सीरीज के बाकी के मैचों में भी टीम इंडिया की मुसीबत कम नहीं होने वाली

भारतीय बल्लेबाजों का आत्मविश्वास ही लड़खड़ाया हुआ लगने लगा है. विराट कोहली अगर अच्छा खेल रहे हैं तो पीठ में दर्द की समस्या से विचलित हें. आर अश्विन अगर स्पिन के जाल में इंग्लैंड के बल्लेबाजों को फंसा कर उन पर दबाव डाल रहे हैं तो वह भी बाएं हाल में लगी चोट से परेशान हैं.

सीरीज के बाकी के मैचों में भी टीम इंडिया की मुसीबत कम नहीं होने वाली

किसी ने सुषमा स्वराज को ट्वीट किया है कि ''भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी इंग्लैंड के खराब मौसम में फंस गए हैं, कृपया उन्हें ढूंढ़ कर बचाइए.'' इसी से पता चलता है भारत के परिणामप्रिय क्रिकेट प्रेमी वर्तमान टीम इंडिया के इंग्लैंड में प्रदर्शन से कितने आहत हैं. भारत के पाटा विकेटों पर व छोटे छोटे मैदानों चौके छक्कों की झड़ी लगाने वाले भारतीय खिलाड़ी अचानक अपरिचित लगने लगे हैं. हार-जीत तो खेल में होती है. पर ऐसी हार कि सिंहासन पर बैठे हैं और तीन दिनों में ही टेस्ट मैच हार जाएं. मुझे याद है कि 1971 में जब अजित वाडेकर के नेतृत्व में भारत ने इंग्लैंड को इंग्लैंड में और वेस्ट इंडीज को वेस्ट इंडीज में हराया था. उस समय इंदौर में एक भीमकाय बल्ले का भव्य उद्घाटन किया गया था. उस विजय बल्ले पर विजेता टीम के सभी सदस्यों के दस्तखत थे. उस पर  लिखा था, भारतीय क्रिकेट अमर रहे. लेकिन 1974 में जब टीम फिर से इंग्लैंड गई और एक पारी में पूरी टीम 42 रन पर ढेर हो गई, तो नाराज क्रिकेट प्रेमियों ने गौरव के प्रतीक उस बल्ले पर कालिख पोत दी. इसे कहते हैं जीत का बोलबाला, हारे का मुंह काला.

 कहते हैं कि फूलों के बिस्तर पर सोने की आदत वालों को कांटों के बिस्तर पर नींद नहीं आती. भारतीय क्रिकेटरों की भी यही हालत हो गई है. इंग्लैंड की स्विंग और सीम वाली परिस्थितियां कांटे का बिस्तर ही तो हैं. क्रिकेट के जानकार अक्सर कहते हैं कि आप कितने ही बड़े व मशहूर बल्लेबाज बन जाएं पर परिस्थितियों का सम्मान करना आपको आना चाहिए. आप इंग्लैंड में स्ट्रोक्स नहीं खेल सकते. जैसे आप भारत में खेलते हैं. पर भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल में परिवर्तन नहीं करने की ठान ली है. इसलिए  हम सीरीज में 0-2 से पीछे हो गए हैं. अब तो भारतीय बल्लेबाजों का आत्मविश्वास ही लड़खड़ाया हुआ लगने लगा है. विराट कोहली अगर अच्छा खेल रहे हैं तो पीठ में दर्द की समस्या से विचलित हें. आर अश्विन अगर स्पिन के जाल में इंग्लैंड के बल्लेबाजों को फंसा कर उन पर दबाव डाल रहे हैं तो वह भी बाएं हाल में लगी चोट से परेशान हैं.

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बुमराह को तीसरे टेसट में खिलाने की मांग की जा रही है. पर चोटिल होने के बाद सर्जरी करा के अभी वापस आए हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वापसी इतनी आसान नहीं होती. इसलिए आगे के तीन टेस्ट मैचों में भी भारत की मुश्किलें कम नहीं होंगी. नॉटिंघम में खेले जाने वाले तीसरे टेस्ट में भी गेंद के काफी स्विंग व सीम होने की संभावना है. यानी राहत का कहीं अता पता नहीं है.

