नीरज चोपड़ा का खुलासा, एशियन गेम्स में मेडल जीतने के लिए उन पर किसका था दबाव

एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज चोपड़ा का कहना है कि ध्वजवाहक होने के चलते उनपर मेडल जीतने का दबाव था. 

नीरज चोपड़ा का खुलासा, एशियन गेम्स में मेडल जीतने के लिए उन पर किसका था दबाव
नीरज चोपड़ा जेवलीन थ्रो में एशियाई गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट हैं. (फोटो : PTI)

नई दिल्ली:  इस साल कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में लगातार दो गोल्ड मेडल जीत चुके भारत के जेवलिन थ्रो एथलीट नीरज चोपड़ा ने कहा है कि जकार्ता में देश का ध्वजवाहक होने के चलते उन पर मेडल जीतने का ज्यादा दबाव था. नीरज ने जकार्ता एशियन गेम्स में अपने 88.06 मीटर के सर्वश्रेष्ठ थ्रो के साथ गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया था. एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्होंने चेक गणराज्य में आईएएएफ कॉटिनेंटल कप में हिस्सा लिया. 

नीरज ने स्वदेश लौटने के बाद यहां स्पोर्ट्स एनेर्जी ड्रींक गेटोरेड कंपनी की ओर से आयोजित सम्मान समारोह के दौरान आईएएनएस से कहा, "सभी खिलाड़ियों का सपना होता है कि उसके देश का राष्ट्रगान विदेशों में गूंजे. मेरा भी सपना था और यह सपना तभी पूरा हुआ जब मैंने वहां अपने देश के लिए मेडल जीता. इसके साथ-साथ मैं एशियन गेम्स में अपने देश का ध्वजवाहक था और इस कारण मेरे ऊपर मेडल जीतने का ज्यादा दबाव था." 

जेवलिन थ्रो में गोल्ड जीतने वाले पहले भारतीय हैं नीरज
हरियाणा के पानीपत जिले के रहने वाले नीरज एशियन गेम्स में जेवलिन थ्रो स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट हैं. इससे पहले गुरतेज सिंह ने 1982 के एशियन गेम्स में भारत के लिए इस स्पर्धा में कांस्य मेडल जीता था.

जुनून दिलाता है सफलता
 उन्होंने कहा, "जब हम मैदान में उतरते हैं जो हमें ऐसा लगता है कि हम एक दूसरी दुनिया में आ गए हैं. ट्रेनिंग तो सभी खिलाड़ी करते हैं. लेकिन हर किसी का अपना-अपना दिन होता है. इन सब बातों के अलावा देश के लिए मेडल जीतने का एक जुनून भी होता है और यही जुनून आपको सफलता दिलाता है." 

20 साल के युवा एथलीट एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स के अलावा एशियाई चैम्पियनशिप (2017), दक्षिण एशियन गेम्स (2016) और विश्व जूनियर चैम्पियनशिप (2016) में गोल्ड मेडल अपने नाम कर चुके हैं. 

अंडर 16 का नेशनल रिकॉर्ड बनाया था
 अब तक के सफर के बारे में पूछे जाने पर नीरज ने कहा, "मैंने 2011 में यह खेल खेलना शुरू किया और इसके साल बाद ही मैंने अंडर-16 का नेशनल रिकॉर्ड कायम कर दिया था. नेशनल रिकॉर्ड बनाने के बाद मुझे राष्ट्रीय कैंप के लिए चुना गया. जब मैं पिछले दिनों को याद करता हूं तो बस यही सोचता हूं कि आज मैं जो कुछ भी हूं उसके बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था." 

15-16 किमी दूर जाना पड़ता था ट्रेनिंग के लिए
उन्होंने करियर के शुरुआती चुनौतियों को याद करते हुए कहा, "गांव में मैदान नहीं होने के कारण ट्रेनिंग के लिए मुझे 15-16 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. लेकिन इस दौरान मेरे परिवार वालों ने मेरी काफी मदद की. इन सब के अलावा मुझे खुद पर विश्वास था और मैं सच्चे मन से ट्रेनिंग करता था. आज उसी ईमानदारी की मेहनत का नतीजा है कि मैं यहां हूं." 

नीरज चेक गणराज्य के ओस्ट्रावा में हुए कॉटिनेंटल कप में मेडल जीतने से चूक गए. टूर्नामेंट में वह पहले ही राउंड में बाहर हो गए और कुल छठे स्थान पर रहे. कॉटिनेंटल कप के बारे में उन्होंने कहा, "नए नियम होने के कारण इसमें अच्छे मुकाबले देखने को मिले. यह दिमाग का खेल ज्यादा है लेकिन इससे मुझे कुछ नया सीखने को मिला है." 

यह चूक हुई थी, सुधार करूंगा
उन्होंने कहा, "पहले दो प्रयास में मैंने 80-79 मीटर का थ्रो किया और तीसरे प्रयास में 85 मीटर का किया. लेकिन तीसरा थ्रो फाउल हो गया था. इस वजह से मैं इसमें चूक गया. हालांकि मैं इन गलतियों से सीख रहा हूं और आगे इसमें सुधार करूंगा." 

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