राजनीतिक अनिश्चितताओं का साल रहा 2017...

कांग्रेस के लिए यह कोई विशेष हर्ष का साल तो नहीं रहा, लेकिन साल के अंत में उसको कुछ राहत ज़रूर मिली और पार्टी भाजपा के समक्ष एक मज़बूत विपक्ष के रूप में उभरने में कुछ हद तक सफ़ल भी रही. 

राजनीतिक अनिश्चितताओं का साल रहा 2017...

भारतीय राजनीतिक इतिहास में साल 2017 बड़ा ही विशेष माना जाएगा, क्योंकि इस साल हुई अप्रत्याशित घटनाओं ने राजनीति के सभी जानकारों को पूरी तरह से आश्चर्य में डाल दिया और उनको अपने मौजूदा ज्ञान को दोबारा खंगालने पर मजबूर कर दिया, क्योंकि उनके द्वारा की गई लगभग सभी भविष्यवाणी ग़लत साबित हुईं. राजनीतिक दलों के लिए यह साल खुशियां और गम के साथ-साथ बहुत महत्वपूर्ण संदेश भी लाया, जिससे आने वाले समय में उनका भविष्य तय होने वाला है.

भाजपा के लिए तो यह साल किसी भी सुंदर सपने से कम नहीं रहा. पार्टी ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश में लंबे समय बाद प्रचंड बहुमत से सत्ता हासिल की, बल्कि पूर्वोत्तर में अपने विस्तार की योजनाओं में भी बड़ी सफलता प्राप्त करते हुए पहली बार मणिपुर में भगवा सरकार बनाई. अपनी 'हिंदी-हिन्दू' वाली तथाकथित छवि को तोड़ते हुए पार्टी का मणिपुर में सरकार बनाना उसके लिए पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी सरकार बनाने के उसके प्रयासों में सहायक होगा, विशेषकर त्रिपुरा में, जहां दो दशक से वामपंथी दलों की सरकार है और जहां अगले साल चुनाव भी है. उत्तराखंड में जहां भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करके अपने 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के सपने को एक कदम आगे बढ़ाया, वहीं गोवा में कांग्रेस से कम संख्या में विधायक होने के बावजूद वैधानिक रूप से गठबंधन सरकार बनाना अमित शाह की राजनीतिक चतुरता का एक बहुत बड़ा उदाहरण बना. देश के सबसे बड़े पद पर किसी संघ की विचारधारा के व्यक्ति को पदासीन करने का संघ और भाजपा का बरसों पुराना सपना भी इस साल पूरा हुआ जब भारत के 14वें राष्ट्रपति के रूप में भाजपा नेता रामनाथ कोविंद रायसीना हिल्स (राष्ट्रपति भवन) पहुंचे. दलित समुदाय से आने वाले बिहार के पूर्व राज्यपाल कोविंद को नामांकित करके भाजपा ने दलितों में यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी दलित महत्वकांषाओं को समझते हुए उसका उचित सम्मान करने को तैयार है और पूर्व भाजपा अध्यक्ष वेंकैया नायडू को उपराष्ट्रपति चुनाव में मिली जीत ने पार्टी के लिए राज्यसभा में सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए राह थोड़ी आसान कर दी (उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति भी होता है), जहां मौजदा सरकार के पास बहुमत नहीं है और जहां समय-समय पर सरकार को कई विधेयकों को पारित कराने के लिए भारी मशक्कत का सामना करना पड़ा है. 

पढ़ें- कांग्रेस-भाजपा के लिए आत्ममंथन का संदेश देता गुजरात विधानसभा चुनाव परिणाम

साल के बीच में उसको बहुत बड़ी सफलता बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजग (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) में 'घर-वापसी' के रूप में मिली. जिस बिहार में भाजपा को 2015 में लालू-नीतीश और कांग्रेस के महागठबंधन के हाथों हार का सामना करना पड़ा था, उसी बिहार में दो साल के अंदर ही उसको नीतीश के साथ मिलकर सरकार बनाने का मौका मिला. और ये वही नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने 2013 में भाजपा के साथ अपने दो दशक पुराने गठबंधन को भाजपा द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाने के कारण तोड़ा था. भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों से घिरे लालू यादव को छोड़कर नीतीश का राजग के कुनबे में वापस आना उन सभी लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर गया जो नरेंद्र मोदी के समक्ष विपक्ष की ओर से प्रस्तुत एक मज़बूत विकल्प के रूप में नीतीश कुमार को देख रहे थे. और साल के अंत में तमाम दिक्कतों के बावजूद पार्टी न सिर्फ़ पांचवी बार गुजरात में सरकार बनाने में सफ़ल रही बल्कि हिमाचल प्रदेश में भी पार्टी ने भगवा परचम लहराया, लेकिन गुजरात चुनाव पार्टी को यह संदेश ज़रूर दे गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में उसका जनाधार गिर रहा है जो आने वाले समय में बहुत ही घातक हो सकता है.

