नीरज की कविताओं में एक कहानी होती थी, खत होता था और याद होती थी...

नीरज को हिंदी काव्य-संसार और साहित्य में लोकप्रियता के एक खांचे में डालकर निपटा दिया गया है. यह बहुत उचित स्थिति नहीं है. वे उन कवियों में थे, जिन्होंने हिंदी की अच्छी कविता को व्यापक पाठक समाज तक पहुंचाने की एक राह  बनाई थी.

नीरज की कविताओं में एक कहानी होती थी, खत होता था और याद होती थी...

गोपालदास नीरज 93 साल का जीवन जी कर गए. अगर वे आत्मकथा लिखते तो एक दिलचस्प कहानी जानने को मिलती. एक पूरा दौर जिसमें वे जिए, हमारे सामने होता. वे आखिरी कुछ महीनों को छोड़कर 90 की उम्र होने के बाद भी बुलाए जाने पर कवि-सम्मेलनों में जाते रहे, चिट्ठियां लिखते रहे, लोगों से मिलते-बतियाते रहे. उनका बचपन बहुत संघर्षमय था, बाद के जीवन में उन्हें लोकप्रियता और सफलता दोनों मिली. यह लोकप्रियता कई स्तरों वाली थी. वे मंच के लोकप्रिय कवि थे, पर उनकी किताबें भी खूब पढ़ी जाती थीं. फिल्मों में उन्होंने सौ से ज्यादा हिट गीत लिखे. 

उनके गीतों में साहित्यिक बिंब और उपमाएं होतीं, लय-छंद-गति होती, अर्थ की खूबसूरती और भावनाओं का असर होता, फिर भी इन गीतों के बल पर फिल्में हिट हुईं. आज साठ-सत्तर साल बाद भी रेडियो पर या अन्य कहीं बज रहे उनके गीत बरबस दिल को अपनी ओर खींच लेते हैं. ऐसा कम होता है. उर्दू में तो यह था कि बड़े शायर फिल्मों में बड़े गीतकार के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए, कैफी आजमी, साहिर लुधियानवी, मजरूह आदि. मगर हिंदी की यह सीमा थी. खड़ी बोली हिंदी अपने को उतने सहज-सरल रूप में अब तक ढाल न पाई थी. प्रसाद की कामायनी से होती वह बच्चन के निशा-निमंत्रण तक पहुंची थी. उसका अपना सौंदर्य था, गहनता थी पर बिल्कुल आमजन तक उसकी पहुंच न थी. हिंदी कवियों में यह गौरव अकेले नीरज को मिला.

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नीरज की इस सफलता का राज क्या था? उन्होंने क्या नया कर दिया था? लोग तुरंत कहेंगे कि उनकी आसान भाषा. परंतु भाषा कथ्य से अलग कहां होती है? भाषा तो कथ्य का अनुसरण करती है, उसमें घुली-मिली पर उसके बाद आती है. वह जो बात थी नीरज की अनूठी वह यह थी कि उन्होंने कवि के रूप में भी और फिल्मी गीतकार के रूप में भी अपने पूर्ववर्ती हिंदी कवियों की तुलना में एक नई चीज की. दैहिकता को उन्होंने कथ्य बनाया. हिंदी के बड़े कवि हों या मंच के लोकप्रिय कवि, उनकी कविता में नायिका वायवीय, काल्पनिक, अमूर्त होती थी. उसकी कोई रूप-रेखा, रंग पकड़ में ही नहीं आता था. एक विचार, एक सपना शब्दों में तिरता रहता, पर हाथ लगाते ही वह ओझल हो जाता. 

नीरज ने अपनी कविता को शुद्धता और नैतिकता से अलग किया. उसमें मांसलता और दैहिकता जोड़ी. उन्होंने जिसे संबोधित किया, वह सुनने वालों को अपनी जीवन कथा की पात्र लग सकी, उनका कोई छूटा हुआ प्रेम, अधूरा रहा कोई स्पर्श, खो गई कोई याद उसने जगा दी. वह इस समाज की, इस जीवन की सतह से उठी स्त्री थी, कवि-कल्पना का अंकन नहीं. भाषा की सरलता, सहज मुहावरे, लय-तान और कथ्य का संपूर्ण निर्वाह तो बाद की बात है. अपने समय में नीरज की अतिशय लोकप्रियता का यह राज था.

