स्वच्छता अभियान की समीक्षात्मक टिप्पणी बनाना हो तो बगैर संकोच के कहा जा सकता है कि इन दो-तीन साल में स्वच्छता को लेकर जागरुकता अभियान दबाकर चले हैं. मानकर चला जा सकता है कि देश स्वच्छता के महत्व के प्रति काफी जगारूक हो गया है. अगर ऐसा वाकई है तो सरकार पर यह एक नया जनदबाव आने वाला है कि वह देश में ठोस गंदगी के निपटान या निस्तारण के लिए क्या योजना लेकर आती है.

ज्यादा ही संवेदनशील हो उठा है गंदगी का मसला
स्वच्छता के लिए जागरुकता अभियानों ने जनमानस को अति संवेदनशील बना दिया है. प्रचारमाध्यमों से दिन-रात चले अभियान का असर देश के गांवों तक भी पहुंचा है. ये वही गांव हैं जोशहरों की गंदगी के ढेर को अपने खेतों के पास जमा होते रहने देते थे. कुछ तो ढेर बड़े होने लगेऔर कुछ गांव ज्यादा सतर्क हो गए हैं. सो देश के लगभग हर जिले के उन गांवों की तरफ सेविरोध होता दिख रहा है जहां शहरों की गंदगी को ठिकाने लगाने की जगह बनाई गई थी. ज़ाहिर है शहरी प्रशासनों पर भारी दबाव आने वाला है कि वह अपने इलाके से निकलने वाली गंदगी का निपटान अपने ही इलाके में करें. अब दिक्कत यह है कि शहरी इलाकों में गंदगी के निपटान की जगह ढूंढना किसी भी प्रशासन के बूते के बाहर नज़र आ रहा है. कूड़े के पहाड़ों पर आग लगाने पर भी प्रशासन की जवाबदेही बढ़ाई गई है. अब हालत ये है कि अगर गंदगी को रीसाइकिल करके कोई नई चीज़ बनाने का संयत्र लगाना हो तो वह भारी भरकम सयंत्र कहां लगाएं? इसके लिए भारी भरकम खर्च भी हमारे बूते से बाहर है. अगर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से धन का प्रबंध हो भी जाए तो ज़मीन तो फिर भी चाहिए. अगर महंगी ज़मीन खरीदने के लिए भी किसी तरह धन का प्रबंध कर लें तो उस इलाके में नए नए बसे शानदार रिहाइशी इलाकों के लोग तो अपनी रिहाइश से दो दो किलोमीटर दूर तक ऐसा कोई संयत्र लगाने को सहन नहीं करते. क्योंकि वे भी अपने आस पास सफाई के प्रति जागरूक हुए हैं.

क्या सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति के सहारे यह संभव है
राजनीतिक इच्छाशक्ति वहां तो काम कर सकती है जहां किसी योजना को लागू करना हो. यहां तोकोई उपाय सोचने तक का सिरा नहीं मिल रहा है. हां, इस बार आईआईटी दिल्ली के दीक्षांत समारोह के पहले इस बार जिस तरह से इस प्रतिष्ठित संस्थान ने नए नए ऐलान किए उनमें एक ऐलान यह है कि प्रौद्योगिकी के छात्रों के पाठ्यक्रम में लोकनीति का पाठ भी शामिल किया जाएगा.
लोकनीति बनाने में इन प्रौद्योगिकी के छात्रों की क्या भूमिका हो सकती है ये तो पाठ्यक्रम तय होते समय पता चलेगा लेकिन इतना तय है कि देश में ठोस गंदगी के निस्तारण के लिए कोई नई प्रौद्योगिकी चाहिए. और रही बात कचरा प्रबंधन की तो अपने पास भारतीय प्रबंधन संस्थान भी हैं. और जब तक कोई उपाय नहीं सोचा जा पाता तब तक कम से कम प्रबंधन प्रौद्योगिकी के हुनर को लगाकर तो देखा ही जा सकता है.

(लेखिका, प्रबंधन प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)