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बदलती ग्रामीण विसंगतियों की महागाथा है 'द लंपटगंज'

व्यंग्यकार पंकज प्रसून को यूं तो बहुत लोग कवि सम्मेलन के मंचों के हास्य कवि के रूप में जानते हैं. लेकिन डायमंड प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित हुए कथा संग्रह ' द लंपटगंज' में उनका गद्यकार और कथाकार रूप व्यापक रूप में सामने आया है.

बदलती ग्रामीण  विसंगतियों की महागाथा है 'द लंपटगंज'

नई दिल्ली : व्यंग्यकार पंकज प्रसून को यूं तो बहुत लोग कवि सम्मेलन के मंचों के हास्य कवि के रूप में जानते हैं. लेकिन डायमंड प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित हुए कथा संग्रह ' द लंपटगंज' में उनका गद्यकार और कथाकार रूप व्यापक रूप में सामने आया है.

11व्यंग्य कहानियों के संग्रह में द लंपटगंज में राग दरबारी का शिवपाल गंज दिखाई पड़ता है, लेकिन वह शिवपालगंज अब बदल चुका है. अब वहां पर सूचना तकनीक ने अपने पांव पसार लिए हैं .वहां का सनीचर वैद्य जी जैसे पात्रों का परिवेश रहन-सहन आदि खासा बदल चुका है कुछ नहीं बदला है तो वह है स्वार्थ गत राजनीति  शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था एवं  मानव की मूल प्रवृत्ति. पंकज प्रसून की यह कहानिया विसंगतियों के बदलते स्वरूप की कहानियां हैं संग्रह की खास बात है की हर कहानी एक नई व्यवस्था को उठाती है एवं उसके तह तक पहुंचती है भ्रष्ट तंत्र के पीछे के कारणों को कहानियां बखूबी उजागर करती हैं.

संग्रह की पहली कहानी घाटमपुर के इलेक्शन गांव में होने वाले प्रधानी के चुनाव की कहानी है, जिसमें लोकल राजनीति का घटिया स्तर पता चलता है किस तरह से शराब शबाब कबाब आदि के द्वारा वोट हासिल किए जाते हैं वह इस कहानी को पढ़कर समझा जा सकता है. बैंड बनाम बैंडेज में एक ऐसे बैंड स्वामी का चित्रण है जो सफल चिकित्सक के अवतार में कामयाब होता है. पक्का का डॉक्टर पक्का होने का विवरण पढ़ने योग्य है. लेखक के शब्दों में इस परिवर्तन से परिचित होना ही श्रेयकर है- मेडिकल कॉलेज में शुरुआत थेओरी से होती है पर डॉ.किशोरी की क्लास में डायरेक्ट प्रेक्टिकल का प्रावधान था. तमाम मेडिकल कॉलेज ‘ह्यूमन मॉडल’ के लिए तरसते रहते हैं पर यहां आपने वाला प्रत्येक मरीज ह्यूमन मॉडल ही रहता था. जिस पर किशोरी तरह बेतरह के प्रयोग किया करता था. तीन महीने तक लगातार प्रेक्टिकल क्लासेज का परिणाम था कि पक्का ने नस में सीरिंज घुसाना,ग्लूकोज की बोतल टांगना,फोड़े की सर्जरी करना,घाव में बत्ती भरना,मरहम पट्टी करना, डॉक्टरी गांठ लगाना,और डॉक्टरी गांठना सीख चुका था.

सर्जरी की इतनी विधाओं में पारंगत होने का मतलब आप मास्टर इन सर्जरी हो गए. डॉ किशोरी ने पक्का को समझाया था ‘सर्जन यानी हाथ की सफाई द्वारा मरीज की जेब काटना’ और फिजीशियन यानी कि बिना दिमाग लगाए मरीज की जेब काटना. किशोरीलाल ने पक्का को प्रमुख मर्जों जैसे बुखार,आंख, नाक कान गले की समस्या (ईएनटी),अलग-अलग किस्म के दर्दों के लिए अलग अलग रेसिपी बनाकर दे दी थी. जिससे बिना दिमाग लगाए वह मरीजों को दवा दे सकते थे. यह रेसिपी किशोरी की अपनी नहीं थी.सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डिग्री शुदा डॉक्टर की थी जिनको किशोरी का गुरु-घंटाल मानना चाहिए.

