हर साल गाड़ियों का बीमा करने की झंझट से मिलेगा छुटकारा! बन सकता है नया नियम

हाई कोर्ट की मंशा है कि लाइफ टाइम कॉम्प्रेहेंसिव प्लान लेने से गाड़ी का आजीवन बीमा कवर रहेगा और किसी भी एक्सीडेंट की हालत में पीड़ितों का बचाव एवं क्षतिपूर्ति की जा सकेगी. 

हर साल गाड़ियों का बीमा करने की झंझट से मिलेगा छुटकारा! बन सकता है नया नियम
कोर्ट ने दिया वाहनों के लाइफ टाइम कॉम्प्रेहेंसिव कवर का सुझाव

अनुराग शाह. नई दिल्ली: मद्रास हाईकोर्ट ने सुझाव दिया है कि गाड़ियों के लिए लाइफ टाइम का कॉम्प्रेहेंसिव कवर होना चाहिए. कोर्ट ने कार एक्सीडेंट से हुई मौत के एक केस में सरकार को ये राय दी है. मद्रास हाईकोर्ट ने इस पर सरकार को मोटर एंड वेहिकल एक्ट में बदलाव करने का मशविरा दिया है. फिलहाल केवल थर्ड पार्टी इंश्योरेंस कराना ही कानूनन ज़रूरी है.

अक्सर देखा जाता है कि जब गाड़ी शो रुम से निकलती है तो इंश्योरेंस से लेकर सभी चीज़ें ठीक होती हैं. लेकिन पुरानी होते ही इंश्योरेंस कवर लेना बोझ लगने लगता है. लोग अक्सर बीमा कराने से कतराते हैं. लोगों की इन्हीं आदतों को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट का सुझाव है कि गाड़ियों की लाइफ टाइम तक का कॉम्प्रेहेंसिव कवर एक साथ कराना ज़रूरी किया जाए. अगर किसी कार की लाइफ को 15 साल या 20 साल माना जाए तो थर्डपार्टी के बदले कॉम्प्रेहेंसिव कवर गाड़ी की डिलीवरी के साथ ही हो जाए. मंशा है कि इससे गाड़ी का आजीवन बीमा कवर रहेगा और किसी भी एक्सीडेंट की हालत में पीड़ितों के बचाव के लिए बीमा कवर रहेगा.

मद्रास हाईकोर्ट ने कॉम्प्रेहेंसिव कवर ज़रूरी करने के लिए मोटर एंड वेहिकल एक्ट में बदलाव की राय दी है. मौजूदा एक्ट के तहत थर्ड पार्टी इंश्योरेंस ही ज़रूरी है. पर नियमों पर सख्ती न होने से लोग थर्ड पार्टी इंश्योरेंस भी नहीं लेते. सबसे ज्यादा नॉन कंप्लायंस टू-व्हीलर्स में है. इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक पचास-साठ फीसदी 2-व्हीलर्स में खरीदारी के बाद रीन्युअल होता ही नहीं है. हालांकि लाइफ टाइम कवर को लागू करने में कुछ दिक्कतें भी हो सकती हैं. जैसे आजीवन बीमा के चलते गाड़ी खरीदना महंगा हो जाएगा. ऐसे में कॉम्प्रेहेंसिव कवर पर ज्यादा प्रीमियम देने में हिचकिचाहट होगी. साथ ही कॉम्पिटिशन बढ़ने से अगर प्रीमियम रेट घटता है तो वनटाइम पेमेंट से ग्राहकों को बाद में इसका फायदा नहीं मिल पाएगा. 

फिलहाल बीमा कंपनियां थर्ड पार्टी कवर के लिए अधिकतम 2-3 साल वाली पॉलिसी लाई हैं. विकसित देशों में ऑटो कंपनियां ही इंश्योरेंस की ट्रैकिंग के लिए चिप लगाती हैं. अगर कोई गाड़ी बिना इंश्योरेंस कवर के होती है तो ट्रैफिक और ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी को खुद ब खुद पता चल जाता है. लेकिन हमारे देश में अब भी फिजिकल चेकिंग ही होती है, जिससे अमल में मुश्किल आती है.