टाइम आउट यानी निर्णायक मोड़! - सुधांशु गुप्त

Last Updated: Thursday, April 13, 2017 - 18:19
टाइम आउट यानी निर्णायक मोड़! - सुधांशु गुप्त
सुधांशु गुप्त

आजकल शामें आईपीएल के मैच देखते हुए गुजर रही हैं. लेकिन दिमागी लोगों के लिए क्रिकेट मैच भी सिर्फ मैच नहीं होते. वे किक्रेट को एन्ज्वॉय करने के साथ-साथ तमाम तरह के सवाल भी उठाने लगते हैं. आठ अप्रैल को दिल्ली और रॉयल चैलेंज बैंग्लुरु के बीच मैच था. बैंग्लुरु ने पहले बैटिंग करते हुए बमुश्किल 157 रन बनाए. दिल्ली का जीतना मैच में मुश्किल ही लग रहा था. लेकिन 16 ओवरों के खेल के बाद लगने लगा कि दिल्ली मैच जीत जाएगी.

इस लगने के पीछ एक बड़ा कारण था ऋषभ पंत की शानदार बल्लेबाजी. पिता की मृत्यु के बाद लौटे ऋषभ का बल्ला आग उगल रहा था. लेकिन तभी एंपायर ने हाथ से टाइम आउट का इशारा किया. मैच की रिद्म और बल्लेबाजी की गति बाधित हुई. टाइम आउट के बाद विकेटें गिरनी शुरू हो गईं और वह दिल्ली जो आसानी से जीतती दिखाई पड़ रही था, पंद्रह रन से मैच हार गई. 

मन में सवाल उठा कि यदि यह 'टाइम आउट' न होता तो दिल्ली आसानी से जीत सकती थी. तो क्या हर टाइम आउट के बाद बल्लेबाजी कर रही टीम विकेटें गंवा कर मैच हार जाती है? नहीं, ऐसा भी नहीं है. 9 अप्रैल को मुंबई और केकेआर का मैच था. केकेआर ने पहले बैटिंग करते हुए 178 रन बनाए थे. 16 ओवर के बाद फिर टाइम आउट हुआ. इस समय तक मैच क्रूशियल प्वाइंट पर था. टाइम आउट के बाद दूसरी गेंद पर पोलार्ड आउट हो गए. अब साफ लग रहा था कि मुंबई मैच हार जाएगा, लेकिन हार्दिक पटेल की शानदार बल्लेबाजी से मुंबई ने यह मैच जीत लिया. 

'बिटविन दि लाइंस' पढ़ा जाए तो ऐसा लग सकता है कि टाइम आउट यानी स्ट्रेटेजिक टाइम आउट में ही यह तय किया जाता है कि मैच को आगे किस तरफ ले जाना है. गौर से देखें तो हमें पता चलता है कि टाइम आउट के बाद मैच उस गति से नहीं चलती जिस गति से पहले चल रहे होते हैं. कह सकते हैं कि टाइम आउट (खासतौर पर 13 से 16 ओवर के बीच लिया जाने वाला ब्रेक) में ही यह रणनीति बनती है कि किस टीम को विजयी होना है. 

फुटबॉल दुनिया का सबसे लोकप्रिय खेल इसलिए है कि उसमें किसी तरह की कोई बाधा नहीं आती. यानी खेल शुरू होता है पहला हाफ 45 मिनट तक निरंतर चलता है. ब्रेक के बाद दूसरा हाफ भी इसी तरह फ्लोलैस चलता है. यानी कोई टाइम आउट नहीं. क्रिकेट तो वैसे भी एकाग्रता का खेल माना जाता है-जेंटलमैन्स गेम, साइट स्क्रीन पर होने वाली हलचल या किसी दर्शक द्वारा की गई गतिविधियां भी बल्लेबाज का ध्यान भंग कर देती हैं. फिर टाइम आउट से बल्लेबाजों का ध्यान क्यों भंग नहीं होता?

स्ट्रेटेजिक टाइम आउट की शुरुआत 2009 में इस मकसद से की गई थी दोनों टीमों को ब्रेक मिल सके और वे खेल के दौरान खुद को दोबार रिग्रुप कर सकें और नई रणनीति बना सकें. एक मैच के दौरान 600 सेकेंड के टाइम ब्रेक में एयरटाइम बेच कर करोड़ों रुपए भी बना जा रहे हैं. गौरतलब है कि एक मैच के दौरान 6-9 ओवरों के बीच पहला टाइम आउट फिल्डिंग टीम लेती है और 13-16 ओवर के बीच दूसरा टाइम आउट बैटिंग टीम लेती है. यानी हर टीम के बैटिंग करते समय दो-दो टाइम आउट लिए जाते हैं. 

हो सकता है आज के फास्ट क्रिकेट में स्ट्रेटेजिक टाइम आउट की सख्त जरूरत हो, इससे भी किसी को कोई गुरेज नहीं हो सकता कि 600 सेकेंड बेचकर अपनी आय बढ़ाई जाए और यह भी संभव है कि पूरे मैच के महज चार ओवर बचे रहने पर टीमें कुछ ऐसी रणनीति बना लेती हों जो उन्हें जीत की ओर ले जा सके. लेकिन यदि ऐसा ही होता तो फिर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में टाइम आउट को लागू क्यों नहीं किया जा रहा? क्या वहां स्ट्रेटजी की जरूरत नहीं होती. क्या इस स्ट्रेटेजिक टाइम आउट की आवश्यकता केवल क्लब क्रिकेट को ही है. खासतौर पर भारत, पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देशों में होने वाली क्रिकेट लीग्स को.
 
आईपीएल देखने वाले बेचारे भोले भाले दर्शक तो यही सोचते रहते हैं कि टाइम आउट में अब उनकी टीम नयी रणनीति के साथ उतरेगी और विरोधी टीम को पस्त कर देगी. टाइम आउट का खेल उनकी समझ से परे हैं. और सच कहूं तो यह अपनी समझ से भी परे है. 

(लेखक सुधांशु गुप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं)



First Published: Thursday, April 13, 2017 - 18:19
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