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मजदूर दिवस स्पेशल : इस दुनिया में कोई भी मजदूरी करने से अछूता नहीं है...

मजदूर वो केवल वो नहीं है जो हमारी कहानी, कविताओं, लेखो, भाषणों का किरदार होता है. मजदूर केवल वो भी नहीं है जो भाषणों में हिस्सेदार होता है. हर मेहनत करने वाला, जो जिंदगी को संवारने के लिए, उसे तराशने के लिए मेहनत करता है, वो मजदूर है. 

 मजदूर दिवस स्पेशल : इस दुनिया में कोई भी मजदूरी करने से अछूता नहीं है...

एक मई यानि मज़दूर दिवस. मजदूर यानि वो जिसकी दम पर दुनिया टिकी है. मजदूर वो केवल वो नहीं है जो हमारी कहानी, कविताओं, लेखो, भाषणों का किरदार होता है. मजदूर केवल वो भी नहीं है जो भाषणों में हिस्सेदार होता है. हर मेहनत करने वाला, जो जिंदगी को संवारने के लिए, उसे तराशने के लिए मेहनत करता है, वो मजदूर है. घर में सुबह से शाम तक खटने वाली मां भी मजदूर है और घर से निकल कर घर के लिए रोटी की जुगाड़ करने वाला शख्स भी मजदूर है. वो जो धरती के साथ मिलकर खेत बनाता है और अन्न उगाता है वो भी मजदूर है. वो जो उसे पीस कर दो वक्त की रोटी बनाता है वो भी मजदूर है. कलाकार भी मजदूर है, रचनाकार भी मजदूर है. जिंदगी को उभारने वाला लेखक भी मजदूर है और जिंदगी को संवारने वाला कवि भी मजदूर है जब ये मजदूर रामधारी सिंह दिनकर बनकर कागज पर उतरता है तो कहता है -  

 

मैं मजदूर हूं मुझे देवों की बस्ती से क्या /अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाए

अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से / मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवार
धरती को सुन्दर करने की ममता में / बीत चुका है कई पीढियां वंश हमारा 
अपने नहीं अभाव मिटा पाए जीवन भर / पर औरों के सभी अभाव मिटा सकता हूं

युगों-युगों से इन झोपडियों में रहकर भी / औरों के हित लगा हुआ हूं महल सजाने 
ऐसे ही मेरे कितने साथी भूखे रह / लगे हुए हैं औरों के हित अन्न उगाने 
इतना समय नहीं मुझको जीवन में मिलता / अपनी खातिर सुख के कुछ सामान जुटा लूं
पर मेरे हित उनका भी कर्तव्य नहीं क्या?  / मेरी बाहें जिनके भरती रहीं खजाने 
अपने घर के अन्धकार की मुझे न चिंता / मैंने तो औरों के बुझते दीप जलाए
मैं मजदूर हूं मुझे देवों की बस्ती से क्या? / अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये.

और जब यह मजदूर नागार्जुन का रूप धरता है तो वो समाज को आइना दिखाता है. कुलीन वर्ग का मुंह बिचकाऊ समाज जब इसे देखकर असहज होता है तो नागार्जुन मजदूर बन एक सवाल पूछते हैं.

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पूरी स्पीड में है ट्राम /खाती है दचके पै दचके
सटता है बदन से बदन / पसीने से लथपथ
छूती है निगाहों को / कत्थई दांतों की मोटी मुस्कान
बेतरतीब मूंछों की थिरकन /सच सच बतलाओ
घिन तो नहीं आती है? / जी तो नहीं कुढता है?
कुली मज़दूर हैं / बोझा ढोते हैं, खींचते हैं ठेला
धूल धुआं भाप से पड़ता है साबका / थके मांदे जहां तहां हो जाते हैं ढेर
सपने में भी सुनते हैं धरती की धड़कन / आकर ट्राम के अन्दर पिछले डब्बे में 
बैठ गए हैं इधर उधर तुमसे सट कर / आपस में उनकी बतकही
सच सच बतलाओ / जी तो नहीं कुढ़ता है? / घिन तो नहीं आती है?
दूध-सा धुला सादा लिबास है तुम्हारा / निकले हो शायद चौरंगी की हवा खाने
बैठना है पंखे के नीचे, अगले डिब्बे में/ ये तो बस इसी तरह लगाएंगे ठहाके,

सुरती फांकेंगे / भरे मुंह बातें करेंगे अपने देस कोस की /

सच सच बतलाओ / अखरती तो नहीं इनकी सोहबत? / जी तो नहीं कुढता है? /घिन तो नहीं आती है?