संग्रह  में जीवन के कई क्षेत्र शिक्षा राजनीति, झोला छाप डॉक्टर से लेकर चुनाव में दंगे की भूमिका आदि भी शामिल है. संक्षेप में कहें तो उन्होने चुनावी सियासत से लेकर डॉक्टर की तिजारत तथा प्रधानी कि वज़ारत किसी को नहीं बख्शा है, अपने लेखन में. उनके सृजित चरित्र में इसी के अनुकूल हैं. ‘कसम लैमार्क की’ शीर्षक कथा में ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था का एक चित्रण देखिये-‘ देश में भले ही तमाम सीबीएससी,आईसीएसई आदि बोर्ड के स्कूल खुल गए हों पर यूपी बोर्ड के विद्यालयों की अपनी अलग छटा है, अलहदा सौंदर्य है. टपकती छत, खुल्ले में क्लास, जातिवादी शिक्षक, उन्मादी विद्यार्थी, आदि ने प्रादेशिक सौंदर्य को तनिक भी बिगड़ने नहीं दिया है.

ऐसे ही यूपी बोर्ड का एक विद्यालय है -निराशापुर का जनता इंटर कॉलेज. जनता इंटर कॉलेज वो लोकतांत्रिक विद्यालय होते हैं जहां प्रधानाचार्य प्रधानमंत्री की भूमिका में रहता है और शिक्षक उसके कैबिनेट मंत्री के रूप में शोभायमान रहते हैं. विद्यार्थियों की स्थिति जनता की भांति होती है.क्योंकि उनको नसीब होने वाली सरकारी छात्रवृत्ति और जनता को मिलने वाली योजनाओं की स्थिति एक सी होती है. एक और जहां गरीब जनता को ब्याज में छूट मिलती है वैसे ही यहां पर छात्रों को नक़ल करने की छूट थी. यही कारण था कि इस विद्यालय का रिजल्ट शत प्रतिशत रहता था. विद्यालय में साल भर पढ़ाई होती थी पर इम्तिहान से पहले ‘कुशल नकलची कैसे बनें’ की सैद्धान्तिक व प्रयोगात्मक कक्षाएं लगवाई जाती थीं.

हुल्ला पुर में हल्ला सांप्रदायिक तनाव को लेकर लिखी गई कथा है जिसे पढ़कर आप मंदिर मस्जिद विवाद किस तरह से फैलाए जाते हैं और ऐसे विवादों के पीछे किन लोगों का स्वार्थ होता है और किस तरह से वह धर्म की सीढ़ियों पर चढ़कर सत्ता के शिखर पर पहुंच जाते हैं. इस कहानी से समझा जा सकता है. लट्ठमार कवि सम्मेलन कहानी आज के दौर में गिरती हुई कवि सम्मेलन के मंचों की स्थिति को बयां करती है. लटूरी लट्ठ नामक चरित्र  के माध्यम से पंकज प्रसून ने साहित्य में व्याप्त भ्रष्टाचार की खबर ली है एक जगह लिखते हैं आज के दौर में घनानंद और भूषण के उपासक संता बंता के अनुयायियों के यहां पानी भरते पाए जाते हैं.

लंपट गंज की एक और कहानी दूध के नशेड़ी एक ऐसे परिवार की कहानी है जो दूध के चक्कर में पड़कर बर्बादी के मुहाने पर पहुंच जाता है एक दौर था जब गांव में यह कहा जाता था कि नौकरी करने क्यों जाएं शहर जब शहर जब गांव में इतनी सारी गाय पाली हुई हैं. इस प्रवृत्ति के चलते लोग नौकरियां नहीं कर पाए एक ऐसे त्रिपाठी परिवार की कहानी है जिसमें एक के बाद एक लड़कियों की शादी में जमीन देखती रही फिर ऐसा दौर आ गया की लोन लेकर भैंस खरीदनी पड़ी.

फुन्नी दादा की प्रेम कहानी एक ऐसे अधेड़ युवक की कहानी है जो अखबार में छपे हुए शादी के वैवाहिक विज्ञापनों को देखकर उन नंबरों पर फोन मिलाता है फिर कुछ ऐसा होता है जिससे फुन्नी दादा ठगे जाते हैं बहुत ही रोचक कहानी हैं, जिसके राज का खुलासा अंत में होता है . प्यार में पड़कर किस तरह फुन्नी दादा का शोषण होता है यह पढ़ना बड़ा मजेदार है. संग्रह की कहानी कठिन प्रेम का प्रेत हिंदी मास्टर के लड़के एवं अंग्रेजी मास्टर के लड़की की इश्क की कहानी है जिसमें हिंदी और अंग्रेजी का संघर्ष एक और चलता है तो एक और पुरातन और मॉडर्न प्रेम की कहानी. 

