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Blog: टॉम ऑल्‍टर सर, मुझे माफ़ करना, आपसे दोबारा नहीं मिल पाया...

जबसे हर दिल अजीज अभिनेता टॉम ऑल्‍टर के निधन की  खबर आई है, मन उदास है.

Blog: टॉम ऑल्‍टर सर, मुझे माफ़ करना, आपसे दोबारा नहीं मिल पाया...
बेंगलुरु में एक कार्यक्रम के दौरान टॉम अल्टर. (IANS/28 Nov 2016)

कृष्णचंद्र पाण्डेय 

इससे पहले कि लोग छोड़कर चले जाएं, कुछ देर ही सही उनके साथ कुछ वक्‍त गुजार लीजिए. क्‍या पता फिर मुलाकात हो न हो... ये पंक्ति किसी शायर की नहीं है, न ही अनायास लिखी गई है. ये पंक्ति मन के दर्द को बयां कर रही है. ये दर्द होना भी लाजिमी है. कुछ दर्द आपके हिस्‍से का होता है, जिसमें किस्‍सा, खुशी, अनुभव सब शामिल होता है. ये किस्सा कुछ पुराना है. जबसे हर दिल अजीज अभिनेता टॉम ऑल्‍टर के निधन की  खबर आई है, मन उदास है. बार-बार मन यादों की लहरों में गोता लगा रहा है. कोई कैसे इतना जल्‍दी हम लोगों को छोड़कर जा सकता है, ये सोचकर ही मन उदास हो रहा है.

जो बात मन को द्रवित कर रही है, वो कुछ इस तरह है...

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान पहली बार पुणे फिल्म फेस्टिवल में जाने का मौका मिला. जाने से पहले बहुत लोगों से पुणे के बारे में जानकारी इकट्ठा की. सभी ने पुणे में फिल्म फेस्टिवल के अलावा बहुत सारी बातें बताईं, लेकिन सिनेमा की शिक्षिका रुतजा वाकांकर मैम ने तीन बातें मुख्य रूप से बताई थीं.
पहली- फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया पुणे जरूर जाना.
दूसरी- बुधवार पेठ (बहुत बड़ा वेश्यालय) जरूर घूमना.
तीसरी और सबसे प्रमुख बात- फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणे जाकर टॉम ऑल्‍टर से जरूर मिलना.

पुणे जाकर मैं इन तीनों बातों को यथार्थ में बदलना चाहता था और सबसे पहले पहुंचा फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पुणे. आप जब स्टूडेंट होते हैं तो पैसों को बचाना पहली प्राथमिकता रहती है. पैसे कैसे बचें, सभी इसी जुगत में लगे रहते हैं, लेकिन स्टूडेंट्स पर ये बात कुछ अलग ही ढंग से लागू होती है. हम स्टूडेंट थे, तो पैसा न लगे इसलिए एफटीआईआई के एक स्टूडेंट को अपनी व्यथा सुनाई और ठहरने की व्यवस्था हो गई. पहली बात पूरी हुई, एफटीआईआई के कैंपस में एंट्री मिल गई. रातभर एफटीआईआई के पूरे कैंपस को खुद में महसूस करता रहा. बाकी कल देखेंगे ये कहकर मैं अपने दोस्त के कमरे में चला आया. सुबह जब आंख खुली तो 8 बज चुके थे. सब क्लास जाने की तैयारी कर रहे थे,  तभी मेरे कानों में एक आवाज आई- चलो भाई, टॉम ऑल्‍टर सर की क्लास है. आवाज सुनते ही मैं चौंक गया. टॉम ऑल्‍टर! मैं भी उनकी क्लास में शामिल होना चाहता हूं, ये बात धीरे से मैंने अपने साथी से कही. साथी ने तपाक से कहा- अरे, कृष्णा ये एफटीआईआई है.. यहां क्लास के बच्चे ही नहीं पशु-पक्षी सब टॉम ऑल्‍टर सर की क्लास लेते हैं.
तुम जल्दी तैयार हो जाओ... क्लास चलते हैं.  

मैंने देखा गुनगुनी धूप में पेड़ के नीचे एक इंसान एक्टिंग की क्लास ले रहा था. असल में वहां क्लास नहीं, बल्कि परीक्षा चल रही थी. सब बारी-बारी से अपने रोल नंबर के हिसाब से आते, अपनी एक्टिंग दिखाते और वापस अपनी जगह पर बैठ जाते. पेड़ के नीचे चल रही क्लास मुझे गांव की प्राथमिक पाठशाला की याद दिला रही थी. मैं भी वहीं किनारे पर बैठ गया. मैंने देखा, एक इंसान जो गोरे रंग का है, बीच-बीच में हिंदी में निर्देश देता और फिर अपने बाएं हाथ को हवा में घुमाते हुए छात्रों को समझाने लगता. मैं यह सोचकर दंग था कि कोई अंग्रेज इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोल सकता है. सिर्फ बोल ही नहीं, हिंदी में अलग-अलग भावों को प्रकट भी कर सकता है. जब उन्होंने मेरी ओर मुखातिब होते हुए कहा- आपको कैसा लगा? मैं मन ही मन खुश हो गया. मैंने उनके पास जाकर बड़े प्यार से कहा- सर, पुणे में आने से पहले आपके नाम की चर्चा सुनी थी. अभी आपको देखकर, सुनकर बहुत अच्छा लगा और सबसे प्यारी बात आपकी क्लास.

मुस्कुराते हुए वो इंसान दूसरी क्लास लेने चला गया और मैं अपने दूसरे काम में लग गया. मन ख़ुशी के मारे झूम रहा था. वजह भी थी- एफटीआईआई भी घूम लिया था और टॉम ऑल्‍टर सर से मिल भी लिया था. सर, जब आपसे पहली बार मिला था, तब आपके नाम के बारे में दूसरों से सुना था और जब आपके बारे में पढ़ा, सोचा-समझा और आपसे दोबारा मिलने का मन बनाया, तब आप हम सबको छोड़कर चले गए.

'टॉम ऑल्‍टर सर, मुझे माफ़ करना, आपसे दोबारा नहीं मिल पाया'.

(लेखक, ज़ी डिजिटल में कॉपी राइटर हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)