यह सही है कि लॉड्र्स के दूसरे टेस्ट के दौरान गेंद जितनी स्विंग हो रही थी, वैसी तो पिछले 3-4 वर्षों में दुनिया में कहीं दिखाई नहीं दी थी. फिर भारत जब बल्लेबाजी करने उतरा, तब बादल फिर घिर आते थे. वातावरण भारी हो जाता था और गेंद के खूब स्विंग होने का रास्ता खुला जाता था. इंग्लैंड जब बल्लेबाजी करने उतरता था, तब धूप निकल आती थी. ऐसे में गेंद कम स्विंग होती थी. इससे लगता था कि मौसम भी घरेलू टीम पर मेहरबान था. पर लॉर्ड्स की दूसरी पारी में तो वैसी परिस्थितियां नहीं थीं. फिर भी विश्व में सब से मजबूत मानी जानी वाली भारतीय बल्लेबाजी का किला भरभरा कर गिर पड़ा. यह अपनी काबिलियत में भरोसा खो देने वाला क्षण था. पर एंडरसन, ब्रॉड और वोक्स की प्रशंसा करनी होगी. उन्होंने परिस्थितियों के हिसाब से अपनी गेंदबाजी की योजना में परिवर्तन किया. जब गेंद स्विंग हो रही थी, तब गेंद को जमीन पर जोर से मारने के बजाए हवा में रिलीज किया. पर जब ऐसा नहीं हो रहा था, तब दूसरी पारी में गेंद को कंधे का अतिरिक्त जोर लगाकर जमीन (पिच) पर जोर से मारा ताकि गेंद सीम के सहारे ज्यादा कट हो और ऊंची भी उठे. यह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट है. यहां आसान कुछ भी  नहीं होता. इंग्लैंड ने अपनी योजनाओं को ठीक से अंजाम तक पहुंचाया जब कि भारतीय खिलाड़ी अपनी स्वयं की काबिलियत ही भूल बैठे. प्रतिभा को परिणाम में बदल सकने की काबिलियत ही आपको जीत दिला सकती है.

भारतीय टीम की तकलीफें इस कारण भी बढ़ी हुई हैं कि असंख्य भूतपूर्व खिलाड़ियों व समालोचकों की टीमें इन्हें सिखाने में लग गईं हैं. कई भूतपूर्व खिलाड़ी नाराज होकर सीख दे रहे हैं और कई समालोचक असंवेदनशील आलोचनाएं कर रहे हैं. कई भूतपूर्व खिलाड़ी स्वयं तो इंग्लैंड जा कर असफल होते रहे थे. अब वर्तमान खिलाड़ियों केा ऐसे सिखा रहे हैं, मानो ब्रेडमैन किसी नौसिखिए को सिखा रहा हो. इन बिना सलाह मांगे देने वाले रायचंद ने भारतीय क्रिकेट टीम का सदैव बड़ा नुकसान किया है.

इसलिए विराट कोहली ने लोगों से समर्थन की मार्मिक अपील की है. अपनी क्षमता के अनुसार, खेल सकने में तकनीकी कुशलता के साथ मानसिक तैयारी की बड़ी जरूरत है. इस समय भारतीय बल्लेबाजों का आत्मविश्वास डोला हुआ है. इस को संबल देने की जरूरत है. सीरीज में अभी भी 3 टेस्ट बाकी हैं. भारतीय खिलाड़ियों में प्रतिभा की कमी नहीं है. एक जीत पासा पटल सकती है. पर इसके लिए टीम प्रबंधन, प्रशिक्षकों व खिलाड़ियों को एकजुट हो कर कार्य करना होगा. अब लड़ाई स्वाभिमान बनाने की है. अगल वर्ल्डकप इंग्लैंड में ही होने वाला है. भारत को मनौवैज्ञानिक जीत की सख्त जरूरत है. इंग्लैंड का आत्मविश्वास फिलहाल बहुत बढ़ा हुआ है. उन्हें लगता है, अन्य खिलाड़ियों की लगातार असफलता विराट कोहली का विकेट जल्दी टपकने से भारत गहरे दबाव में आ सकता है. अत: बाकी के खिलाड़ियों पर जिम्मेदारी बढ़ गई है कि अपने कप्तान पर दबाव आने से रोकें. क्या भारतीय टीम ऐसा कर पाएगी. इसी प्रश्न का जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिल पाएगा.

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