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जयंती विशेष : जब मुंशी प्रेमचंद ने अपनी बेटी के लिए 135 रुपए में खरीदी थी हीरे की लौंग

प्रेमचंद की शादी के बाद पिता ने भी दूसरी शादी कर ली. घर में सौतेली मां उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थी. एक पिता ही अपने बचे थे, लेकिन जल्द ही वे भी उनका साथ छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह गए. 

जयंती विशेष : जब मुंशी प्रेमचंद ने अपनी बेटी के लिए 135 रुपए में खरीदी थी हीरे की लौंग
प्रेमचंद जयंती विशेष

हिंदी साहित्य में सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक मुंशी प्रेचचंद की आज जयंची है. उन्होंने अपनी रचनाओं से समाज को रुढ़िवादी परंपराओं और कुरीतियों से निकालने की कोशिश की. 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में उनका हुआ था. बचपन में उनका नाम धनपत राय था. आठ साल की उम्र में उनके सिर से मां का साया उठ गया. 15 साल की छोटी सी उम्र में ही पिता ने उनका विवाह करा दिया. उनके दौर में यह आम था.

कहा जाता है कि उनकी पत्नी उम्र में उनसे बड़ी थी. देखने में भी साधारण थी. स्वभाव तो उनका झगड़ालू था. प्रेमचंद ने अपने इस वैवाहिक जीवन के बारे में खुद लिखा, 'उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी. जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया. उसके साथ-साथ जबान की भी मीठी नहीं थी.' कम उम्र में शादी के फैसले से वह अपने पिता से भी नाराज थे. पिता के बारे में लिखा है, 'पिताजी ने जीवन के अंतिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया. मेरी शादी बिना सोचे समझे कर डाली.'

प्रेमचंद की शादी के बाद पिता ने भी दूसरी शादी कर ली. घर में सौतेली मां उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती थी. एक पिता ही अपने बचे थे, लेकिन जल्द ही वे भी उनका साथ छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कह गए. मुंशी के सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. आर्थिक तंगी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच पत्नी भी साथ छोड़कर मायके चली गई.

प्रेमचंद की आर्थिक स्थिति का जिक्र होते ही हरिशंकर परसाई अपनी लेख 'प्रेमचंद के फटे जूते' में उनके जूतों को देखकर लिखते हैं, 'दाहिने पांव का जूता ठीक है, मगर बाएं जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अंगुली बाहर निकल आई है.' तो क्या प्रेमचंद इतने गरीब थे कि वो अपने लिए एक जूता भी नहीं खरीद सकते थे.

प्रेमचंद के बेटे अमृत राय ने प्रेमचंद की जीवनी 'कलम का सिपाही' में लिखा है कि उनकी अंतिम यात्रा में कुछ ही लोग थे. जब अर्थी जा रही थी, तो रास्ते में किसी ने पूछा, 'कौन था?' साथ खड़े आदमी ने कहा 'कोई मास्टर था, मर गया.' इनसे पता चलता है कि हम प्रेमचंद के साथ कितना न्याय कर पाए. वैसे भी हम कौन सा अपने लेखकों, साहित्यकारों के साथ न्याय कर पाते हैं.

प्रेमचंद पर शोध करने वाले कमल किशोर गोयनका ने हाल में जयपुर साहित्य सम्मेलन में कहा कि प्रेमचंद के पत्र, सर्विस बुक, बैंक पासबुक देखकर नहीं लगता कि वो गरीब थे. ये बात सही है कि प्रेमचंद के जीवन में संघर्ष था, अभाव था, लेकिन उन्हें वैसी गरीबी नहीं देखनी पड़ी जैसी उनके थोड़ा बाद आने वाले महाप्राण निराला ने अपने जीवन में झेली.

प्रेमचंद का बचपन अभाव में बीता, लेकिन बाद में उन्हें अच्छी सरकारी नौकरी मिली और उनका जीवन अच्छा चल रहा था. लेकिन सरकारी नौकरी के कारण उनके लेखन में बाधा आती थी. इस बीच महात्मा गांधी जी के आह्वान पर उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी. इसके बावजूद वो अनुवाद, संपादन और लेखन से पर्याप्त पैसे कमा लेते थे.

प्रेमचंद ने एक बार अपनी बेटी के लिए 135 रुपये की हीरे की लौंग खरीदी और अपनी पत्नी के लिए भी 750 रुपये के कान के फूल खरीदना चाह रहे थे. हालांकि, पत्नी ने मना कर दिया. यानी प्रेमचंद के पास खर्च करने के लिए रुपये थे. लेकिन ये बात भी सच है कि जब उन्हें बंबई की फिल्म कंपनी 'अजन्ता सिनटोन' में काम करने के लिए जाना था, तो उनके पास बंबई जाने के लिए किराए के पैसे नहीं थे. उस समय उन पर बैंक का कुछ कर्ज भी था.

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