मानुषी छिल्लर : 'खूबसूरत' सेल्फी के लिए उत्साहित लोग, अपनी सोच को भी खूबसूरत बना लें तो...

मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर लंदन के लिए रवाना हो गई हैं. हरियाणा की यह बेटी कन्या भ्रूणहत्या के लिए बदनाम अपने राज्य को दुनिया में नई पहचान दिलाएगी. दूसरी ओर देश में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के बड़े नारों के बीच कड़वी हकीकत ये है कि आज भी हमारे देश की ‘पढ़ी-लिखी’ बेटियां समान व्यवहार से लेकर समान वेतनमान के लिये संघर्षरत हैं.

मानुषी छिल्लर : 'खूबसूरत' सेल्फी के लिए उत्साहित लोग, अपनी सोच को भी खूबसूरत बना लें तो...

मानुषी छिल्लर का नाम आज हर किसी की जुबां पर है. दुनिया के 118 देशों की सुंदरियों को पीछे छोड़कर भारत का नाम जो रोशन किया है. गौरवान्वित लोगों की दीवानगी सोशल मीडिया पर लाखों में पहुंच चुकी है. दुनियाभर से बधाइयां मिल रही हैं. 30 नवंबर को प्रधानमंत्री ने पूरे परिवार से मुलाकात कर प्रोत्साहित किया. दिसंबर की पहली तारीख को राज्य के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने सम्मान किया. अब वे लंदन के लिए रवाना हो गई हैं. अगले एक साल मिस वर्ल्ड की टीम के साथ वे सातों महाद्वीपों की यात्रा करेंगी.
 
हरियाणा की बेटी कन्या भ्रूणहत्या के लिए बदनाम अपने राज्य को दुनिया में नई पहचान दिलाएगी. वैश्विक परिदृश्य में भारत की साख बढ़ाने का काम करेंगी. भारतीय अनुभवों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा करेंगी. आधी दुनिया के सम्मान को बढ़ाने की हर कोशिश में, वे आगे नज़र आएंगी. जब जब मानुषी छिल्लर दुनिया के मंच पर दिखेंगी उनका जवाब प्रासंगिक बना रहेगा, जो उन्होंने चीन के सान्या शहर एरीना में 19 नवंबर को दिया था.
 
मिस वर्ल्ड की ज्यूरी ने पूछा था, ‘किस प्रोफेशन को सबसे ज़्यादा सैलेरी मिलनी चाहिए और क्यों?' मानुषी का जवाब था सैलरी का मतलब रुपयों से कम, सम्मान से ज्यादा होता है और ये सम्मान सबसे ज्यादा ‘मां’ को मिलना चाहिए. मानुषी ने मिस वर्ल्ड के मंच से जो संदेश देने की कोशिश की, क्या हमारा देश सचमुच उस पर गौर कर रहा है? मां के ज़रिये समूची महिला बिरादरी के स्वाभिमान का जो मुद्दा मानुषी ने उठाया है क्या हम वाकई उस पर आगे बढ़ेंगे? 'मां' की जगह मर्दों की गालियों से निकलकर उनकी आंखों में सम्मान बढ़ा पाएगी?
 
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के बड़े नारों के बीच कड़वी हकीकत ये है कि आज भी हमारे देश की ‘पढ़ी लिखी’ बेटियां समान व्यवहार से लेकर समान वेतनमान के लिये संघर्षरत हैं. भारत ही क्यों दुनियाभर के देशों में काबिल महिलाओं को न उचित सम्मान मिला है न ही समान काम करने के बाद भी पुरुष सहकर्मियों के बराबर पगार. लगभग 60 सालों की लंबी लड़ाई के बाद ब्रिटेन में 2013 से ‘Equality Act 2010’’ नामक कानून अस्तित्व में आया. स्विटजरलैंड स्थित विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2016 के मुताबिक 144 देशों की सूची में भारत निराशाजनक 87 वें पायदान पर है.
 
