अपने खिलाड़ियों को भी मनोवैज्ञानिक सेवाएं देने का मसला

Suvigya Jain Tue, 11 Sep 2018-11:31 pm,

एशियाई खेलों में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया को देखें तो वे खेल और दूसरे किसी भी क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. क्या यह एक कारण हो सकता है कि सबकुछ करने के बाद भी इस बार के एशियाई खेलों में हमारा नंबर आठवां था.

एशियन खेल खत्म होने के हफ़्तेभर बाद अब यह बात उठना शुरू हुई है कि अपने देश का प्रदर्शन और अच्छा कैसे किया जाए. एक सवाल उठा कि क्या खिलाड़ियों को मनोवैज्ञानिक सेवाओं की जरूरत है? यह सवाल हाॅकी में कांस्य पदक लेकर लौटी टीम के कोच से एक प्रेस काॅन्फेंस में पूछा गया था. हाॅकी कोच ने इस जरूरत को बड़ी आक्रामकता से नकार दिया. बाद में अपने हाॅकी कप्तान ने कह दिया कि हमारे कोच ही हमारे मनोवैज्ञानिक हैं. जब बात उठी है तो इसका विश्लेषण भी होना चाहिए.


सवाल उठा क्यों?
दरअसल इस बार के एशियन गेम्स में हमें अपनी हाॅकी टीम से बड़ी उम्मीदें थीं. वैसे उम्मीदें तो कबड्डी, कुश्ती, मुक्केबाजी निशानेबाजी जैसे कई और खेलों में भी थीं. बेशक प्रतियोगिता में हम काफी आगे तक आ भी गए थे. बहुतेरे क्वार्टर फाइनल और सेमीफाइनल मुकाबले आखिर आखिर तक हमने टक्कर के खेले. मसलन हाॅकी. लेकिन वहां खेल के आखिरी क्षणों और बाद में पेनल्टीशूट आउट में टूट गए. जबकि खेल विश्लेषक मानते थे कि अगर वहां तक पहुच गए थे तब पेनल्टीशूट आउट में हमारी जीत की संभावनाएं सामने वाली टीम के मुकाबले और ज्यादा हो गई थीं. लेकिन विश्वस्तरीय मुकाबले में मनोवैज्ञानक स्तर पर जो मज़बूती चाहिए थी उसमें कमज़ोर पड़ गए. वैसे खेल तो खेल ही है. परिस्थिति विशेष में हार जीत के दसियों कारण हो सकते हैं. फिर भी समझदारी इसी में हैं कि जो जो कारण गिनाए जा सकते हों उन सब पर गौर किया जाए.


खेल जगत के अव्वल देश कितने मुस्तैद
एशियाई खेलों में चीन, जापान और दक्षिण कोरिया को देखें तो वे खेल और दूसरे किसी भी क्षेत्र में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने का कोई मौका नहीं छोड़ते. क्या यह एक कारण हो सकता है कि सबकुछ करने के बाद भी इस बार के एशियाई खेलों में हमारा नंबर आठवां था. जो देश खेलों में अव्वल हैं वहां खेलों में मनोवैज्ञानिक उपायों को सबसे ज्यादा तरजीह दी जाती है. मसलन चीन और जापान जैसे कई देश.


सिर्फ हाॅकी ही नहीं
मसला सिर्फ हाॅकी का नही बल्कि दूसरे खेलों का भी है. सिलसिलेवार समीक्षा हुई नहीं है. बेशक पदकों की कुल संख्या के लिहाज़ से हमारा प्रर्दशन पहले से बेहतर रहा. लेकिन आॅलंपिक या एशियन गेम्स में हम अपने पुराने रिकार्ड को बेहतर करने के मकसद से नहीं जाते बल्कि दूसरे देशों के मुकाबले अच्छा प्रदर्शन करने जाते हैं. इस बार हम एक भारीभरकम दल लेकर और अपनी अच्छी तैयारियों का दावा करते हुए एशियन गेम्स खेलने पहुंचे थे. इन्हीं दावों के आधार पर अनुमान लगाए गए थे कि इस बार एशियाई खेलों में हम चैथे या पांचवे नंबर को हासिल करके आएंगे. हिसाब 81 पदक पाने का लगाया गया था. अब चूंकि देशों की सूची गोल्ड मैडल की संख्या से तय होती है. सो अपने 15 गोल्डमैडल के हिसाब से हमारा आठवां नंबर रहा. जबकि रजत पदकों की संख्या 24 रही. यानी रजत पदकों की संख्या बता रही है हम कितनी प्रतियोगिताओं में सिर्फ एक कदम पहले ही टूटे. इसीलिए यह बात उठी कि फाइलन या सेमीफाइनल के कड़े मुकाबले के दौरान दिक्कत आ रही है.