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ऐसी कविता फिर तो बहुतों ने लिखी. पर नीरज की कुछ और भी खासियतें थीं. उनके शब्द और भाषा तो हिंदी की शास्त्रीय काव्य परंपरा से निकलकर आए थे, पर इसे उन्होंने उर्दू काव्य का आधार दिया. यानी उसमें कुछ सूफियाना लहजा, कुछ अल्हड़पन, कुछ बेफिक्री, कुछ जीवन-दर्शन और मयनोशी का एक आलम-सा उन्होंने घोल दिया. हिंदी मंच के लिए यह एक नया रसायन था और हिंदी फिल्मों के लिए भी एक नई चीज थी. प्रायः हिंदी साहित्य में उन्हें लोकप्रिय गीतकार कहकर छोड़ दिया जाता है. यह मान लिया जाता है कि उनकी लोकप्रियता मंचीय है. पर मंच पर तो बहुत से कवि थे, लोकप्रिय भी अनेक थे. हिंदी के सबसे लोकप्रिय कवि बच्चन का उदाहरण लिया जाए तो उनकी लोकप्रियता एक काल-विशेष और एक कृति-विशेष तक सीमित रही. बीसवीं सदी के चौथे से छठे दशक तक और मधुशाला तक. बच्चन ने बहुत सी कविताएं लिखीं और श्रेष्ठ कविताएं लिखीं. मगर मंच पर वे लोकप्रिय नहीं हुईं. वे मधुशाला के कवि के रूप में ही ख्यात हुए, जो एक तरह से उमर खैयाम की रचना की छाया ली हुई चीज है. उसकी लोकप्रियता का कारण कविता में नहीं उस युग के शिक्षित मध्यवर्ग के अतिनैतिकता बोध वाले बंद समाज में अधिक था. उस समाज को वह कविता बंधनमुक्ति का कुछ एहसास सा दे गई. मधुशाला की लोकप्रियता बच्चन की सैकड़ों बेहतरीन कविताओं के लोकप्रिय होने की राह में हमेशा बाधा की तरह खड़ी रही.

नीरज की लोकप्रियता कुछ अलग किस्म की थी. उन्होंने लंबी-लंबी गीतात्मक कविताएं लिखीं. इन कविताओं में एक कहानी होती थी, एक खत होता था, एक याद होती थी. इन कविताओं में बचपन होता था, यौवन का प्रेम और विछोह का दुख होता था. सैनिकों के नाम पाती होती थी. यानी विषय की दृष्टि से नीरज ने भारतीय श्रोता के हर आयाम पर अपनी उपस्थिति दर्ज की. ये कविताएं भारत के आम कस्बाई इंसान का पूरा भाव-जगत अपने में समेटे होती थीं. नीरज की लोकप्रियता के रहस्य की विवेचना की जानी चाहिए. वह यों ही छोड़ दी जाने वाली चीज नहीं है.

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अब भारत बदल गया है. न वे कस्बे रहे. न परदा लगे रिक्शों पर कॉलेज की ओर जाती नायिकाएं रहीं, न साइकिलों से दूर शहर नापते रोमांस के सपने रहे. नीरज भारत के उदास-धूसर शहरों के रोमांस के कवि थे. उन कविताओं में देश में घुटता हुआ युवाओं का आंतरिक जीवन था, उनका मन था, उनके अधूरे रह जाते हुए प्रेम और हताश हो जाते व्यक्तित्व थे. हां, नीरज के पास कोई इलाज न था, दवाई न थी. वे उदासी की लोरी और रागिनी बांटते थे, जो अपने सुनने वालों को कहीं गहरे तक डुबो ले जाती थी. नीरज की लोकप्रियता उनके किसी सस्तेपन में नहीं, हिंदुस्तानी जिंदगी की उस मध्यवर्गीय तह में थी, जो उनके शब्द शब्द में रच बस गई थी. वे यथास्थिति के कवि थे, परिवर्तन के विचार और वास्तविक दार्शनिकता का कोई आधार उनके पास नहीं था. पर आजादी के बाद के उदास भारत की एक कहानी उनके पास थी. उसी दास्तां को उन्होंने तरह-तरह से कहा. खत बनाकर उसे ही लिखा. फकीराना मस्ती में उसे ही गाया.