समान वेतनमान की बात छोड़ दें, तो जिस सम्मान की चर्चा मानुषी ने छेड़ी है वहां भी हम फिसड्डी हैं. भारतीय संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक एक हज़ार से ज़्यादा पीएसयू में महिला डायरेक्टर के पद खाली हैं. 11 अक्टूबर, 2017 तक NSE में सूचीबद्ध 38 प्रतिशत कंपनियों में एक भी स्वतंत्र महिला निदेशक नहीं है. 1670 में से 637 कंपनियों को एक स्वतंत्र महिला निदेशक की नियुक्ति करने की जरूरत है. 4 जुलाई 2017 को सेबी के चेयरमौन अजय त्यागी ने कहा था 20 प्रतिशत सरकारी कंपनियों में एक भी महिला निदेशक नहीं है. जबकि भारत सरकार ने कानून  बनाकर हर कंपनी में एक महिला डायरेक्टर की नियुक्ति अनिवार्य की है.
 
मानुषी ने अपनी मां के जरिये पूरी दुनिया की महिलाओं की पीड़ा को उजागर किया है. हालांकि इस मुद्दे पर बहस यूनाइटेड नेशन से लेकर विश्व के दूसरे मंचों पर जारी है. दुनिया की बात छोड़ दें तो भारत में 'नई महिला नीति' का जारी नहीं होना चिंता का विषय है. एक साल पहले बने ड्राफ्ट को लागू करने के लिए सरकार को प्रबल इच्छाशक्ति से पुरुष प्रधान प्रशासनिक आन्तरिक प्रतिरोध को निरस्त करना होगा.
 
हालांकि मौजूदा प्रधानमंत्री अपने भाषणों से लेकर नीतियों में महिलाओं के वर्चस्व को बनाए रखते हैं. लेकिन सिर्फ उज्जवला के रिकॉर्ड से आधी आबादी को खुश नहीं किया जा सकता. अति निम्नवर्गीय महिलाओं को फायदा देकर खुश सरकार को उज्जवला योजना से आगे बढकर निम्न, निम्न-मध्यम वर्ग की आधी आबादी की समावेशी उर्जा को साधने पर ध्यान हो, अभी ऐसा दिखता नहीं है.

दरअसल कानून बनाने से लेकर उन्हें लागू करने वालों में अधिकांश प्रतिशत पुरुषों का है. अमूमन पुरुष सहकर्मी को अपनी महिला कर्मचारी में एक व्यक्ति कम, उसकी कद-काठी ज्यादा प्रभावित करती है. जबकि हकीकत ये है कि परिवार, समाज, नियोक्ता जब महिला को अधिक समावेशित करता है तो परिणाम कई गुणा ज्यादा सकारात्मक आते हैं.

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ये जरूरी नहीं हर महिला दफ्तर में काम करने के काबिल हो, ठीक उसी तरह जैसे हर पुरुष नहीं होता. जिस तरह होनहार महिलाएं स्वेच्छा से कामकाजी नहीं होने का फैसला लेती हैं पुरुष भी उतने ही स्वतंत्र होने चाहिए. लेकिन हमारा समाज हर पुरुष से कामकाजी होने की उम्मीद करता है और हर महिला पर संस्कारी बनने का दबाव डालता है. इस विरोधाभास के कारण घर से लेकर दफ्तर तक कुंठाएं बढ़ती हैं.
 
भले ही बेटे की जगह बेटी या बहू काबिल हो, भले ही बेटी में काम करने की उत्कंठा बेटे या दामाद से ज्यादा हो, भारतीय समाज की मानसिकता ऐसी है कि वह बेटे और दामाद को ही 'बड़े आदमी' के रूप में देखना चाहता है. हमारा समाज खुले मन से महिला को “हाउस वाइफ” के रूप में स्वीकार करता है तो पुरुषों को 'हाउस मेन' क्यों नहीं मानना चाहता? जिस तरह कुछ महिलाओं के मन में खुद को साबित करने की स्वाभाविक इच्छा होती है ठीक उसी तरह कुछ पुरुष स्वाभाविक रूप से ही खुद को उस भागदौड़ से दूर रखना चाहते हैं. लेकिन हमारा समाज ये स्वीकार करने की बजाय उन्हें तौलने पर उतारू हो जाता है. यह बड़ा कारण है जिसकी वजह से आज भी काबिल लड़कियों को उनकी योग्यता के मुताबिक पढ़ाया नहीं जाता.

देशभर के सरकारी स्कूल के आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो वहां लड़कों की संख्या कम हो रही है और लड़कियों की बढ़ रही है. इसका एक कारण यह है कि लड़कियों की शिक्षा को लेकर जागरुकता आई है. दूसरा कारण ये भी कि माता-पिता अपने बेटों को प्राइवेट स्कूल भेज रहे हैं और लड़कियों को सरकारी.

