Valentine's Day : डर के आगे प्यार है...

हमारे समाज में प्रेम को ऐसा वर्जित कार्य बना दिया गया है कि यह किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होता है.

Valentine's Day : डर के आगे प्यार है...

एक लड़के के पास किसी का फोन आता है. फोन करने वाला लड़के से बोलता है कि वह उसके दोस्त का दोस्त बोल रहा है और उसे पता चला है कि वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ वेलेंटाइन डे मनाने वाला है. पहले पहल तो लड़का हिचकिचाता है, फिर थोड़ी बातचीत के बाद खुल जाता है और कहता है कि उसने अपनी गर्लफ्रेंड के लिए एक सरप्राइज पार्टी प्लान की है. वह अपनी दोस्त को कनॉटप्लेस के किसी बढ़िया से रेस्त्रां में लंच करवाएगा और उसके लिए कुछ फैंसी गिफ्ट भी लेने वाला है. तभी फोन करने वाला उसे बताता है कि मेरा एक दोस्त है वह भी वेलेंटाइन-डे में काफी दिलचस्पी रखता है. यह कहते हुए फोन करने वाला अपने दूसरे दोस्त को कॉन्फ्रेंस में लेता है. पता चलता है कि वह भी वेलेंटाइन डे की तैयारी कर रहा है. फोन करने वाला पूछता है कि उसने क्या तैयारी कर ली है. तो दूसरी तरफ से आवाज आती है कि बस तीन-चार हॉकियां, पांच-छह चेने और काला रंग ले लिया है और... पहले जिस लड़के को फोन लगाया गया था उसका फोन कट जाता है. फोन करने वाला हंसता है. यह सबकुछ रेडियो के मशहूर प्रैंक शो का हिस्सा है.

भले ही यह बात यहां एक हंसी-मजाक की तरह लगती है लेकिन इस बात के पीछे एक बात और भी है. वह है डर, जिसका फायदा उठाया जाता है. जैसे ही वैलेंटाइन डे आता है तो तीन तरह के लोग सक्रिय हो जाते हैं. प्यार में लिप्त जोड़े, इन जोड़ों के जरिये अपना करियर चमकाने की जद्दोजहद में लगे कट्टरपंथी और इन दोनों को सामान उपलब्ध करवाने वाला बाजार.

दरअसल त्याग के दर्शन पर टिके हमारे देश की संस्कृति को बचाने वाला तथाकथित तबका बीते कुछ सालों से तेजी से आगे बढ़ा है. यह वह तबका है जिसे लगता है कि देश की संस्कृति इतनी क्षणभंगुर है कि वह किसी के जरा से कुछ अलग करने पर भरभरा कर ढह जाएगी. आज से कई साल पहले भोपाल के एक नामी गर्ल्स कॉन्वेंट स्कूल में इन कथित संस्कृति के रक्षकों ने हमला बोल दिया था. वजह थी कि इन संस्कारियों को स्कूल की बालिकाओं की यूनिफॉर्म की स्कर्ट से कुछ आपत्ति थी. यह स्कूल अपने नियमों और दाखिले को लेकर काफी सख्त माना जाता है. यहां तक कि कोई स्कूल के दरवाजे के पास भी नहीं फटक सकता है. ऐसे में जब स्कूल पर संस्कारियों ने हमला बोला तो कई लोग स्कूल के अंदर दाखिल हुए. कुछ दरवाजा फांदकर, कुछ दरवाजा खोलकर. इस तरह इन रक्षकों ने काफी समय से मन में बसी अपनी हसरतों को पूरा कर लिया और जिस स्कूल की लड़कियों की खूबसूरती के चर्चे सुनकर उन्होंने अपनी कल्पनाओं की इमारत को बुलंद किया था उस स्कूल की इमारत में प्रवेश करके अपनी संस्कारी इच्छाओं को पूरा कर लिया था.

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यही रक्षक हर साल देश के कोने-कोने में बिखर जाते हैं और गुट बनाकर नवयुगलों को पकड़कर उन्हें बेइज्जत करते है. लेकिन उन्हें ऐसा करने की हिम्मत कहां से मिलती है जबकि पुलिस से लेकर प्रशासन (रोमियो स्कवॉड को छोड़कर) तक सभी प्रेमियों का समर्थन करते हैं. दरअसल उनकी इस हिम्मत के पीछे प्रेमियों का डर है. हमारे समाज में प्रेम को ऐसा वर्जित कार्य बना दिया गया है कि यह किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होता है. जिस समाज में पति अगर अपनी पत्नी से सार्वजनिक तौर पर प्यार का इजहार कर दे या उसका समर्थन कर दे तो उसके परिवार की त्योरियां चढ़ जाती हैं. जहां वो अपनी बीमार पत्नी के सिर पर हाथ फेर ले या उसके माथे को भी चूम ले तो इसे उसका आधुनिक होना या बेशर्म होना करार कर दिया जाता है. समाज शादी तो करवाने पर जोर देता है लेकिन प्यार का इजहार उसे हमेशा, हर रूप में नागवार गुजरता है. ऐसे में अगर कोई बगैर शादी के किसी रिश्ते में बंधता है तो सोचिए समाज पर क्या बीतेगी.

