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Book Review: औरंगजेब और भी बहुत कुछ था जो हम नहीं जानते

औरंगजेब पर इल्जाम है कि उसने अपनी हुकूमत में हिंदुओं पर अत्याचार किए और बड़ी तादाद में हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था.

Book Review: औरंगजेब और भी बहुत कुछ था जो हम नहीं जानते

एक ऐसी शख्सियत जिसका नाम तीन सौ साल से विवादों के घेरे में हो, उसके जीवन पर किताब लिखना खतरे से खाली नहीं, लेकिन ये खतरा युवा पत्रकार अफसर अहमद ने उठाया है. छह खंडों में तैयार की गयी औरंगजेब की दास्तान का पहला हिस्सा अब पाठकों के हाथ में है.

औरंगजेब भारतीय इतिहास की ऐसी शख्सियत है जिसे या तो क्रूर खलनायक या फिर औरंगजेब इस्लाम का सच्चाई से पालन करने वाले बादशाह के रूप में देखा जाता रहा है. हालांकि औरंगजेब पर लगे इल्जामों की फेहरिस्त यूं तो काफी लंबी है, लेकिन वो एक ऐसा बादशाह भी था जिसने अफगानिस्तान से लेकर दक्षिण भारत तक मुगल साम्राज्य का विस्तार किया और उसकी यह यात्रा काफी दिलचस्प रही.

अफसर अहमद ने अपनी किताब में औरंगजेब के व्यक्तित्व को एक शासक के रूप में पेश करने की कोशिश की है. भाषा आसान और लेखन प्रवाहमयी है. भूमिका में अफसर लिखते हैं कि उनके लिये इस किताब को लिखने का अनुभव बहुत चौंकाने वाला रहा.

औरंगजेब पर शोध करने के दौरान पहले तो उन आरोपों से सामाना होता है जिसकी धूल में औरंगजेब का नाम अटा हुआ है. औरंगजेब पर इल्जाम है कि उसने अपनी हुकूमत में हिंदुओं पर अत्याचार किए और बड़ी तादाद में हिंदू मंदिरों को तोड़ दिया था. हिंदुओं और सिखों का जबरन धर्मपरिवर्तन कराया गया. सिखों के नवें गुरु, गुरु तेगबहादुर को कत्ल करने का इल्जाम भी औरंगजेब के सिर पर ही है.

उसने सत्ता हासिल करने के लिए अपने भाइयों दारा शिकोह और शाह शुजा को कत्ल करा दिया, वहीं अपने पिता शाहजहां को भी कैद कर लिया था. अफसर अहमद ने औरंगजेब के बारे मे कई चौंकाने वाले तथ्य पेश किये हैं. मिसाल के लिये औरगंजेब का दिल भी मोहबब्त में वैसे ही धड़कता था, जैसे शायरों का धड़कता है. इसी तरह के बहुत से ऐसे तथ्य हैं जो लेखक ने किताब में दर्ज किये हैं. जिससे शासक औरंगजेब को नए नजरिये से समझने में मदद मिलती है. दरअसल बरसों से औरंगजेब पर आरोपों और उसकी हिमायत के शोरगुल में उलझी उसकी असलियत कभी पूरी तरह से उभर कर सामने आ ही नहीं सकी. किताब के इस भाग में औरंगजेब के बचपन से लेकर सत्ता संघर्ष तक की घटनाओं को स्थान दिया गया है. उसकी बाकी दास्तान पांच अन्य भागों में प्रकाशित होगी. 

औरंगजेब को लेकर हिंदी में ऐसे संदर्भ ग्रंथ का बेहद अभाव रहा है, जिसे तटस्थ्य इतिहासकार ने तैयार किया हो. औरंगजेब की मृत्यु की तीन शताब्दियां बीत जाने के बाद भी हमारे समाज में उसके प्रति नफरत कितनी शिद्दत के साथ जड़ें जमाए हुए है इसका अनुमान दो साल पहले राजधानी दिल्ली में घटी इस घटना से हो जाता है. दिल्ली की पहचान इंडिया गेट से निकलने वाली 6 सड़कों में से एक औरंगजेब रोड है लेकिन इसका नाम बदलकर अब एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया है. औरंगजेब रोड का नाम बदलने की मांग के पीछे तर्क दिया गया है कि चूंकि वह दमनकारी और क्रूर था और अत्याचारों में लिप्त था ऐसे में उसके नाम पर सड़क से भावी पीढ़ियों में गलत संदेश जाएगा.

ऐसे माहौल में औरंगजेब को लेकर लिखी गयी किताब विवादों से बच पाएगी, यह मुमकिन नही लगता, लेकिन लेखक का स्पष्ट मत है कि उन्होंने भारतीय इतिहास के सबसे विवादित बादशाह के जीवन को तटस्थ होकर पेश करने की कोशिश की है. लेखक के दावे को पाठक ही अपनी कसौटी पर कस सकते हैं. 

किताब: औरंगजेब
लेखक: अफसर अहमद
प्रकाशक- इवोको पब्लिकेशंस 
कीमत- 250 रुपए