आखिरी मिनट में गोल खाया था हाॅकी टीम ने
आखिरी मिनट में गोल खा जाने से जीतता हुआ मैच भारत पेनल्टी शूटआउट में हारा. पेनल्टी शूटआउट में प्रतिभा के साथ साथ मानसिक दबाव को नियंत्रित रख पाने की भी परीक्षा होती है. कुछ आलोचकों का कहना था कि भारतीय पुरुष हॉकी टीम की समस्या रही है कि वह खेल के अंतिम क्षणों में खुद को सहज नहीं रख पाती. इसके कई कारण गिनाए गए. एक कारण बताया गया कि खेल के अंतिम मिनटों में जब तनाव बढ़ता है तब टीम में संयम की कमी और दबाव के कारण पूरे मैच में हावी रहने के बावजूद भी आखिर में आकर हम लड़खड़ा जाते हैं. फिर चाहे वो पेनल्टी काॅर्नर्स का पूरा फायदा उठाने का मसला हो या शूट आउट्स की बात हो या आपसी तालमेल की. इसी के मद्देनजर हाॅकी के कोच और कप्तान से खिलाड़ियों से तनाव के क्षणों में धैर्य साधने और उत्साह और निराशा को संभालने में मनोवैज्ञानिक सेवाओं की जरूरत वाला सवाल पूछा गया था. जवाब में कोच ने कहा कि मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत क्यों है? अगर खिलाडियों में विश्वास ही लाना है तो वह तो किसी आम आदमी से बात करके भी आ सकता है. उनका कहना था की मनोवैज्ञानिक शब्द में ही नकारात्मक भाव है. और अगर टीम में मनोवैज्ञानिक रखा जाएगा तो खिलाडियों को लगेगा की वह कुछ गलत कर रहे हैं जिसे सुधारने के लिए किसी को लाया गया है. उनके मुताबिक एक खिलाडी अपना प्रेरक खुद ही होता है. अगर वह खुद पर यकीन करेगा तो खुद सब ठीक कर लेगा. एक पेशेवर विषय में ऐसी टिपण्णी एक राष्ट्रीय टीम के कोच और कप्तान से सुनना बहुतों को खासकर पेशेवरों को तो बहुत ही ज्यादा अजीब लगी होगी.


ज्ञान विज्ञान के प्रभुत्व का दौर है यह
आज हर क्षेत्र में बेहतर परिणाम पाने के लिए पेशेवर सेवाएं ली जा रही हैं. खेल उनमें एक है. स्कूल कॉलेज में काउंसलर हों, उद्योग जगत में कर्मचारियों को प्रेरित करने और समस्याओं के निदान के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम करने वाले मोटीवेटर्स हों, या खेल जगत में बढ़ती लोकप्रियता और दबाव को संभालने वाले स्पोट्र्स साइकोलोजिस्टस हों. खेल मनोविज्ञान या स्पोट्र्स साइकोलॉजी मनोविज्ञान की नई शाखा ज़रूर है, लेकिन इस समय दुनिया भर में यह बहुत ही प्रचलित और स्वीकृत क्षेत्र है.