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यानी सरकारी योजनाओं की ऑक्सीजन के सहारे ही बेटियों को आगे बढ़ाया जाएगा. मानुषी छिल्लर ने अपनी मां का कद बढ़ाया, क्योंकि उसने देखा कि भले ही मां दिल्ली के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड स्टडीज़ (IHBHAS) में न्यूरो केमिस्ट्री डिपार्डमेंट की प्रमुख हो, उसने घर की ज़िम्मेदारी भी उतनी ही प्रमुखता से निभाई. ये उम्मीद परिवार ने उनके पिता से उतनी कभी नहीं की. जैसा कि हर घर में होता है. लेकिन मानुषी के पिता का मानना है कि पुरुषों को भी ये जिम्मेदारी लेनी होगी. इसीलिए उन्होंने अपने बच्चों को वैसे संस्कार दिए. घर के सभी बाथरूम साफ करने की जिम्मेदारी खुद ली.

manushi chhillar
मानुषी छिल्लर ने मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में 118 देशों की प्रतिभागियो को पीछे छोड़ा (फाइल फोटो)

 निश्चित ही मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले सवालों को लेकर मानुषी ने काफी तैयारी की थी. फाइनल से पहले सवाल-जवाब के कई राउंड हुए जहां उन्हें बताया गया कि कौन-से सवाल का क्या जवाब देना है. लेकिन जिस जवाब ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ किया वह उनके दिल से निकला था. कार्डयिक सर्जन बनने का सपना देख रही मानुषी एक बेहद समझदार नौजवान है. लेकिन लाखों नौजवानों के लिए वे सिर्फ एक खूबसूरत या सेक्सी लड़की है. जब तक हमारी नई पीढ़ी इस फर्क को नहीं मिटाएगी हमारी सरकारें भी पुराने ढर्रे पर चलती रहेंगी.
 
ये सही है कि मानुषी छिल्लर को आज दुनिया इसलिए जानती है कि वह सबसे खूबसूरत दिखने वाली महिला के खिताब से नवाजी गई हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार अब अपने कॉस्मेटिक उत्पादों का टर्नओवर उनके जरिये बढ़ाएंगें. लेकिन दुर्भाग्य ये है कि कुछ दिन बाद हम ये चर्चा करते नजर आएंगे कि वे किसके साथ कैसे कपड़े पहनकर बैठी हैं.

याद होगा आपको प्रियंका चोपड़ा की जर्मनी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाकात के बाद मचा बवाल. वे 17 साल पहले भारत की मिस वर्ल्ड बनकर ऐसे ही वाहवाही बटोर रहीं थी. लेकिन 30 मई, 2017 को सोशल मीडिया ने उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया क्योंकि उनकी ड्रेस में घुटने दिख रहे थे. उस वक्त ये किसी को याद नहीं रहा कि प्रियंका चोपड़ा हॉलीवुड में डेब्यू करने वाली चुनिंदा भारतीय कलाकारों में से एक हैं. 34 साल की उम्र में उन्हें मिली ये सफलता चर्चा का विषय होनी चाहिए थी, लेकिन ट्रोलिंग हुई उनके पहनावे के लिए.
 
ये भी एक संयोग है कि प्रियंका और मानुषी दोनों हरियाणा से आती हैं. हरियाणा और राजस्थान दोनों प्रदेश, बेटियों की घटती संख्या के कारण बदनाम रहे हैं. लेकिन मानुषी के नाना चन्द्रसिंह शेहरावत ने इन्हीं दोनों राज्यों में रहते हुए सत्तर के दशक में अपनी तीन बेटियों को बेहतरीन शिक्षा दिलाई. राजस्थान सरकार में सिविल इंजीनियर के पद पर काम करने वाले इस जाट पिता ने बेटियों को पढ़ने के लिए अजमेर के सोफिया स्कूल में भेजा. उनकी सबसे बड़ी बेटी डॉ. नीलम छिल्लर है जो मानुषी छिल्लर की मां हैं. तीन भाई-बहनों में मानुषी दूसरे नंबर पर हैं. बड़ी बहन नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटियाला से कानून की पढ़ाई कर रही हैं. छोटा भाई डालमित्र, दिल्ली के सैंट कालंबस स्कूल में नौंवी क्लास में पढ़ रहा है.
 
दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल से दसवीं में टॉपर और सीनियर हायर सेकंडरी में सीबीएससी की ऑल इंडिया इंग्लिश विषय की टॉपर रही मानुषी, पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहीं. 2015 में पहले ही प्रयास में मेडिकल में चयन हुआ. सोनीपत के भगत फूल सिंह मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया और वहीं से शुरू हुआ मिस वर्ल्ड बनने का शानदार सफर.

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डीआरडीओ में जाइंट डायरेक्टर मानुषी के पिता डॉ. मित्रबासु छिल्लर कहते हैं, ‘अक्सर मेडिकल में एडमिशन के बाद करियर के प्रति निश्चिंतता आ जाती है लेकिन मानुषी ने एमबीबीएस के पहले साल में विश्वविद्यालय में शानदार नतीजे दिए और अपनी पढ़ाई के साथ साथ मिस इंडिया बनने का सपना देखा.' इस सपने की नींव उन्होंने अपने मन में बहुत पहले रख ली थी. यही वजह है कि पिछले दस सालों में वे कभी रेस्टोरेंट में खाने नहीं गईं. ये मुमकिन हुआ, क्योंकि माता-पिता ने अपने तीनों बच्चों को जिम्मेदार व्यवहार की तालीम दी. अनुशासनपूर्ण जीवनशैली की चमक पूरे परिवार की फिटनेस में झलकती है.
 
अमूमन मेडिकल कॉलेज में मोटे चश्मों में दिखने वाले पढ़ाकू विद्यार्थियों में से एक मानुषी वहां भी सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती थी. योग, जिम की नियमितता बनाए रखी और डाइट का विशेष ध्यान रखा. 2016 में दिल्ली के एम्स में इंटर मेडिकल कालेज में मिस “कैंपस प्रिसेंस” चुनी गई. फिर मिस इंडिया के लिये हरियाणा का प्रतिनिधित्व किया. मिस इंडिया बनी और फिर नवंबर 2017 में पूरी दुनिया बदल गई.
 
कहने को मॉडलिंग और ग्लैमर की दुनिया सम्मान से नहीं देखी जाती. मेडिकल की पढ़ाई बीच में छोड़कर इस दुनिया का रुख करना इतना स्वागतयोग्य नहीं था जितना आज देश दुनिया कर रही है. आज हर कोई मानुषी के परिवार से मिलने को उत्साहित है. लोग जानना चाहते हैं कैसे उन्होंने अपनी बेटी को यहां तक पहुंचाया. मानुषी की मां डॉ. नीलम छिल्लर कहती हैं, 'कितने भाग्यशाली होते हैं वह माता-पिता जिनके बच्चे कुछ नया करने की चाहत रखते हैं.' लेकिन कितने अभिभावक हैं जो अपने बच्चों को दिल से वह करने की छूट देते हैं जो वह करना चाहते हैं?
 
मानुषी के माता-पिता ने न सिर्फ अपने बच्चों को बेहतर परवरिश दी, बल्कि ग्लैमर और फैशन की दुनिया में प्रतिभावान बेटी को भेजकर 1966 के इतिहास को दोहराया है. ये भी एक सुखद संयोग है कि पचास साल पहले 1966 में मिस वर्ल्ड का खिताब पहली बार मिस इंडिया, रीता फारिया को मिला था जो पेशे से एक डॉक्टर थीं. मिस वर्ल्ड के सोलहवें एडिशन में विजेता बननी वाली वे पहली एशियन महिला थीं जो उस वक्त मेडिकल फाइनल की स्टूडेंट थीं. रीता फारिया से लेकर मानुषी छिल्लर तक देश ने बहुत प्रगति की, लेकिन मिस वर्ल्ड के मुकुट जैसी चमक मेडिकल में योगदान देने वालों को उतनी कभी नहीं मिली. ये बात खुद प्रधानमंत्री ने मुलाकात के दौरान स्वीकार की और मानुषी को मेडीसिन के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रोत्साहित किया.

परिवार से लेकर देश और दुनिया की उम्मीदों को पूरा करना 20 वर्षीय युवती के लिए बड़ी चुनौती है. देश की बेटी के साथ सेल्फी के लिए उत्साहित लोग अपनी तस्वीर के साथ-साथ सोच भी मानुषी के जैसी खूबसूरत बनाएं. भारत की बेटी को ये सबसे बड़ा रिटर्न गिफ्ट होगा.

(डॉ. मीना शर्मा Zee News में एंकर हैं.)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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