ये भी पढ़ें- शौचालय पर एक 'सोच'

कांग्रेस के लिए यह कोई विशेष हर्ष का साल तो नहीं रहा, लेकिन साल के अंत में उसको कुछ राहत ज़रूर मिली और पार्टी भाजपा के समक्ष एक मज़बूत विपक्ष के रूप में उभरने में कुछ हद तक सफ़ल भी रही. उत्तर प्रदेश चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करने के पार्टी के फ़ैसले ने प्रदेश में पार्टी का अस्तित्व ही लगभग खत्म कर दिया और विधानसभा चुनाव में पार्टी छोटे से 'अपना दल' से भी कम सीटें जीत सकी और उत्तराखंड में भी पार्टी का सूपड़ा साफ़ हो गया. पार्टी के लिए खुशखबरी पंजाब में सरकार बनाना रही, जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने भाजपा-अकाली दल को सत्ता से बेदखल कर दिया. गोवा और मणिपुर में जो हुआ उसने पार्टी की कार्यशैली और निर्णयशैली पर कई सवाल खड़े किए, क्योंकि दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सरकार बना सकने की स्थिति में होने के बावजूद वहां सरकार नहीं बना पाई. इसी बीच बिहार में नीतीश कुमार के द्वारा महागठबंधन को तोड़कर भाजपा के साथ गठबंधन बनाने के कारण पार्टी को बिहार की सत्ता से भी हाथ धोना पड़ा, लेकिन पूरे साल में पार्टी के लिए अगर सुकून और संतुष्टि की कोई बात रही तो वो था उसका गुजरात विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन, जहां पहली बार पार्टी सत्ताधारी भाजपा के सामने एक मज़बूत चुनौती पेश कर सकी और अपनी सीटों का विस्तार करने में भी सफल रही. यह सब हुआ भी ऐसे समय में, जब 19 साल तक अध्यक्ष रहने के बाद सोनिया गांधी ने अपने पुत्र राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंपी. भले ही राहुल की अध्यक्षता में कांग्रेस गुजरात चुनाव न जीत पाई हो, लेकिन उसका बेहतर प्रदर्शन इस बात को साफ ज़ाहिर करता है कि भाजपा भी अब उन्हें हल्के में नहीं ले सकती. फिर भी राहुल गांधी को अपनी और पार्टी की छवि में व्यापक परिवर्तन करना होगा ताकि 2019 में लोग उन्हें मोदी के विकल्प के रूप में गंभीरता से लें. 

पढ़ें- भाजपा के हर फैसले पर हाय-तौबा मचाता है ‘उपद्रव उद्योग’

जहां एक ओर भाजपा ने हिंदुत्व और विकास का संतुलन साधते हुए योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री चुनकर सबको चौंका दिया, वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी को गोवा, पंजाब, गुजरात और दिल्ली नगर निगम में मिली अप्रत्याशित हार ने सबक सिखा दिया कि राजनीति में ज़मीनी स्तर पर काम करने का कोई विकल्प नहीं होता है. अरविंद केजरीवाल को भी इतना समझ आ गया कि अभी पार्टी को अपने आप को 'कांग्रेस-भाजपा के विकल्प' के रूप में स्थापित करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ेगी और केवल मोदी को गलियां देने से राजनीतिक आधार नहीं बनेगा. जीएसटी जैसे ऐतिहासिक बिल का सर्वसम्मति से पास होना इस पूरे साल की सबसे बड़ी सफलता माना जाएगा, जिसने यह संदेश दिया कि भारतीय राजनीतिक दल देशहित के लिए एक साथ आ सकते हैं. एक प्रकार से यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक भी है और संघीय ढांचे का अंतर्गत 'को-ऑपरेटिव फेडरलिज्म' का सबसे बड़ा उदहारण भी. आशा करते हैं कि अगले साल भी भारतीय राजनीतिक दल और नेता देश-हित को सर्वोपरि रखकर काम करेंगे 2017 में मिले संदेशों को सही आकलन करेंगे.

(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज में शोधार्थी हैं.)

By continuing to use the site, you agree to the use of cookies. You can find out more by clicking this link

Close