खेल के अलावा कुछ और भी हैं अब खेल
इस समय खेलों पर खर्च होने वाले पैसों से कहीं ज्यादा पैसा मैदान के बाहर के कार्यों पर खर्च किया जा रहा है. हर खेल और खिलाडी की इस समय एक ब्रांड वैल्यू है. टीवी और इन्टरनेट के माध्यम से घर घर में अब हर खेल देखा जा रहा है. जीत हार के फ़ौरन बाद सोशल मीडिया से तारीफ और आलोचना उसी समय मिलनी शुरू हो जाती है. मीडिया अपनी भूमिका निभाता है. एक खिलाड़ी के प्रदर्शन पर ही विज्ञापन और ब्रांड के प्रचार पर पैसे की मा़त्रा भी तय होने लगी है. ये सब वे कारण है जिनसे आज खिलाड़ियों पर खेल का तनाव पहले के मुकाबले कई गुना ज्यादा बढ़ चला है. खेल अब करियर है. और करियर को सही तरीके से चलाने के लिए काउंसलिंग की ज़रुरत कोई नई बात नहीं है. हार और जीत जब इतने बड़े पैमाने पर होने लगती हैं तो उन्हें मानसिक रूप से संभालने के लिए किसी पेशेवर की सेवाएं आज के समय में ज़रूरी बनती जा रही हैं.


वैसे यह कोई नई बात भी नहीं
ज्ञान की एक शाखा के रूप में खेल मनोविज्ञान का इतिहास करीब सौ साल का है. सन 1920 में बर्लिन ओलिंपिक के सेक्रेटरी जनरल कार्ल दिएम ने पहली स्पोट्र्स साइकोलॉजी लैब की स्थापना बर्लिन, जर्मनी में की थी. फिर सन 1923 में पहली बार अमेरिकी स्पोट्र्स साइकोलोजिस्ट कोलमन ग्रिफिथ ने इलिनोए विश्विद्यालय में इस विषय को पढ़ाना शुरू किया. संसाधनों की कमी के कारण इस विषय पर काम कई साल तक धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ा. सन 1965 में फिर दोबारा इस विषय पर काम शुरू किया गया. तभी इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ़ स्पोट्र्स साइकाॅलॉजी की स्थापना की गई. और बड़े पैमाने पर इसके पाठ्यक्रम शुरू कराए गए. आज दुनिया के ज़्यादातर खेलों में खेल मनोवैज्ञानिक अपनी सेवाएं दे रहे हैं. आॅलंपिक, काॅमनवैल्थ और एशियन गेम्स में जो देश सबसे ज्यादा गोल्ड मैडल पाते हैं


उनके यहां शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत ध्यान दिया जाने लगा है. क्या हमें उस पर नज़र डाल लेनी चाहिए.


खेल मनाविज्ञान का दायरा आत्म विश्वास तक सीमित नहीं
खेल मनोविज्ञान सिर्फ तनाव के प्रबंधन या विश्वास बढाने तक सीमित नहीं है. खेल मनोवैज्ञानिक इस समय एक खिलाडी या टीम के प्रदर्शन को बेहतर करने के लिए पेशेवर तौर-तरीकों का भी इस्तेमाल करते हैं. मसलन इमेजरी, अंटेशनल फोकस, आंतरिक और बाहरी प्रेरक आदि. इमेजरी यानी एक लक्ष्य की सचित्र कल्पना कराना और उसे ट्रेनिंग के दौरान परफॉर्म कराना. अटेंशनल फोकस यानी शोर और आस पास के दूसरे भटकाव से ध्यान हटा कर दिए गए लक्ष्य पर ध्यान लगाने का अभ्यास कराना. बाहरी प्रेरकों में मनोवैज्ञानिक आमतौर पर ईनाम, धनराशि, ट्राफी, खिताब आदि का प्रयोग सुझाते हैं. आंतरिक प्रेरकों में जीतने की इच्छा, जीतने के बाद मिलने वाला सम्मान, देश के लिए किए जाने वाले प्रदर्शन पर गर्व कराना आदि आते हैं.. ऐसी कई पद्धतियां विकसित की जा चुकी हैं. जिससे खिलाड़ी मैदान में आत्मविश्वास के साथ हर परिस्थिति में सहज रहते हैं. बहरहाल हाॅकी के कप्तान और कोच ने मनोवैज्ञानिक सेवाओं की व्यर्थता पर भले ही कुछ बोल दिया हो लेकिन खेल प्रबंधकों को इस बारे में बात करना बंद नहीे करना चाहिए.


(लेखिका, मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)


(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)

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