अपनी आत्मकथा ‘क्या भूलू क्या याद करूं’ में हरिवंशराय बच्चन अपनी पहली पत्नी के साथ के अपने एक वाकये का जिक्र करते हुए बताते हैं कि किस तरह उनकी पत्नी श्यामा जब बीमार हुईं तो वो उनका सानिध्य चाहती थीं और हरिवंशराय बच्चन भी चाहते थे कि वो अपनी पत्नी के साथ वक्त बिताएं, लेकिन सबके दिमाग में यह चल रहा था कि इस हालत में भी वह अपनी पत्नी को नहीं छोड़ रहा है, थोड़ी सी भी लोक-लाज नहीं है. आखिर इन सारी बातों को धता बताते हुए बच्चन साहब ने अपनी पत्नी के साथ वक्त बिताने का फैसला अपने परिवार को सुना दिया और थोड़ी देर असहज होने के बाद सारी बातें सामान्य हो गईं. अगर सामान्य नहीं भी हुई होतीं तो भी गलत नहीं थीं. शायद उसी दौर को ध्यान में रखकर उन्होंने लिखा होगा...

 

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी.
तारिकाऐं ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी.
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा.
रात आधी खींचकर मेरी हथेली
एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने.

 

अगर हरिवंश राय बच्चन, उस वक्त डर जाते तो शायद अपनी पत्नी को वह सुख नहीं दे पाते जिसकी वो हकदार थीं. चूंकि समाज के हिसाब से प्यार करना हमेशा से ही वर्जित रहा है ऐसे में प्रेमियों के मन में एक डर है जो उन्हें दूसरों को अपने पर हावी होने देता है.

बीते दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक लड़का दौड़ता हुआ पार्क में घुसता है और चिल्लाता जाता है कि वो लोग आ रहे हैं. 'सेना' के लोग आ रहे हैं. वो जहां जहां ये बोलता हुआ भाग रहा था वहां जोड़ों में भगदड़ मच रही थी. अहम बात यह थी कि इसमें कई जोड़े तो शादीशुदा भी थे. लेकिन वो भी भाग रहे थे क्योंकि उन्हें डर था.

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कॉलेज के दिनों की बात है, साइंस प्रोजेक्ट की तारीख और वैलेंटाइन का वक्त लगभग आसपास था. हम छह-सात लोगों का समूह था जिसमें चार लड़कियां और बाकी लड़के थे. भोपाल शहर के बड़े तालाब से हमें जलकुंभी कलेक्ट करनी थी. अब सबको यही लग रहा था कि हम कैसे जाएं क्योंकि बड़ा तालाब प्रेमियों के वक्त बिताने का ठिया था. और 'सेना' भी पूरी तरह चौकन्नी होकर ऐसे इलाकों पर गश्त दे रही थी. खास बात यह है कि मेरी एक दोस्त के पिताजी पुलिस में अधिकारी के पद पर थे. फिर भी हम डर रहे थे. फिर हमने सोचा कि आखिर हम डर क्यों रहे हैं. हालांकि सच तो यह है कि लड़कियों के साथ में होने की वजह से मन में डर तो था. फिर हम तालाब पहुंचे और अपने प्रोजेक्ट के काम में लग गए. हम बैठे बतिया ही रहे थे कि तभी बाइक पर कुछ लोग जिनकी उम्र हमारे जितनी ही रही होगी, वहां पहुंच गए और वही किया जो करते हैं. थोड़ी बदतमीज़ी, गाली-गलौज वगैरह वगैरह. एक शख्स ने बोला- ले चलो इन्हें थाने, यहां बैठे अय्याशियां चल रही हैं. हमने कहा- एक काम करो थाने चलो. और थाने जाने से हमें कोई डर ही नहीं था. अपना पत्ता गिरता हुआ देख उनमें से एक बोला - हां जब वहां इनके मां-बाप को मालूम चलेगा कि कॉलेज के बहाने क्या चल रहा है तब अकल ठिकाने आएगी. हमने कहां - मां-बाप को भी बुला लिया जाए. मेरा एक दोस्त बोल पड़ा - और तुम लोग भी अपने मां-बाप को बुला लेना उन्हें भी पता चलना चाहिए. ऐसा सुनने के बाद वो लोग थोड़ी बहुत धमकी देकर निकल लिए. उस दिन एक बात समझ में आई कि यह जो लोक-लाज की चिंता होती है, दरअसल यह हमारा सबसे बड़ा भय है और इसी भय से भयानक लोग सिर उठाते हैं. हाथ में लट्ठ लिए जो ये संस्कारी सेना के लोग घूम रहे हैं ये हिम्मती नहीं है. ये उन्मादी हैं. इनमें से कुछ इस तरह से अपनी राजनीति चमका रहे हैं तो कुछ अपने दूसरे मकसद हल कर रहे होते हैं. और बाजार दोनों को उनकी मर्जी का सामान उपलब्ध करवाता है.

जिस दिन प्रेम करने वालों ने प्रेम को सहज मान लिया, उस दिन इन तथाकथित सेनाओं के हौसले अपने आप पस्त हो जाएंगे. और देश की संस्कृति को बचाने निकले इन रणबांकुरों को मालुम चल जाएगा कि जब जब प्यार पर पहरा हुआ है प्यार और भी गहरा हुआ है.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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