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जब ये मजदूर अदम गोंडवी बनता है तो वो सवाल नहीं करता है वो वार करता है -

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है, उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है. इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का. उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है. यही मजदूर बसंत सिंह हरचंद्र  बनकर अपने दिनभर का हाल बयान करता है.

 

दिवस भर के कड़े श्रम से चूर / सांझ को घर लौटता मजदूर /

याद कर निज झोंपड़ी की प्रीति वह भरपूर /

बाँध रखा उसे जिसने  लौटता मजदूर /

क्षुधा , चिंता , दीनता , व क्लेश /

खा गये इसका यौवन नोचकर / रह गया है शेष/

एकमात्र अध - खड़ा ध्वंसावशेष // क्षुब्ध शोषण तो / इक हथौड़ा है //रात-दिन पड़ते प्रहारों ने इसे तोड़ा है//
अपने सुख के भव्य महल का / इसकी इच्छाओं पर करके निर्माण / मिल-मालिक भगवान जी रहा है / निर्बल के खून-पसीने को बलवान पी रहा है / नादान ही रहा है अपने ही भाई पर देखो / इंसान जी रहा है //
घर पहुंच / खोल दरवाजा निज आंगन में / रुका वह खंखार कर अपना गला /
लिपट टांगों से गए आ भागे दो बच्चे / चहक जीवन से उठा फिर घोंसला /
छोड़ घर का काज भीतर से /सन- हाथों भागकर आई / सादगी की इक झलक
गृह – स्वामिनी // और फिर / भुज , भुजाओं में फंसे / बात कर दोनों हंसे / हंसी लहरी में धंसी गहरी / मालिक की बड़- बड़ / वह मिल की खड़- खड़ ।।

दुनिया के नामी गिरामी शायर भी अपने अंदाज़ में अपने जज्बात बयान करते हैं वो कहते हैं -
तू क़ादिर ओ आदिल है मगर तेरे जहाँ में// हैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात -- अल्लामा इक़बाल
सो जाता है फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर // मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाता – मुनव्वर राणा
अब उन की ख़्वाब-गाहों में कोई आवाज़ मत करना // बहुत थक हार कर फ़ुटपाथ पर मज़दूर सोए हैं -- नफ़स अम्बालवी
कुचल कुचल के न फ़ुटपाथ को चलो इतना // यहाँ पे रात को मज़दूर ख़्वाब देखते हैं ---अहमद सलमान
लोगों ने आराम किया और छुट्टी पूरी की // यकुम मई को भी मज़दूरों ने मज़दूरी की --अफ़ज़ल ख़ान

और अंत में खाकसार जो खुद भी एक मजदूर है अपने जज्बातों को कुछ यूं बयान करता है -

एक धड़ है, जिस पर टिका हुआ है एक सिर दो हाथ भी हैं / जिसे मजबूत मान लिया गया है / उसने, जो इन पर बोझ डालता है/ दो पैर भी है / जो मुड़ते नहीं है, थकते नहीं है / कांपते हैं लेकिन चलते हैं /इन सभी के बीच में एक पेट भी है / जो पीठ से गले मिल कर चुप है / उसके बीच कुछ आंते हैं जो ऐंठी हुई है/ कई दिनों से नाजायज मांग लिए हुए हैं/ रोटी की/ तमाम तरह के बोझ उठाये हुए हाथ / नही सह पाते हैं परिवार का बोझ / संख्या में अल्पसंख्यक नही हूं / इतना हूं कि बना सकता हूं नया भारत / बनाया भी है मैंने / नहीं मिलता मुझे घऱ मेरे भारत में / नही होती मेरी भूख शांत मेरे भारत में /मैं अलग हूं मेरे भारत में / घर अलग, परिवार अलग / अधिकार अलग/ मेरा वर्ग अलग, राशन कार्ड अलग /सपने अलग / नहीं नहीं सपने तो है हीं नहीं /हां एक संख्या ज़रूर है मेरी /जो काम आती है सरकार बनाने में / प्रजातंत्र को चलाने में / देश बनाने में.

 

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)