कोलगेट : केस बंद करने को रंजीत सिन्हा के तर्क पर कोर्ट ने उठाए सवाल

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्हा को आज एक विशेष अदालत ने आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में उनके द्वारा मामला बंद करने की रिपोर्ट को जो मंजूरी दी गई, वह कानूनी तौर पर टिक नहीं सकती। साथ ही इसमें किसी कारण या तर्क का भी अभाव है।

कोलगेट : केस बंद करने को रंजीत सिन्हा के तर्क पर कोर्ट ने उठाए सवाल

नई दिल्ली : केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक रंजीत सिन्हा को आज एक विशेष अदालत ने आड़े हाथ लेते हुए कहा कि कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में उनके द्वारा मामला बंद करने की रिपोर्ट को जो मंजूरी दी गई, वह कानूनी तौर पर टिक नहीं सकती। साथ ही इसमें किसी कारण या तर्क का भी अभाव है।

विशेष अदालत ने कोयला खदानों के आवंटन प्रकरण के एक मामले में सीबीआई को आगे और जांच का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि सीबीआई के निदेशक और अन्य शीर्ष अधिकारियों द्वारा रिपोर्ट की जांच ठोस और कानूनी आधार पर टिकने वाले तथ्यों आधारित होनी चाहिए।

अदालत ने मामला बंद करने संबंधी रिपोर्ट स्वीकार करने से इंकार करते हुये जांच एजेन्सी को आगाह किया कि ‘असावधानीवश हुए कृत्य और अनुचित कृत्य’ के बीच बहुत ही मामूली अंतर होता है। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट की जांच कानून के प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए। अदालत ने आशा की कि भविष्य में इस तरह की गलती नहीं होगी। सीबीआई के विशेष न्यायाधीश भरत पराशर ने विकास मेटल्स एंड पावर लि तथा उनके अधिकारियों से संबंधित मामले में अपने 23 पेज के आदेश में इस संबंध में टिप्पणियां कीं।

विकास मेटल्स एंड पावर लिमिटेड और इसके अधिकारियों से संबंधित है। इन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने कोयला ब्लॉक आवंटन में अनुचित लाभ हासिल करने के लिए भूमि अधिग्रहण के बारे में गलत दावे किए। सीबीआई इस मामले को बंद करने के पक्ष में थी और उसने इस संबंध में अपनी दाखिल रिपोर्ट में कहा कि विकास मेटल्स एंड पावर लि या उसके निदेशकों या किसी लोक सेवक के खिलाफ आरोप कानून के आगे टिक नहीं सकेंगे।

अदालत ने अपने आदेश में सीबीआई को इस मामले की आगे जांच करने और 10 नवंबर को प्रगति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। विशेष न्यायाधीश ने कहा ‘आपराधिक दंड संहिता के प्रावधानों के तहत आगे जांच के लिए इस मामले को सीबीआई के पास भेज दिया गया है। इस आदेश की प्रति सीबीआई के निदेशक और सीबीआई के उन सभी उप महानिरीक्षकों को भेजी जाए जो कोयला ब्लाक आवंटन के मामलों की जांच की निगरानी कर रहे हैं।’

अदालत ने कहा कि निदेशक, सीबीआई व डीआईजी यह सुनिश्चित करें कि जो अधिकारी उनके तहत काम कर रहे हैं यदि उनमें जांच के लिए दक्षता का अभाव है, तो उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाए और सीबीआई अकादमी में उन्हें रिफ्रेशर पाठ्यक्रम करने को कहा जाए। अदालत ने जांच अधिकारी से यह भी कहा कि 10 नवंबर को दाखिल होने वाली जांच रपट विस्तृत होनी चाहिए और उसमें जांच के निष्कषरें का पूरा औचित्य बताया जाना चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘यह अपेक्षा की जाती है कि आप अदालत के पूर्व आदेश के मुताबिक जांच करेंगे और यदि आपके निष्कर्ष अलग हैं तो इसकी विस्तृत वजह बाताएं।’ अदालत ने 30 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान सीबीआई के अधिकारियों की कोयला ब्लाक आवंटन घोटाला मामले की जांच के तरीके की खिंचाई की थी और कहा कि एजेंसी के अधिकारियों को जांच कला की प्राथमिक जानकारी का ही अभाव है।

अदालत ने सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा और सभी संबद्ध उपमहानिरीक्षक को आदेश दिया था कि वे व्यक्तिगत तौर पर इस मामले को देखें और ऐसा न करने की स्थिति में वे इसके जिम्मेदार होंगे। अदालत का यह भी मानना है कि एजेंसी के अधिकारी उससे कुछ दस्तावेज छुपा रहे हैं जिसकी वजह वे ही बेहतर जानते हैं और यहां तक कि मामले की जांच के दौरान दर्ज गवाहों के बयान भी उसके सामने पेश नहीं किए गए।

न्यायाधीश ने कहा कि सीबीआई के अधिकारी इस जांच में अपराध प्रक्रिया संहिता की मूल बातों और यहां तक की अपने जांच मैनुअल का अनुपालन नहीं कर रहे हैं। अदालत के बार बार कहने के बावजूद सीबीआई के अधिकारी उस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अदालत ने इस मामले के अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू की जांच नहीं करने के लिये जांच अधिकारी को आड़े हाथ लिया।

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी या तो जांच की बुनियादी बारीकियों से बेखबर थे या फिर उन्होंने इस कंपनी और उसके निदेशकों या कोयला मंत्रालय के अधिकारियों की मदद करने के इरादे से जानबूझ कर इस मामले की ठीक से जांच नहीं करने का रास्ता अपनाया। अदालत उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेष लोक अभियोजक आर एस चीमा के इस तर्क से सहमत थी कि जांच एजेन्सी द्वारा आंख मूंदकर कंपनी के निदेशकों के बयान को स्वीकार करके निकाला गया निष्कर्ष स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने इस मामले के सारे तथ्यों और परिस्थितियों पर गौर करने की परवाह ही नहीं की और आरोपियों के इस कथन को स्वीकार कर लिया कि बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा उन्हें दी गयी 300 एकड़ भूमि का आवंटन रद्द करने के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी।

सीबीआई ने विकास मेटल्स एण्ड पावर के खिलाफ मामला सितंबर 2012 में दर्ज किया था जिसमें कहा गया था कि कंपनी ने आवंटन के लिए गलत दावे प्रस्तुत किए थे। इसमें कंपनी के वरिष्ठ निदेशकों को भी नामजद किया गया था। सीबीआई ने कहा कि कंपनी का यह दावा गलत था कि बिहार क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने उसे बेगूसराय में 300 एकड़ जमीन आवंटित कर रखी है। एजेंसी ने पाया कि जमीन का आवंटन रद्द हो चुका था और कंपनी के निदेशकों ने कोयला ब्लाक आवंटन के आवेदनों की जांच करने वाली स्क्रीनिंग समिति को इसकी सूचना नहीं दी थी।