'आप' की नहीं, आम आदमी की जीत

भ्रष्टाचार, महंगाई, बिजली, पानी, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे के पर जिस तरह केजरीवाल की इस नई पार्टी को दिल्ली के मतदाताओं ने समर्थन दिखाया यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह 'आप' की नहीं, आम आदमी की जीत है।

नौकरशाह से सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता से राजनीतिज्ञ बने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की राजनीति में धमाकेदार इंट्री की है। आम आदमी पार्टी ने 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा चुनाव में 28 सीटें जीतकर न सिर्फ प्रदेश की राजनीति में खलबली मचा दी है बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की भी दशा और दिशा बदलने का संदेश दे रही है। 'आप' की सफलता से देश की दो बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा सकते में। आम आदमी पार्टी वाकई आम लोगों का भरोसा जितने में कामयाब रही है। लेकिन सत्ता हासिल करने में वह अभी दूर है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बिजली, पानी, शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे के पर जिस तरह केजरीवाल की इस नई पार्टी को दिल्ली के मतदाताओं ने समर्थन दिखाया यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि यह 'आप' की नहीं, आम आदमी की जीत है।

देश की जनता भ्रष्टाचार और मंहगाई से ऊब चुकी थी। जिसे खत्म करने में कांग्रेस और भाजपा नाकाम हो रही थीं। यहां तक कि दोनों पार्टियों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे थे। जनता में इसका गुस्सा सिर चढ़कर बोल रहा था। जो 2011 में अन्ना के नेतृत्व में दिल्ली में रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी बिल (लोकपाल) लाने के लिए जबरदस्त आंदोलन हुआ था। जिसका असर पूरे देश में देखा गया पर केंद्र में बैठी कांग्रेस सरकार ने इस बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया। साथ ही भाजपा भी इस बिल पर अपना कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। इससे जनता में आक्रोश बढ़ता गया। चुंकि लोकतांत्रिक देश में बदलाव सिर्फ संसद और विधानसभा के जरिए ही होता है। अन्ना आंदोलन के थिंक टैंक ने पार्टी बनाने का फैसला किया और पिछले साल अक्टूबर 2012 में केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी बनाई गई। आप ने जन सरोकार के मु्द्दे को उठाया और वोट की राजनीति में कदम रखा। हालांकि अन्ना हजारे पार्टी बनाने के खिलाफ थे और वह केजरीवाल से अलग हो गए। लेकिन टीम केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खात्मे का संकल्प को दोहराते हुए जनता के बीच जाने का फैसला किया। जिसका नतीजा दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 के लिए हुए चुनाव की वोटों की गिनती के बाद देखने को मिल रहा है।

आठ दिसंबर को आए चुनावी नतीजों में दिल्ली में 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस की सरकार का सूपड़ा साफ हो गया। जिसे 70 में सिर्फ 8 सीटों पर ही कामयाबी मिली है। खुद दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी आप के संयोजक केजरीवाल से हार गई हैं। हालांकि, आप दिल्ली में सत्ता में आती नहीं दिख रही है क्योंकि भाजपा 32 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। किसी को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। आम आदमी पार्टी की चर्चा इस लिए ज्यादा हो रही है कि एक साल पहले बनी पार्टी ने देश की सबसे बड़ी पार्टी की सरकार को पछाड़ते हुए प्रदेश की दूसरी बड़ी पार्टी बनी है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी को हराकर केजरीवाल पार्टी ने इतिहास बना दिया है। उम्मीद है कि राजधानी की जनता ने उनमें जो विश्वास जताया है, वह उस भरोसे को कायम रखेंगे। साथ ही अपनी पार्टी के जरिए भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने में कामयाब होंगे।

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