फिर लोग नीरज को भूल गए. फिल्मों में भी और मंचों पर भी. हालांकि वे दूरदर्शन के कवि-सम्मेलनों में और दूर-दराज के शहरों में 1980 के बाद भी लगातार बुलाए जाते रहे. पर वह भारत खत्म हो गया था, जिसके वे कवि थे. वे दो-तीन पीढ़ियां अपना जीवन जी कर जा चुकी थीं, या घरों के उदास कोनों में सिमट गई थीं. नीरज वही थे, मगर जमाना वो न था. उनकी पहचान लगभग खत्म सी हो गई थी. बेशक कुछ लोग उन्हें जानते थे, साहित्यिक समाज के सभी स्तरों में लोग उनके नाम से वाकिफ थे. उनकी किताबें भी यदाकदा बिकती ही थीं, और किसी रात के सन्नाटे में उनका कोई मर्मस्पर्शी गीत गूंज ही उठता था. पर उनका स्टारडम, उनका नायक होना गुजरे समय की बात था. यह भी जानने की बात हो सकती है कि बाद के बीस-तीस सालों के इस लगभग एकांत को उन्होंने किस तरह लिया-जिया.

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नीरज इटावा के थे. चंबल के पास बसा यह वही शहर है जिसके सीमांतों से बीहड़ शुरू हो जाते हैं. कैशोर्य उनका कानपुर में बीता. अरसा उन्होंने मुंबई में गुजारा. बाद की लगभग आधी सदी अलीगढ़ में. उनके बारे में ढेर किस्से हैं. अब वे किस्से भी खो रहे हैं. उनकी प्रेम-कहानियां हैं. उनका युग और उनकी जिंदगी के कई पहलू हैं. कोई संवेदनशील फिल्मकार उनकी जिंदगी पर बेहतरीन फिल्म बना सकता है. 

निजी तौर पर मुझे नीरज के मिजाज और व्यक्तित्व की एक सीमा लगती है. वह यह कि फिल्म और मंच से उनका नाता कम होता चला गया, कविता लिखना भी कम हो गया. उनकी सारी लोकप्रिय और अच्छी कविताएं वे हैं जो उन्होंने बीस बरस की उम्र से लेकर 45-50 की वय तक लिखी थीं. वे मूलतः किशोर संवेदना के कवि थे. बाद की परिपक्व उम्र में वे साहित्य की अन्य विधाओं की ओर मुड़ सकते थे, कम से कम एक बड़ी आत्मकथा की ओर तो उन्हें जरूर मुड़ना चाहिए था. क्या वे अपने रचना-संसार से संतुष्ट थे? क्या प्रेम-रोमांस-फकीरी के अपने बुने शब्द-संसार को वे अपनी रचनाशीलता का चरम समझते थे?

नीरज को हिंदी काव्य-संसार और साहित्य में लोकप्रियता के एक खांचे में डालकर निपटा दिया गया है. यह बहुत उचित स्थिति नहीं है. वे उन कवियों में थे, जिन्होंने हिंदी की अच्छी कविता को व्यापक पाठक समाज तक पहुंचाने की एक राह  बनाई थी और सबसे बढ़कर उनकी कविताओं का विश्लेषण कर हम उस युग, उस समाज उस जीवन तक पहुंच सकते हैं, जिसमें वह बहुतायत की पसंद होती थी. ऐसा हर कवि के साथ नहीं होता, कि आप उसे समाज-विश्लेषणात्मक नजरिए से उपयोग कर सकें. नीरज का यह उपयोग किया जा सकता है.

(आलोक श्रीवास्तव सुपरिचित कवि और लेखक हैं)

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