किताब की कुछ पंचलाइनें 

"घाटमपुर में आम और नीम तो कब के पार उतर गए वह शराब ही है जिसने महुआ को आज तक जीवंत बनाए रखा है"
"अवधी जब क्रोधित होती है तो वह खड़ी बोली का रूप ले लेती है" 
"जब दर्द का समान वितरण होता है तो दुश्मन भी दोस्ताना रवैया अपनाने लगते हैं"
"इंसान जब पत्थर  का हो जाता है तो  वह भगवान का दर्जा पा जाता है"
"नए और पुराने उम्र के प्यार में एक मूल अंतर होता है कि बेवफाई की दशा में एक  ओर हार्मोन पर खून हावी हो जाता है तो दूसरी ओर खून पर हार्मोन"
 "आज के दौर में  घनानंद भूषण के उपासक संता बंता बंता के अनुयाई कवियों के घरों में पानी भरते पाए जाते हैं"
"अगर कोई  शायरा मंच से बेबहर  ग़ज़ल पढ़े,  तो बिना सोचे समझे यह मान लेना चाहिए की वह मौलिक शायरा है"
"बड़ी बड़ी विचार गोष्ठियों में शाम को दो पैग अंदर जाते ही मार्क्स मस्तराम में रूपांतरित हो जाते हैं"
"ऐसा नहीं था कि वह लोहिया को उपेक्षित करते थे. जिस ड्राइंग रूम में बैठ कर ठेके में कमीशन तय करते थे वहां लोहिया की तस्वीर टंगी हुई है"
"सरकारी अधिकारियों का निलंबन एलटीसी का ही दूसरा नाम होता है"
"वह हास्य रस में इस कदर आकंठ डूबे थे कि चाहे वह गद्य  लिखे या पद्य, कहानी लिखे या निबंध,  सब पर हंसी आती थी'
"उनका मानना था बेटी को दहेज के साथ विदा करने से वह सशक्त बनती है.  ससुराल में कन्या पक्ष का प्रभुत्व स्थापित होता है वह समधियाने में  सोफे पर पैर फैला कर बैठ कर  मूछों पर ताव दे सकते थे"
"आधी से ज्यादा जमीन दहेज के भेंट चढ़ गई थी लेकिन मन्नी  दादा को इस बात का कतई गम नही था. उनको अपने बेटे फुन्नी  के अंदर उनको 20 बीघे दिखाई पड़ते थे हालांकि पहले 30 दिखाई पड़ते थे लेकिन बेटे की बढ़ती उम्र के साथ बीघे भी  घटते गए"
"हर बाप अपनी बेटी के लिए डॉक्टर इंजीनियर वैज्ञानिक अधिकारी ढूंढता है कोई ससुरा अच्छा इंसान चाहता ही नहीं"
"फुन्नी दादा दिनभर मोबाइल खोजते रहे.  इंसान पशु पक्षी सब से पूछते रहे उनका हाल सीता की खोज में निकले राम जैसा हो गया था . 'हे बबलू हे राम कुमारा का देखो मोबाइल हमारा"
"डॉक्टर पक्का के इंजेक्शन का दर्द इतना अधिक था  कि मरीज अपना  कमर दर्द भूल ही गया"
"डॉक्टर भले ही कड़वी दवा दे लेकिन उसके संबंध मधुर होने चाहिए . महिलाओं से  डा पक्का के उनके संबंध इतने मधुर हो गए थे कि उन्होंने कई पतियों को लगभग रोगी ही  बना दिया था" 

इस किताब की भूमिका में वरिष्ठ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी लिखते हैं- लेखक ने स्वयं गांवों में रहकर इन चरित्रों का बारीकी से अध्ययन किया है और बेबाकी से उसका प्रस्तुतीकरण. इन काल्पनिक चरित्रों कि वास्तविकता इतनी प्रबल है कि कि वह चलते फिरते, हंसते-रोते इंसान नजर आते हैं. यह पंकज के लेखन का जीवंत तत्व है. पंकज की कहानियां बिना किसी ‘वर्जीनिया वुल्फ़’ की ‘ स्ट्रीम ऑफ कान्शसलैस’ कि उलझन में उलझे सीधे घटना का विस्तृत व जीवंत विवरण करती हैं जो पाठक के मन को कभी गुदगुदाता है, कभी हंसाता है और अंत तक आते आते उसे चिंतित भी कर जाता है. यह जो करप्शन का किला हर धंधे में बन गया है, वह कैसे टूटेगा? सरकार इसे और पुख्ता करेगी कि तोड़ने का प्रयास भी करेगी ? क्या इसके प्रति सहयोगी भावना का चलन कभी रुकेगा?  निराशापुर ने निराश लोगों को कहीं यह तो नहीं लगने लगा है कि जीवन का है, भ्रष्टाचार का अंत नहीं है. इसका निदान लुकमान के पास भी नहीं है' कुल मिलाकर सरल भाषा मे लिखी गई पठनीय कहानियां जो पाठक से सीधे संवाद स्थापित करती दिखती हैं. कहानियों में नाटक के तत्व भी विद्यमान मिलेंगे. जिस वजह से यह अंत तक पाठक को बांधे रखती हैं. आशा है कि यह संग्रह व्यंग्य जगत मे कहानियों की कमी को पूरा करेगा. यह संग्रह व्यंग्य को महज निबंधों पर सीमित होने के खतरे को टालता सा प्रतीत होता है.